लोकसभा चुनाव 2019 देश का पहला चुनाव है जिसने दो बातें अनोखी हुयी हैं। हो तो और भी रही हैं पर जिन दो बातों का में उल्लेख कर रहा हूँ वह आज तक किसी चुनाव में नहीं हुई। एक तो नमो नाम से टीवी चैनल का प्रसारण और दूसरा सेना को चुनावी मुद्दा बनाना।

क्या नमो टीवी पर चुनाव आयोग की चुप्पी, भाजपा के साथ उसका शातिर गठबंधन है ?  यह सवाल जब उठा तो इसकी पड़ताल शुरू हुई। टाटा स्काई से पूछने पर जो डीटीएस सर्विस प्रोवाइडर है जो कहा उसे पढिये, ” नमो टीवी एक हिंदी न्यूज सर्विस है, जो राष्ट्रीय राजनीति पर ताजातरीन ब्रेकिंग न्यूज मुहैया कराती है. ”

इस सर्विस प्रोवाइडर के ट्वीट से केंद्र सरकार के दावे पर सवाल उठ रहे हैं। एक प्रकार से टाटा स्काई ने ट्वीट कर सरकार के उस दावे का खंडन किया है, जिसमें नमो टीवी को महज एक विज्ञापन प्लेटफॉर्म बताकर पल्ला झाड़ लिया गया। नमो टीवी नाम का यह चैनल 31 मार्च को अचानक लांच हुआ, तब से इसे सत्ताधारी बीजेपी के ट्विटर हैंडल से लगातार प्रमोट भी किया जा रहा है। खुद पीएम मोदी भी चौकीदारों को संबोधित करने से जुड़े प्रोग्राम का इस टीवी पर प्रसारण होने की 31 मार्च को सूचना दे चुके हैं.

बिना अनुमति के एक टीवी चैनल शुरू होता है केवल नरेन्द्र मोदी के प्रशस्ति गान के लिये और मुख्य चुनाव आयुक्त मौन है ?

नरेंद्र मोदी के नाम नमो टीवी से एक चैनल एक हफ्ते से चल रहा है, पर उसने न तो किसी ब्रॉडकास्ट लाइसेंस के लिये प्रार्थना पत्र दिया, और न उसे मिला। इसके पास ज़रूरी और अनिवार्य सुरक्षा क्लियरेंस भी नहीं है जो ब्रॉडकास्ट नियमो के अंतर्गत रखना अनिवार्य है। अगर यह क्लियरेंस नहीं है तो बिना क्लियरेंस कोई भी प्रसारण अवैध है।

सूचना और प्रसारण मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार, संभवतः भारत के रेडियो और टीवी  प्रसारण के इतिहास में यह पहला उदाहरण है जब बिना लाइसेंस और वैध अनुमति के कोई टीवी चैनल चल रहा है।

एक सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधिकारी के अनुसार,

” चोरी छिपे पाकिस्तान और चीन के चैनल का प्रसारण तो कुछ केबल वाले करते रहते हैं और जानकारी मिलने पर पकड़े भी जाते हैं, लेकिन देश मे पहलीं बार एक राजनीतिक दल का राजनेता के नाम पर सभी सुरक्षा और प्रसारण कानूनों को ताक पर रख कर चलाया जा रहा है।

अब दूसरा मुद्दा है सेना का। यह मुद्दा तो सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से ही भाजपा के एजेंडे में था, अब खुल कर चुनावी मुद्दा बन गया है। सेना पुलिस नहीं है कि उसे राजनीति में घसीटा जाय। सेना में अगर राजनीतिक वायरस घुस गया तो वह देश और लोकतंत्र दोनों के लिये खतरा बन जायेगा।

सेना का काम सीमा पर दुश्मन के हमलों से रक्षा करने का है । वह इसी उद्देश्य से गठित की गयी है। उसका प्रशिक्षण, माइंडसेट, और अनुशासन उसी के अनुसार गढ़ा गया है। जबकि आंतरिक संकट से निपटने के लिये पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल का गठन किया गया और वे भीड़ नियंत्रण, छोटे ऑपरेशन, अपराधियों का पता लगाने, उन्हें पकड़ने और कानूनन दंडित करने और हमले की स्थिति में मुठभेड़ कर  मार गिराने में प्रशिक्षित हैं। सेना और पुलिस दोनों के ही उद्देश्य, लक्ष्य, क्षमता, प्रशिक्षण, संसाधन, शस्त्र बल, फायर पावर और लक्ष्य के प्रति माइंडसेट में अंतर होता है। पुलिस या अर्ध सैनिक बल सीआरपीएफ, बीएसएफ, एसएसबी आदि, चाहे  जितने भी सक्षम और बहादुर हों वह युद्धात्मक हमले की दशा में सीमा पर दुश्मन का उस तरह से मुकाबला नहीं कर सकते हैं जैसे सेना करती है। इसीलिए शांति काल मे सीमा की रक्षा करने वाला सीमा सुरक्षा बल बीएसएफ जैसे ही युद्ध की परिस्थितियां बनती हैं या युध्द की घोषणा होती है वैसे ही पीछे हट जाती है और सेना अपना काम संभाल लेती है और वह दुश्मन का मुकाबला करती है।

उसी प्रकार आंतरिक उपद्रव की स्थितियों में जब स्थितियां बिगड़ने लगती है तो सेना उतनी सफल नहीं हो पाती है जितनी की स्थानीय पुलिस बल औए अन्य सशस्त्र पुलिस बल सफल हो जाते है। अपवाद स्वरूप भले ही सेना को आंतरिक कानून व्यवस्था के नियंत्रण के लिये लगा दिया जाय  पर जब सेना लंबे समय तक किसी क्षेत्र में कानून व्यवस्था की ड्यूटी में लगती है तो सेना के प्रति भी जनता का वही दृष्टिकोण और राय बनने लगती है जो आम तौर पर पुलिस के प्रति जनता की राय होती है। पुलिस जनता में व्याप्त अपनी विपरीत क्षवि को लेकर कम चिंतित रहती है क्यों कि पुलिस का मानना है कि उसकी निंदा, आलोचना और उसके किये गए कार्यो तथा लिये गये निर्णय पर लोग खुल कर चर्चा करेंगे। यह उन सभी विभागों के साथ है जो पब्लिक डीलिंग से जुड़े होते हैं। लोग ज़िंदाबाद मुर्दाबाद भी करेंगे। झूठे सच्चे शिकायती प्रार्थनापत्र भी देंगे । अक्सर पुलिस स्थानीय राजनीति में दखल भी देती है। इसका कारण कुछ तो प्रोफेशनल है और कुछ निजी भी होते हैं।  इस प्रकार आलोचना और निंदा की आदती हो चुकी पुलिस इन सब वितंडावाद के बाद भी अपने प्रोफेशनल काम मे लगी रहती हैं।

यह अलग बात है कि पब्लिक डीलिंग जो उसके कार्य की परिस्थितियों का अभिन्न अंग है उसे राजनीतिक दलगत भाव पर बांट देते हैं। अगर पुलिस दलगत भाव पर न बंटे तो भी जनता की यह धारणा बन ही जाती है कि पुलिस राजनीतिक दलगत, जातिगत और क्षेत्रीय आधार पर प्रभावित होकर अपना काम करती है। पर इस क्षवि से पुलिस को कोई बहुत फर्क भी नहीं पड़ता है।  अधिकारी भी ऐसी निंदा आलोचना और शिकायतो की वास्तविकता समझते हैं अतः इन विपरीत प्रतिक्रियाओं से प्रभावित हुये बिना अपना काम करते रहते हैं जब तक कि  कोई बड़ी शिकायत न हो और कोई बड़ी गलती न दिखे।

पर सेना के जवान और अफसर ऐसी मानसिकता के नहीं होते हैं। वे अराजनीतिक  होते हैं। जातिगत, धर्मगत और क्षेत्रीय आधार पर विभाजन की सोच से मुक्त रहते हैं। अनुशासन और दुश्मन से लड़ने के लिये दिए गए प्रशिक्षण और उसी माइंडसेट में ढले होने के कारण, वे ऐसी आलोचनाए, निंदा और परिस्थितियों से रूबरू होने के अभ्यस्त भी नही होते हैं, जो निरन्तर जन संपर्क में रहने के कारण पुलिस की आदत बन गयी रहती है। पर जब वे ऐसे पब्लिक डीलिंग जन्य आरोपों और शिकायतों से घिरते हैं तो अक्सर असहज हो जाते है। यह असहजता उन्हें अति प्रतिक्रियात्मक बना देती है। यही कभी कभी ओवर रिएक्शन का कारण भी बन जाता है।

पुलिस तो जनता के बीच निरन्तर काम करने की आदत और राजनीतिक दांव पेंच की जानकारी के कारण ऐसे ओवर रिएक्शन को मैनेज कर लेती है। जनता में ही स्थानीय होने के कारण उसे कुछ मददगार भी मिल जाते हैं। पर सेना ऐसा नहीं कर पाती है। भीड़ नियंत्रण के समय जिस धैर्य की अमूमन आवश्यकता होती है और जो पुलिस प्रदर्शित करती है वैसा सेना के अफसर और जवान नहीं कर पाते हैं। ऐसा इसलिए है कि वे ऐसी परिस्थितियों के लिये न तो प्रशिक्षित हैं और न ही अभ्यस्त।  जैसे युद्ध लड़ना एक कौशल है वैसे ही भीड़ नियंत्रण, अपराधी का पता लगाना, उन्हें पकड़ना, तफ्तीश करना, अदालत में जुर्म साबित हो इस लिये सुबूत जुटाना भी एक कौशल है। दोनों के गठन, उपयोग और भूमिका के उद्देश्य भी अलग अलग है और दोनों जिन परिस्थितियों के लिये प्रशिक्षित किये गए हैं वे भी अलग अलग है। लंबे समय तक सेना न तो पुलिस का काम कर सकती है और न ही पुलिस सेना का । यह बात सरकार को समझनी होगी ।

असफल और दंभी राजनीतिक बॉस सदैव सेना की आड़ लेता है। वह बात बात पर देश की रक्षा करने की कसमें खाते हुए मूर्खता पूर्ण जीने मरने के प्रलाप में निमग्न रहता है।देश और देश की जनता का हित, कल्याणकारी राज्य का संकल्प ऐसे राजनीतिक बॉस के लिये कभी भी महत्वपूर्ण नहीं रहते है। उसे सजग, सतर्क, अपने अपने अधिकारों के लिये जाग्रत जनता की ज़रूरत नहीं रहती और वह ऐसे जन से परहेज ही करता है। बल्कि वह जाग्रत जन गण मन से डरता है। यह डर उसे इन सबसे नफरत करना सिखा देती है। वह एक  भीड़ चाहता है । एक ऐसी भीड़ जो विवेक हर ले और उसकी प्रशस्तिगान और स्वस्तिवाचन करती रहे। वह उसी भीड़ को लोक समझ बैठता है और आत्ममुग्ध हो एक ऐसा लोक रच बैठता है जो शीशमहल की तरह उसके असंख्य अक्स दिखाता है। यह अक्स उसकी मिथ्या लोकप्रियता का रहता है। वह खुद तो भयभीत रहता ही है । लेकिन साथ ही वह हर करतब करता है जिससे जनता भयग्रस्त, आशंकित, और अविश्वास से भरी रहे। अनिष्ट की आशंका और अशनि संकेत का एक मायावी संसार गढ़ कर अपनी ही जनता को डराता रहता है।

उसे यह पता है कि भयमुक्त समाज और लोक सदैव सत्ता के लिये खतरा बन जाते हैं। वह इस खतरे को बखूबी समझता भी है । इसलिए सदैव एक उन्माद का वातावरण बनाये रखना चाहता है। ऐसे राजनेता लोकतंत्र के लिये खतरा तो बनते ही हैं वे देश और जनता के लिये भी एक बड़ा खतरा बन जाते हैं। जब भी किसी लोकशाही में सत्ता के ऐसे लक्षण ( सिम्पटम ) मिलने लगे तो सबको एकजुट हो कर लोकतंत्र को बचाना चाहिये । अगर लोकतांत्रिक परंपराएं, मर्यादाएं, संस्थाए और समाज नहीं बचा तो देश को कभी भी बचाया नहीं जा सकता है। देश बड़ा और महत्वपूर्ण होता है, पर  जन और उसके जीवन के आधार और अधिकार कम महत्वपूर्ण नहीं होते हैं। सजग रहिये, सतर्क रहिये और अभय रहिये। लोकशाही को अधिनायकवाद में बदलने से रोकना होगा।

© विजय शंकर सिंह