“सत्याग्रह” जैसे कि नाम से ही अर्थ स्पष्ट है, सत्य के लिए आग्रह. इसका सूत्रपात सर्वप्रथम महात्मा गांधी ने 1894 ई. में दक्षिण अफ़्रीका में किया था. गांधीजी का सत्‍याग्रह कोई आसान काम नहीं है न ही कमजोर लोगों के लिये है.सत्‍याग्रह केवल बहुत ही साहसी व बहादुर लोग ही कर सकते हैं. गांधीजी ने अपने सत्‍याग्रह की परिभाषा कुछ इसी तरह से दी थी कि “सत्‍याग्रह, सत्‍य का आग्रह है.यदि आपको लगता है कि आप सत्‍य की तरफ हैं, तो जीवन की परवाह किए बिना भी सत्‍य की रक्षा कीजिए और यदि सत्‍य के पक्ष में रहने से आपको मृत्‍यु भी प्राप्‍त होती है, तब भी अ‍पनी अन्तिम सांस तक सत्‍य के पक्ष में खडा रहना ही सत्‍याग्रह है. जबकि उस सत्‍य का आग्रह करते समय किसी भी तरह की हिंसा नहीं होनी चाहिए.”
गांधीजी द्वारा दक्षिण अफ्रीका में खोजे व प्रयोग किए गए सत्‍याग्रह व अहिंसा के ये हथियार इतने कारगर थे कि अन्‍तत: इनकी वजह से ही अंग्रेजों को भारत छोडना पडा और भारत अंग्रेजों की 200 साल पुरानी गुलामी से आजाद हो पाया.भारत में गाँधी जी के नेतृत्व में सत्याग्रह आन्दोलन के अंर्तगत अनेक कार्यक्रम चलाए गये थे.जिनमें प्रमुख है, चंपारण सत्याग्रह, बारदोली सत्याग्रह और खेड़ा सत्याग्रह.
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12 फरवरी 1928 को महात्मा गांधी ने गुजरात के  बारदोली में सत्याग्रह की घोषणा की थी,जिसे “बारदोली सत्याग्रह” के नाम से जाना जाता है.सन् 1928 में जब साइमन कमिशन भारत में आया, तब उसका राष्ट्रव्यापी बहिष्कार किया गया था. इस बहिष्कार के कारण भारत के लोगों में आजादी के प्रति अदम्य उत्साह था.जब कमिशन भारत में ही था, तब बारदोली का सत्याग्रह भी प्रारंभ हो गया था.
बारदोली में सत्याग्रह करने का प्रमुख कारण ये था कि, वहाँ के किसान जो वार्षिक लगान दे रहे थे, उसमें अचानक 30% की वृद्धी कर दी गई थी और बढा हुआ लगान 30 जून 1927 से लागु होना था. इस बढे हुए लगान के प्रति किसानों में आक्रोश होना स्वाभाविक था.तत्कालीन बॉम्बे राज्य की विधानसभा ने भी इस वृद्धी लगान का विरोध किया था.किसानों का एक मंडल उच्च अधिकारियों से मिलने गया परंतु उसका कोई असर नही हुआ.अनेक जन सभाओं द्वारा भी इस लगान का विरोध किया गया किन्तु बॉम्बे सरकार टस से मस न हुई.मज़बूरन इस लगान के विरोध में सत्याग्रह आन्दोलन करने का निर्णय लिया गया.
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किसानों की एक विशाल सभा बारदोली में आयोजित की गई, जिसमें सर्वसम्मति से ये निर्णय लिया गया कि बढा हुआ लगान किसी भी कीमत पर नही दिया जायेगा.जो सरकारी कर्मचारी लगान लेने आयेंगे उनके साथ असहयोग किया जायेगा क्योंकि उस दौरान सरकारी कर्मचारियों के लिए खाने एवं आने-जाने की व्यवस्था किसानों द्वारा की जाती थी.इस आन्दोलन की जिम्मेदारी श्री वल्लभ भाई पटेल को सौंपी गई. जिसे उन्होने गाँधी जी की सलाह पर स्वीकार किया.बारदोली में जब सरकारी कर्मचारियों को लगान नही मिला तो वे किसानों के जानवरों को उठाकर ले जाने लगे.किसानो की चल अचल सम्पत्ति भी कुर्क की जाने लगी. इस अत्याचार के विरोध में विठ्ठल भाई पटेल जो कि वल्लभ भाई पटेल के बड़े भाई थे, उन्होंने सरकार को चेतावनी दी कि, यदि ये अत्याचार बंद नही हुआ तो वे केन्द्रीय असेम्बली के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे देंगे.
बारदोली सत्याग्रह के सर्मथन में गाँधी जी की अपील पर 12 जून को पूरे देश में बारदोली दिवस मनाया गया.जगह-जगह सभाएं हुईं और बारदोली की घटना का जिक्र पूरे देश में फैल गया.समाचार पत्रों के मजदूर नेताओं द्वारा भी सरकार से अनुरोध किया गया कि किसानों पर बढे लगान के बोझ को कम किया जाये.सभी प्रदेशों के किसान संगठन ने सरकार को चेतावनी दी कि यदि बढा हुआ लगान वापस नही हुआ तो वो भी अपने प्रदेश में लगान बंदी आन्दोलन चलायेंगे.
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गाँधी जी के मार्गदर्शन से वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में इस आन्दोलन का असर सरकार पर हुआ और वायसराय की सलाह पर मुम्बई सरकार ने लगान के आदेश को रद्द करने की घोषणा करते हुए, सभी किसानो की भूमि तथा जानवरों को लौटाने का सरकारी फरमान जारी किया.सरकार ने ब्रूम फ़ील्ड और मैक्सवेल को बारदोली मामलें की जाँच करने का आदेश दिया.जाँच रिपोर्ट में बढ़ी हुई 30 प्रतिशत लगान को अवैध घोषित किया गया.अतः सरकार ने लगान घटाकर 6.03 प्रतिशत कर दिया.गिरफ्तार किये गये किसानों को रिहा कर दिया गया.इस आन्दोलन की सफलता के उपलक्ष्य में 11 और 12 अगस्त को विजय दिवस मनाया गया.
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महिलाओं ने भी इस आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई. पटेल से बारदोली के लोग प्रभावित हुए.इसी सत्याग्रह के दौरान पटेल को वहाँ की औरतों ने सरदार की उपाधि प्रदान की थी. गांधीजी ने भी इस आंदोलन की सफलता पर एक विशाल सभा में वल्लभ भाई पटेल को सरदार की पदवी से सम्मानित किया था, जिसके बाद वल्लभ भाई पटेल, “सरदार पटेल” के नाम से प्रसिद्ध हुए.
बारदोली सत्याग्रह ‘भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन’ का सबसे संगठित, व्यापक एवं सफल आन्दोलन रहा है.गाँधी जी ने इसकी सफलता पर कहा था कि, “बारदोली संघर्ष चाहे जो कुछ भी हो, यह स्वराज्य की प्राप्ति के लिए संघर्ष नहीं हैं, लेकिन इस तरह का हर संघर्ष हर कोशिश हमें स्वराज के क़रीब पहुँचा रहा है”

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Durgesh Dehriya

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