आज होली है।
चलो आज शराफत से कुछ बहकी बहकी बातें करते हैं।वैसे बहके हुए तो आज सब हैं। चुनाव परिणाम आने तक भले ही कितने भी शरीफ क्यों न हों।
वैसे हम इधर खुद को लंपट महिलाओं से बचाने की भरसक कोशिश कर रहे हैं। देखते हैं, कब तक बचते हैं।
आशा है, उधर मुख्यमंत्री बनने की ख़ुशी में मोदी भैया को जसोदा भाभी गुलाल लगाती हैं या नहीं…
अच्छा… ये जो यूपी के दो बदमाश लड़के बुढऊ से भिड़ पड़े थे सो क्या सोचे थे? बुढऊ उस ज़माने के चाय का घी पीकर सठियाये हैं जब हाथी भी दस-दस हाथ के होते थे।
आज हाथी आउटडेटेड हो गए हैं। बड़ी बड़ी स्पोर्ट्स कार सनसनाती हुयी सड़कों पर दौड़ने लगी हैं। चुनाव के सीजन के अलावे बाकी समय बुढऊ पुष्पक विमान की ही हवा खाते हैं सो महिला महावत वाले हाथी की माया पुष्पक विमान की रफ़्तार के आगे कैसे टिके? चुपचाप टेक दिए घुटने।
होली है भाई। आज तो खुल कर बहक सकते हैं न!
जो लोग नोटों की होली जलाने पर प्रलय की आँधी न चला सके, भूकंप न ला सके, वो ईवीएम में हुयी गड़बड़ी पर कैसे आवाज उठा सकेंगे? वैसे भी आज उनके रँगे हुए मुँह बंद हैं। पुए जो खाये हैं। कैसे कुछ बोलेंगे? मणिपुर और गोवा के राज्यपाल उन पर भारी पड़ जाते हैं। खैर, छोड़िये।
हाहाहा… कार्यकर्त्ता?
कुछ लौंडे कहते फिरते हैं कि कार्यकर्ताओं का सम्मान नहीं है पार्टी में, अच्छे नेता नहीं हैं पार्टी में, अच्छे चेहरे आगे नहीं लाये जा रहे… वगैरह, वगैरह!
हाहाहा… होली खेलने से फुर्सत मिले तो खादीधारियों के चरण चाँपने और चप्पलें चाटने की समुचित चेष्टा करें।
कृपा वहीं रुकी हुई है।
उतना कर लें, फिर होली शुभ होगी।
हैप्पी होली।
: – मणिभूषण सिंह

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Manibhushan Singh

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