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चौराहों पर अपना समय बर्बाद करते युवा

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इस समाज मे,सोसायटी में तमाम तरह के लोग होतें है,अलग अलग फील्ड के लोग सबकी पसन्द,अलग अलग होती है,और एक ही जिस्म होता और दिमाग़ भी एक ही होता है,अब ये अलग अलग तरह के लोग किस तरह अपने दिमाग का इस्तेमाल कहा करतें है ये अहम है। इस बात को समझा जाना बहुत अहम है कि हम अपने दिमाग़ का इस्तेमाल कहा कर रहें है? किस जगह, किस तरह कर रहें है? ये सोचने वाली बात है।
कौन अपने उसी दिमाग का इस्तेमाल का दिमाग कर “आइंस्टाइन” बनेगा और कोंन “मार्क्स” बनेगा या फिर वो “इक़बाल” बनेगा ,ये उसके ऊपर है,और कौन इस दिमाग का इस्तेमाल किसी एक चौराहें पर घण्टों गुज़ार कर उस का इस्तेमाल वहां करेंगे, ये उसे सोचना होगा, और इस बात पर खुद गौर करना होगा कि उसे क्या बनना है? कहा अपनी ताकत ज़ाया करनी है? ये सोचने वाली बात है।
तो आप आस पास ध्यान घुमा कर देखिये किस समाज का “यूथ” कहाँ अपना वक़्त गुज़ार रहा है? हकीकत ये है की बहुत बड़ी तादाद में मुस्लिम मोहल्लों का हाल यही है,आप देखिए,गौर करिये की अपनी कुव्वत कहाँ लगा रहा है? वो क्यों अपने चौराहों को सजा रहा है? क्यों अपने कई कई घण्टे ज़ाया कर रहा है,ये खुद में सोचने वाली बात है।
क्यों चौराहों पर,तिराहों पर,टिककों और कवाबों की दुकानों में अपने अहम वक़्त गुज़ार रहा है ये “यूथ” ? ये गौर करने की बात है,की जो वक़्त करियर बनाने का होता है,फ्यूचर के बारे में सोचने का होता है,और वो अपना वक़्त कहाँ जाया कर रहा है? और फिर उसके बाद अपनी बदहाली और सामाजिक कमज़ोरी का ठीकरा सरकारों पर कैसे फोड़ा जा सकता है?
इस स्थिति की ज़िम्मेदारी पर तमाम लोगों पर थोपा जा रहा है,ये ईमानदारी नही है,क्योंकि हालात की ज़िम्मेदारी अगर सरकारों की है तो मुस्लिम समाज की भी है,उसके “यूथ” की भी है,क्योंकि जब हर एक समाज मे बेहतरी करने वाला अगर इसी समाज से पैदा हो रहा है तो क्यों मुस्लिम मोहल्लों में बड़ी तादाद ऐसे नौजवानों की है जो चौराहों को सजा रहें है? ये भी गौर करने की बात है।

#वंदे_ईश्वरम

असद शैख़