बस इतना समझ लीजिये कि 40 लाख सिर्फ मुस्लिम नहीं हैं. उसमें वो सभी लोग हैं, जो बंगाली भाषी हैं. उसमें हिन्दू और मुसलमान दोनों हैं. क्योंकि असमिया लोगों को बंगाली बर्दाश्त नहीं, उनकी नज़र में हर बांगलाभाषी बांग्लादेशी है.

अब सवाल ये है, कि जब ये मामला पूर्णतः असमिया और बंगाली के बीच की लड़ाई है, तो इसे सांप्रदायिक रंग किसने दिया ? सवाल महत्वपूर्ण है और इसका जवाब सीधा सा है. भाजपा और कांग्रेस ने. आप कांग्रेस का नाम सुनकर चौंक गए होंगे. पर सच यही है, इस काम में दोनों बराबर के शरीक हैं.

जब 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध के समय बांग्लादेशी रिफ्यूजी भारत की ओर रुख कर रहे थे. तब असम से इसका विरोध हुआ. ज्ञात होकि इन रिफ्यूजियों में बड़ी आबादी बांग्लादेशी हिंदुओं और आदिवासी समूहों की थी. जो कि पूर्वोत्तर राज्यों में अलग-अलग स्थानों में बस गए थे.

बंटवारे के समय एक बड़ी मुस्लिम आबादी जो पूर्वोत्तर राज्यों में बस्ती थी, उसने तात्कालीन पूर्वी पाकिस्तान की तरफ पलायन नहीं की थी, क्योंकि उन्हें ऐसा लगता था कि पडौस में ही है, जो रिश्तेदार हैं उनसे मिलना जुलना होता रहेगा और कुछ ऐसा समझते थे कि पूरा पूर्वोत्तर पूर्वो पाकिस्तान बनेगा. पर बांग्लादेश बनने के समय कुछ रिफ्यूजी भारत आये. जिसके बाद असम के कुछ संगठन और भाद में संघ परिवार ने उसकी आड़ में पूर्वोत्तर की बड़ी बांग्लाभाषी आबादी को ही कटघरे में खड़ा कर दिया.

असम में आरएसएस के छात्र संगठन ABVP ने अपनी गतिविधियाँ तेज करते हुए बांग्लादेशी भागो आन्दोलन शुरू किया. अब यह आन्दोलन सिर्फ और सिर्फ बांग्लाभाषी लोगों का विरोध का आंदोलन नहीं रह गया था. बांग्लादेशी के नाम पर बंगाली मुस्लिमों को टार्गेट किया जाने लगा. असम में बोडो आतंकवादी समूहों द्वारा असम के मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया जाने लगा. फ़िलहाल बोडो संगठनों के साथ भाजपा की सरकार है. पहले कांग्रेस भी इनके साथ सरकार चला चुकी है.

इन सभी ज़ुल्म व सितम के साथ बांग्लाभाषी हिन्दू और मुसलमानों की एक पार्टी का उदय होता है. AIUDF आल इण्डिया यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट. इस पार्टी के उदय के बाद कांग्रेस के माथे पर चिंता की लकीरें पैदा होने लगती हैं. क्योंकि तकरीबन 25 -30 विधानसभा सीटों पर प्रभाव रखने वाली यह पार्टी 14 -18 सीटें जीत लेती है.

अब 2005 में कांग्रेस सरकार NRC लाती है, कि ये तय किया जाये कि कौन यहाँ का नागरिक है और कौन नहीं. पर अफ़सोस की उसे लागू नहीं करवा पाती और 2015 आ जाता है. मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इसे लागू करती है, पर अपने तरीके से. वहीं मनमाना तरीका.

2016 में नया नागरिकता संशोधन भी लाया जाता है. यह संशोधन मोदी सरकार की मानसिकता को दर्शाता है. इस संशोधन के सहारे पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, बर्मा और अन्य देशों के हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध धर्म के लोगों को भारतीय नागरिकता देने के लिए नियमों में ढील दी गई है. सोचिये कि क्या नागरिकता के ये नियम किस मंशा से बनाये जा रहे हैं. क्या धर्म के आधार पर एक धर्मनिरपेक्ष देश में नागरिकता दी जायेगी. एक तो इस ढील की ज़रूरत नहीं थी, फिर अगर आप नागरिकता नियम बदल रहे हैं तो धर्म के आधार पर क्यों ? इस लिस्ट में मुस्लिमों और ईसाईयों को क्यों शामिल नहीं किया.

2016 के नागरिकता संशोधन को देखने के बाद क्या आपको इज़राईल के उस नियम की बू नहीं आती. जिसके मुताबिक़ दुनिया भर के यहूदी इज़राईल के नागरिक हैं. असम के NRC वाली लिस्ट और नागिरकता संशोधन 2016 को जोड़कर देखिये. आपको देश के डेमोग्राफी को बिगाड़ने की इज़राईली और संघी साज़िश की बू आएगी. ये अलग बात है, कि सारे काम नियम व कानून बनाकर किये जा रहे हैं. ताकि ये कहने को न रहे कि कुछ भी गैरकानूनी नहीं किया गया है.

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