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क्या मुस्लिमों के प्रति नफ़रत का ज़हर बो रहा है “ज़ी न्यूज़” ?

क्या मुस्लिमों के प्रति नफ़रत का ज़हर बो रहा है “ज़ी न्यूज़” ?

जिस वक़्त पूरी दुनिया कोरोना वायरस के ख़तरे से बचने के लिये नए नए उपाय तलाश रही थी, उस वक़्त भारतीय मीडिया का एक धड़ा मुस्लिम दुश्मनी में अंधा होकर अपने ही देश के नागरिकों के खिलाफ नफरत फैलाने में व्यस्त था। सुधीर चौधरी नाम का बौद्धिक आतंकवादी एक वर्ग विशेष को मुसलमानों और सेक्यूलरों की नस्लकुशी करने के लिये माहौल तैयार कर रहा था। इस बौद्धिक आतंकवादी द्वारा कट्टर जेहाद की श्रेणी में जनसंख्या जेहाद, लव जिहाद, ज़मीन जेहाद, शिक्षा जेहाद, पीड़ित जेहाद, सीधा जेहाद आते हैं। वहीं वैचारिक जेहाद की श्रेणी में आर्थिक जेहाद, ऐतिहासिक जेहाद, मीडिया जेहाद, फिल्म और संगीत जेहाद, धर्मनिर्पेक्षता का जेहाद को रखा है। वास्तव में जेहाद अहिंसात्मक संघर्ष है जिसमें आदमी अपने सुधार के लिए प्रयास करता है। इसका उद्देश्य है बुरी सोच या बुरी ख़्वाहिशों को दबाना और कुचलना।
लेकिन बीते दो दशक में मीडिया के प्रोपगेंडे ने जेहाद का मतलब आतंकवाद कर दिया है। मुस्लिम उलमा जेहाद को परिभाषित करते रहे, उनके बयान उर्दू अख़बारात में छपते रहे लेकिन हिन्दी और अंग्रेज़ी मीडिया जेहाद को आतंक का पर्याय बताता चला गया। भारत में सत्तासंरक्षण में पलने वाले दक्षिणपंथी संगठनों ने एक बहुत बड़े वर्ग को मुसलमानों से नफरत करने के लिये तैयार कर लिया, अब वे किसी भी राह चलते राहगीर की जान लेने से नहीं चूकते। देश में लगातार नफरत बढ़ती जा रही है, नफरत की आग में जली दिल्ली के ज़ख्म अभी ताजा हैं ऐसे में सुधीर चौधरी नाम का बौद्धिक आतंकवादी जेहाद को मनघड़ंत तरीक़े से एक सोची समझी साजिश के तहत लफ्ज़ ए जेहाद के नाम पर मुसलमानों के ख़िलाफ नफरत को धार दे रहा है।
भारतीय मीडिया हिटलर के प्रचार मंत्री जोसेफ गोएबेल्स का अनुसरण कर रहा है। हिटलर के उस मंत्री का कहना था कि एक झूठ को अगर कई बार दोहराया जाए तो वह सच बन जाता है। लगभग हर रोज़ मुसलमानो के खिलाफ टीवी पर डिबेट होती हैं। हद तो तब हो जाती है कि जब कठुआ में एक आठ साल की बच्ची के बलात्कारियो, और क़ातिलों को बचाने के लिये सुधीर चौधरी जैसा बौद्धिक आतंकी और दैनिक जागरण जैसा अखबार फर्जी ख़बर प्रकाशित करता है, कि बच्ची के साथ दरिंदगी नहीं हुई थी। पिछले कुछ वर्षों में टीवी का जो रूप देखने को मिला है उसकी क़ीमत किसी पहलू ख़ान, किसी अज़ीम, किसी अलीमुद्दीन, किसी अफराजुल ने चुकाई है।
आप यह कहकर आंख मूंद सकते हैं कि अब ‘समझदार’ लोग टीवी नहीं देखते। बेशक समझदार लोग टीवी नहीं देखते होंगे लेकिन एक बड़ा तबक़ा टीवी देखता है और सुधीर जैसे बौद्धिक आतंकवादियों को ‘राष्ट्र भक्त’ पत्रकार मानते हुए इसके ‘डीएनए’ की चपेट में आ चुका है। टीवी पर लव जेहाद पर बहस हुईं, लव जेहाद नाम का प्रोपगेंडा अदालत में तो टिक नहीं पाया लेकिन एक बड़े वर्ग के दिमाग़ में इसने जगह बना ली। शंभू रेगर नाम के बर्बर हत्यारे ने एक पचास वर्षीय मजदूर की हत्या करने का कारण लव जेहाद बताया।
मीडिया लगातार मुसलमानों के ख़िलाफ नफरत फैला रहा है। ताकि एक वर्ग विशेष का सैन्यकरण करके उसे मुसलमानो की नस्लकुशी करने के लिये तैयार किया जा सके। मीडिया के इस प्रोपगेंडे के खिलाफ क्या प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को संज्ञान नहीं लेना चाहिए? क्या मुस्लिम धार्मिक संगठनों, उलमाओं को इसके ख़िलाफ कोर्ट नहीं जाना चाहिए? क्या इस्लामिक धर्म गुरुओं को जाकर सुधीर चौधरी जैसे बौद्धिक आतंकवादी को जेहाद का अर्थ नहीं बताना चाहिए? क्या गृहमंत्रालय को इस पर संज्ञान नहीं लेना चाहिए? इस प्रोपगेंडा के कारण अभी तो चंद ही घटनाऐं सामने आईं हैं, अगर सरकार, समाजिक संगठन, धार्मिक संगठन इस प्रोपगेंडे के खिलाफ एक्शन नहीं लेंगे तो यह एक लाईलाज बीमार बन जाएगा, और मुसलमान की जान लेना राष्ट्रभक्ती एंव धर्म रक्षा माना जाने लगेगा।

नोट : – लेखक हिन्द न्यूज़ के एडिटर हैं

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Wasim Akram Tyagi

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