अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस हर वर्ष, 8 मार्च को मनाया जाता है.विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के प्रति सम्मान, प्रशंसा और प्यार प्रकट करते हुए इस दिन को महिलाओं के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक उपलब्धियों के उपलक्ष्य में उत्सव के तौर पर मनाया जाता है. सम्पूर्ण विश्व की महिलाएं देश, जात-पात, भाषा, राजनीतिक, सांस्कृतिक भेदभाव से परे एकजुट होकर इस दिन को मनाती हैं.
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की कई वजह हैं.दरअसल इतिहास के अनुसार समानाधिकार की यह लड़ाई आम महिलाओं द्वारा शुरू की गई थी. प्राचीन ग्रीस में लीसिसट्राटा नाम की एक महिला ने फ्रेंच क्रांति के दौरान युद्ध समाप्ति की मांग रखते हुए इस आंदोलन की शुरूआत की, फारसी महिलाओं के एक समूह ने वरसेल्स में इस दिन एक मोर्चा निकाला, इस मोर्चे का उद्देश्य युद्ध की वजह से महिलाओं पर बढ़ते हुए अत्याचार को रोकना था.
19वीं सदी में औद्योगिक देशों में बड़े बदलाव आए. सामाजिक उथल पुथल शुरू हो गई और उसके साथ आई नई और क्रांतिकारी सोच. महिलाएं भी ज्यादा अधिकारों की मांग करने लगीं.
औद्योगिक विकास के दौर में महिलाओं के बीच बहुत बहस छिड़ी. महिलाओं पर जुल्म और पुरुषों के मुकाबले समाज में उनके निचले दर्जे की वजह से कई महिलाओं ने अपनी आवाज उठानी शुरू की. 1908 में न्यूयॉर्क में कई हजार महिलाओं ने ज्यादा अधिकारों के लिए एक रैली में हिस्सा लिया. उनकी मांग थी, काम के लिए बेहतर वेतन, कम घंटे और वोट देने का अधिकार.
सन 1909 में सोशलिस्ट पार्टी ऑफ अमेरिका द्वारा पहली बार पूरे अमेरिका में 28 फरवरी को महिला दिवस मनाया गया.फिर 1910 में डेनमार्क की राजधानी कोपनहागेन में महिलाओं के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन हुआ.सोशलिस्ट इंटरनेशनल द्वारा कोपनहेगन में महिला दिवस की स्थापना हुई.
क्लारा जेटकिन नाम की महिला ने इस बैठक में महिलाओं के लिए एक अंतरराष्ट्रीय दिवस तय करने की पहल की. जेटकिन जर्मन सोशल डेमोक्रेट पार्टी के महिला विभाग की प्रमुख थीं. उनका कहना था कि साल में एक दिन होना चाहिए जब महिलाएं अपनी मांगों को सबके सामने रख सकें. सम्मेलन में आईं 100 से ज्यादा महिलाओं ने इस बात का स्वागत किया और हर साल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को मनाने का फैसला किया.
1911 में ऑस्ट्रि‍या, डेनमार्क, जर्मनी और स्विटजरलैंड में लाखों महिलाओं द्वारा रैली निकाली गई.मताधिकार, सरकारी कार्यकारिणी में जगह, नौकरी में भेदभाव को खत्म करने जैसी कई मुद्दों की मांग को लेकर इस का आयोजन किया गया था.1913-14 प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, रूसी महिलाओं द्वारा पहली बार शांति की स्थापना के लिए फरवरी माह के अंतिम रविवार को महिला दिवस मनाया गया.
इसके बाद भी विश्व भर से महिला कार्यकर्ता तय नहीं कर पाए कि साल में किस दिन को महिला दिवस बनाया जाए. 1914 में पहले विश्व युद्ध के खिलाफ कई महिला संगठनों ने प्रदर्शन किए. इनको महिला अधिकारों के साथ जोड़कर आखिरकार 8 मार्च को महिला दिवस घोषित किया गया.
यूरोप भर में भी युद्ध के खिलाफ प्रदर्शन हुए.1917 तक विश्व युद्ध में रूस के 2 लाख से ज्यादा सैनिक मारे गए, रूसी महिलाओं ने फिर रोटी और शांति के लिए इस दिन हड़ताल की. हालांकि राजनेता इस आंदोलन के खिलाफ थे, फिर भी महिलाओं ने एक नहीं सुनी और अपना आंदोलन जारी रखा और इसके फलस्वरूप रूस के जार को अपनी गद्दी छोड़नी पड़ी साथ ही सरकार को महिलाओं को वोट देने के अधिकार की घोषणा भी करनी पड़ी.
महिला दिवस अब लगभग सभी विकसित, विकासशील देशों में मनाया जाता है. यह दिन महिलाओं को उनकी क्षमता, सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक तरक्की दिलाने व उन महिलाओं को याद करने का दिन है, जिन्होंने महिलाओं को उनके अधिकार दिलाने के लिए अथक प्रयास किए.
भारत में भी महिला दिवस व्यापक रूप से मनाया जाने लगा है.पूरे देश में इस दिन महिलाओं को समाज में उनके विशेष योगदान के लिए सम्मानित किया जाता है और कई तरह के समारोह आयोजित किए जाते हैं.
भारत में महिलाओं को शिक्षा, वोट देने का अधिकार और मौलिक अधिकार प्राप्त है.धीरे-धीरे परिस्थितियां बदल रही हैं.भारत में आज महिला आर्मी, एयर फोर्स, पुलिस, आईटी, इंजीनियरिंग, चिकित्सा जैसे क्षेत्र में पुरूषों के कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं.माता-पिता अब बेटे-बेटियों में कोई फर्क नहीं समझते हैं. लेकिन यह सोच समाज के कुछ ही वर्ग तक सीमित है.
सही मायने में महिला दिवस तब ही सार्थक होगा जब विश्व भर में महिलाओं को मानसिक व शारीरिक रूप से संपूर्ण आजादी मिलेगी, जहां उन्हें कोई प्रताड़ित नहीं करेगा, जहां उन्हें दहेज के लालच में जिंदा नहीं जलाया जाएगा, जहां कन्या भ्रूण हत्या नहीं की जाएगी, जहां बलात्कार नहीं किया जाएगा, जहां उसे बेचा नहीं जाएगा.
संयुक्त राष्ट्र संघ ने महिलाओं के समानाधिकार को बढ़ावा और सुरक्षा देने के लिए विश्वभर में कुछ नीतियां, कार्यक्रम और मापदण्ड निर्धारित किए हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार किसी भी समाज में उपजी सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक समस्याओं का निराकरण महिलाओं की साझेदारी के बिना नहीं पाया जा सकता.

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Durgesh Dehriya

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