कांग्रेस का मौजूदा संकट फिलहाल के लिए टलता दिख रहा है, लेकिन इसने पार्टी को आत्ममंथन पर एक बार फिर मजबूर कर दिया है कि आखिर क्यों रह–रह कर पार्टी के नेता अपने ही दल को कमजोर करने में लगे हुए हैं।

दरअसल मौजूदा संकट कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी से पैदा हुआ है, पार्टी के नेतृत्व और कार्यशैली पर सवाल उठाने वाले इनमें से कई नेता कांग्रेस में अहम पदों पर रहे हैं और पार्टी ने सरकार में रहते हुए इन्हें समय-समय पर अहम जिम्मेदारियां भी दी हैं।

इनमें से ज्यादातर नेताओं के राजनैतिक करियर का तीन चौथाई हिस्सा राज्यसभा में बीता है और अब राज्यसभा में इनका कार्यकाल खत्म होने जा रहा है। कांग्रेस इस वक्त ऐसी स्थिति में नहीं है, कि इन्हें वापस राज्यसभा भेज सके। लिहाजा पार्टी की पूरी कार्यशैली पर इन्होंने सवालिया निशान लगाने शुरू कर दिए हैं। जनाधार नहीं होने की वजह से इन नेताओं के लिए कोई चुनाव जीतना भी मुमकिन नहीं लगता, ऐसे में अपने राजनीतिक जीवन के अवसान काल में ये भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए विकल्प ढूंढ रहे हैं।

चिट्ठी लिखकर पार्टी की कार्यशैली पर सवाल उठाने वाले ज्यादातर लोग नेता कम व्यवसायी ज्यादा हैं। इन सबके या तो अपने-अपने कारोबार हैं या फिर कारोबारी घराने में इनका रिश्ता है और इनकी दिक्कत ये होती है, कि सरकार से विरोध मोल लेकर कारोबार चलाना मुश्किल हो जाता है। इसीलिए कांग्रेस में नेताओं की बड़ी फौज के बावजूद सरकार की नीतियों की आलोचना करने में भी राहुल गांधी ज्यादातर अकेले ही खड़े दिखाई देते हैं। उल्टे अपना कारोबार बचाने के चक्कर में इन नेताओं की मजबूरी हो गई है, कि ये राहुल गांधी का ही विरोध करें और सरकार की नीतियों के विरोध में उठ रही आवाज को ये अपनी मौन सहमति भी ना दें।

हालांकि सियासी संकट की इस घड़ी में इन नेताओं के विरोधी सुर के पीछे राहुल गांधी की अपनी नीतियां भी एक हद तक जिम्मेदार हैं, राहुल गांधी ने अपने नेतृत्व में जिन लोगों को बढ़ावा दिया और आगे लाने की कोशिश की, उनकी पार्टी में स्वीकार्यता काफी कम थी। फिर चाहे वो केसी वेणुगोपाल हों या फिर मिलिंद देवड़ा, कुमारी शैलजा, मल्लिकार्जुन खड़गे हों या फिर प्रताप बाजवा। मुंबई कांग्रेस में संजय निरुपम की अपनी एक पहचान रही है जो मुखर वक्ता होने की वजह से पार्टी का पक्ष कामयाबी के साथ रख पाते थे, लेकिन राहुल गांधी ने संजय निरुपम की जगह मिलिंद देवड़ा को आगे बढ़ाया जो कारोबारी परिवार से हैं और सियासत में वो अपनी पहचान मुरली देवड़ा के बेटे होने से ज्यादा की नहीं बना पाए हैं।

कुछ यही हाल केरल में भी है, के सी वेणुगोपाल और शशि थरूर दोनों ही केरल से हैं। शशि थरूर की पहचान दुनिया भर में है लेकिन राहुल गांधी ने केसी वेणुगोपाल को पार्टी में बढ़ावा दिया। केसी वेणुगोपाल को AICC हेडक्वार्टर का इंचार्ज बना दिया गया और ऐसा लगने लगा कि आगे चलकर इन्हें पार्टी का अंतरिम अध्यक्ष भी बना दिया जाएगा। लिहाजा पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं में राहुल की इन नीतियों ने हलचल पैदा कर रखी है और इन्हें घुटन महसूस हो रही है, ऐसे में ये नेता ममता बनर्जी, जगनमोहन रेड्डी और शरद पवार सरीखे नेताओं से अपने लिए विकल्प की उम्मीद लगाए बैठे हैं। जिन्होंने अपना एक जनाधार बना रखा है और उनकी पार्टी का समर्थन इन नेताओं को राज्यसभा पहुंचा सकता है। राज्यसभा की सीट बची रही तो कॉरपोरेट जगत का पे-रोल भी चलता रहेगा और इसके ऐवज़ में कॉरपोरेट घरानों का बिजनेस इंटरेस्ट भी सुरक्षित रहेगा।

दरअसल लड़ाई इंटरेस्ट की ही है, पार्टी में रहते हुए सभी नेता अपना इंटरेस्ट साध रहे हैं। कोई इनसे पूछे कि पार्टी में सारे अहम पदों इतने साल से काबिज रहने के बाद भी अगर ये कार्यशैली का विरोध कर रहे हैं, तो ये विरोध किसका है। अगर पद इन्हें मिला है तो जिम्मेदारी एक परिवार की या एक शख्स की कैसे हो सकती है ?

नोट: यह लेख, लेखक की फ़ेसबुक वाल से लिया गया है

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Vasindra Mishra