एक महीने बाद मोदी सरकार के चार साल पूरे हो जाएंगे इन चार सालों में राजनीतिक, सामाजिक, और आर्थिक तौर से भारत व्यस्त ही है, हर नया सवेरा एक नया मुद्दा लेकर आता है और लेकर आता है अविश्वास, डर, और गुस्सा।
इन चार सालों में शायद ही कोई ऐसा तबका रहा होगा जो मोदी सरकार के प्रकोपों से बचा हो। सबका साथ सबका विकास करने वाली सरकार की सच्चाई वास्तव में कुछ और ही है, ये चार सालों में अनुसूचित जाति व आदिवासियों पर बहुत भारी पड़े है इनको लेकर सरकार की नीतियां और उठाये गए कदम पूरी तरह विरोधी नज़र आते है।

गुजरात के ऊना में दलितों पर हमला और उसके बाद दलित संगठनों का प्रदर्शन

मोदी सरकार की नीतियों से जुड़े और उन नीतियों के प्रभावो को दिखाने वाले कुछ आंकड़े सामने आए है जो पर्दे के पीछे की सच्चाई दिखाते है जिनको छुपाने के लिए अलग से नए मोदी खड़े कर दिए जाते है न ही भारतीय गोदी मीडिया का ध्यान यहां जा पाता है।
भाजपा के कार्यालय में भीड़ द्वारा हमला, उत्पीड़न, धार्मिक रूढ़िबद्धता को आदर दिया जा रहा है। मुंबई, आगरा, रायपुर , खंडवा , ग़ाज़ीपुर, में चर्च पर हमले और बर्बरता की श्रृंखला ने  नफ़रत, डर और असुरक्षा के सर्वव्यापी वातावरण को सबके सामने ला दिया।

नेशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार भाजपा की सरकार में हर बारह मिनट में कोई दलित क्रूरता का शिकार होता है ( 2016 – 2017) में दलितों के प्रति क्रुरता के 40,801 मामले आए। दलितों के प्रति हिंसा के मामले में भाजपा शासित पांच राज्य  उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात सबसे ऊपर है।

भारत मे दलितों के प्रति अचिन्त्य हिंसा ने राष्ट्र की  अंतश्चेतना को हिला कर रख दिया है। लगभग हर राज्य में कहिं न कहीं ऐसा मामला जरूर दिख जाता है जो इस पिछड़े समुदाय की अवहेलना का प्रमाण दिखाता है।

मध्यप्रदेश के सिहोर में पचास दलित परिवारों को उनकी जमीन से बेदखल कर दिया गया,  हैदराबाद में रोहित वेमुला की हत्या, राजस्थान में दलित लड़की की रेप के बाद हत्या, गुजरात चार दलित युवाओं को पीटते हुए सड़क पर घसीटना, राजस्थान में दस वर्षीय दलित बच्चे को स्कूल में मिड डे मील छूने पर बर्बरता से पीटा जाना, कोई सिर्फ संयोग वश घटी घटनाएं नही है बल्कि कानून व्यवस्ता और सरकारी अनदेखी का परिणाम है।

मध्यप्रदेश के सीहोर के पीड़ित दलित परिवार

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में दलितों के घरों को जलाकर खाक कर देना, भाजपा की दलितों विरोधी सोच व पूर्वनिर्धारित और राज्य द्वारा प्रायोजित हिंसा का चेहरा सामने लाता है। 2010 में अनुसूचित जाति के लिए बजट का 4.8 प्रतिशत आवंटित होता था जिसे 2017 – 2018 में 2.5 प्रतिशत कर दिया गया है।

 
2013 में कांग्रेस की सरकार ने 92,928 दलित युवाओं को नोकरियाँ दी जबकि 2015 में यह आंकड़ा 91 प्रतिशत काम होकर 8, 436 रह गया। 84, 492 नोकरियाँ खत्म कर दी गई व अभी 31 प्रतिशत (28, 173) स्थान अभी भी खाली है।

भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर रावण

2013 – 2014 में प्री मैट्रिक एससी स्कॉलरशिप स्किम के लिए 882 करोड़ आवंटित किए जो 2018 ; 2019 में 86 प्रतिशत( 757 करोड़) कम कर दिया। एससी के लिए  क्रेडिट गारंटी स्किम  में 2016 -2017 में 10 करोड़ दिए गए जिसको  2018 – 2019 में मात्र 1 लाख कर दिया गया।
 

” एम्प्लॉयमेंट एंड रिहैब ऑफ मैन्युअल स्कैवेंजर फ़ॉर एससी ” के तहत 2014 -2015 में 439 करोड़, 2015 -2016 में 461 करोड़, 2016- 2017 में 10 करोड़, 2017- 2018 में 5 करोड़, 2018 – 2019 में 20 करोड़ आवंटित किया गया जिसमें से सिर्फ 2016 – 2017 में  1 करोड़ ही खर्च किया गया बाकी साल कोई व्यय नही किया गया।

सांकेतिक फ़ोटो – आदीवासी समुदाय

आदिवासी समुदाय के हाल भी ऐसे ही हैं

आदिवासी समुदाय की बात करे तो यहां भी दलितों जैसा ही हाल है 2011 की जनगणना के अनुसार भारत मे अदिवादियों की संख्या 10. 45 करोड़ थी। तबकी कांग्रेस सरकार ने जिनको राइट तो फारेस्ट के द्वारा जल जंगल और ज़मीन का अधिकार दिया। चार साल की भाजपा सरकार ने आते ही इनसे यह अधिकार भी छीन लिया।

  • इन तीन सालों में जंगल से संबंधित उत्पादों की ख़रीदी  में 12, 445 टन की गिरावट आई है।
  • जो 2014 -2015 में 19,975 थी, 2015 -2016 में 13,121 व 2016 – 2017 में 7, 530 रह गई ।
  • इन चार सालों में आदिवासियों के प्रति अपराधों में अभूतपूर्व उछाल आया है 2015 में 6376 मामला सामने आए व 2016 में 6568 में 4.7 प्रतिशत मामले सामने आए।
  • मध्य प्रदेश इस मामले में सबसे आगे है जहां एसटी के प्रति अत्याचार के 27 प्रतिशत ( 1, 823) मामले आए दूसरे स्थान पर राजस्थान  है जहां 18.2 प्रतिशत (1,195) मामले सामने आए।
  • एसटी वेलफेयर स्किम के नंबर भी नीचे गिरे है जो 2016 – 2017 में 307 व 2017 – 2018 में 262 हो गई।
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Ankita Chauhan

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