देश विचार स्तम्भ

भारत के मरते हुए लोकतंत्र का चेहरा

भारत के मरते हुए लोकतंत्र का चेहरा

देश कभी कभी अपने विचार खो देता है। और ऐसा विशेषतया तब होता है जब घोर नकारात्मक शक्तियाँ देश की आत्मा पर कालिख पोतने लगती हैं। इतना प्रचंड कोलाहल पैदा किया जाता है कि बिलखते हुए देश की मरी हुयी आह कोई नहीं सुनता। अगर किसी तरह किसी के कानों में कभी कोई व्याकुल वेदना की कसकती आवाज धोखे से पड़ भी जाती है तो स्वार्थ और बुद्धि का छलावा उस मद्धिम आवाज पर मिथ्या कुतर्क का काला लबादा डालकर निश्चिन्त हो जाता है।सामूहिक अचेतन की तन्द्रा ऐसी प्रगाढ़ हो जाती है कि चेतन का चैतन्य भी थककर सो जाता है। ऐसे हालात पैदा किये जाते हैं।
देश के शासन का तंत्र उनके प्रभाव में होता है, नागरिकों के मन में सूचना संवाही तंत्र द्वारा विषम अन्धकार भरने की सतत प्रक्रिया चलायी जाने लगती है।
फल यह होता है कि शुभता, कल्याण, विधायकता और सृजनशीलता की मनोवृत्तियों का सम्पूर्ण नाश हो जाता है। श्रेष्ठता और गुणात्मकता का ध्वंस हो जाता है।
फल यह होता है कि समाज के लिए स्वयं की आहुति दे देने वाली इरोम शर्मिला को 85 वोट मिलते हैं और राजा भैया एक लाख वोट से विजयी होते हैं। मुख़्तार अंसारी और रीता बहुगुणा जोशी जीत जाते हैं और हरीश रावत को मुँह की खानी पड़ती है।
समझदार समाज निर्माण की प्रक्रिया से अलग थलग होने लगते हैं। बुद्धू और गधे के हाथ में पतवार आ जाती है।
भारत आज भविष्य खो चुका है। लोकतंत्र सड़ता जा रहा है और इस सड़न से मुक्ति का कोई मार्ग दूर-दूर तक दिखाई नहीं पड़ता क्योंकि सत्ता पक्ष उन्मत्त हो चला है और विपक्ष की नसें इतनी ढीली और लचर हो चुकी है कि उससे कोई भी घनीभूत समेकित विरोधी स्वर नहीं फूट सकता। सन 1972 के चुनाव में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के खिलाफ श्री राजनारायण की याचिका पर माननीय उच्च न्यायालय ने संज्ञान लिया था तो कहा था कि प्रधानमंत्री के पद का दुरुपयोग हुआ है। वह दुरूपयोग आज भी हुआ है या नहीं हुआ है… यह बताने को कोई न्यायालय फुरसत में नहीं है।
बहुतेरे देश ईवीएम का बहिष्कार कर चुके। उन्हें डर है कि इसमें हो सकने वाला फ़्रॉड लोकतंत्र को मौत की नींद सुला सकता है। लेकिन हमारा भारत वाकई महान है। सोशल मीडिया पर, सामाजिक मंचों पर और कुछ संदेहशील राजनेताओं की जबान पर या बड़ा सवाल फन फैलाये खड़ा है कि इन पाँच राज्यों में हुए विधान सभा चुनावों में आखिर ईवीएम फ़्रॉड हुआ या नहीं हुआ मगर अफ़सोस कि किसी के कान पर जूँ तक नहीं रेंग रहे। देवबंद आदि ऐसे बहुतेरे क्षेत्र हैं जहाँ एक दल विशेष के वोटरों का सर्वथा अभाव था लेकिन वही दल भारी बहुमत से उन्हीं क्षेत्रों से जीत गए। आरोपों की हवा तो यहाँ तक गर्म है कि बहुत सारी सीटों पर मतदान के आंकड़े से बहुत अधिक मतगणना के आंकड़े आ गए हैं। कहते हैं, कहीं कहीं तो कुल वोटरों की संख्या से अधिक वोटों की मतगणना हो गयी लेकिन इन सभी अफवाहों को साफ़ करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाये जा रहे। अगर ये अफवाह सच हैं तो भारत की भर्त्सना के शब्द नहीं मिल सकेंगें किन्हीं को।
फिर सवाल मणिपुर और गोवा का भी है। स्पष्ट तौर पर भारत को वह बाजार दिख जाता है जहाँ विधायकों की खरीद-फ़रोख़्त हुयी है। जनादेश के मायने ही खत्म हो गए हैं। लोकतंत्र का मतलब ही बदल गया है। ठेके पर चुनाव और बाजार में बिके विधायकों की सरकार से भारतवर्ष का विशाल और महान लोकतंत्र चलेगा। जिन लोगों ने स्पष्ट जनादेश को धता बताकर गोवा और मणिपुर में सरकार बनायी है वे लोग कौन हैं? शायद नोटबंदी भी उन्हीं की है और राजनैतिक दलों को मिलने वाले चंदे के स्रोत नहीं बताये जाने के विशेषाधिकार का नियम भी उनका ही है। कुल मिलाकर पैसे वाले भी वही हैं और बोलने वाले भी वही हैं।
देश में विपक्ष बलहीन हो गया है। उसकी जिह्वा में वाणी नहीं रही और उसका स्वाभिमान चूर्ण हो चुका है। जनता में पुनर्जागरण जरुरी है ताकि भारत देश का हरेक नागरिक सशक्त विपक्ष की भूमिका में खड़ा हो सके और सबका सम्मिलित विरोधी स्वर मरते हुए लोकतंत्र को मरण से लड़कर जीवन की सीमाओं में लौट आने की हिम्मत और बल दे सके।
इस धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र ने आज कट्टरपंथी, विभाजनकारी और रूढ़िवादी धर्मान्धों के हाथ देश की बागडोर दे दी है। आज असत्य और अधर्म के राजतिलक में सत्य और धर्म की बलि दे दी गयी। चंद सिक्कों और शराब की बोतलों पर बिके लोगों ने शासक चुना है। प्रबुद्ध लोगों का आलस्य प्रगाढ़ है। वे मतदान स्थल पर ही नहीं गए। विडम्बना गहन है।
कोई चिराग जलाओ, बहुत अँधेरा है…
कहीं से रौशनी लाओ, बहुत अँधेरा है…
: – मणिभूषण सिंह

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Manibhushan Singh

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