शेयर मार्केट में अफरातफरी भरी गिरावट 8 नवंबर 2016 को लागू किये गए मूर्खतापूर्ण कदम नोटबंदी के परिणाम हैं। तब कहा गया था कि इसके दूरगामी परिणाम होंगे। मित्रों हम उसी दूरगामी परिणाम की मंज़िल तक पहुंच गए हैं। आज (12 मार्च 2020) शेयर बाजार लगातार गिर कर 500 अंको की वृद्धि के साथ कुछ संभला है। लेकिन भरोसे में कमी और साख का संकट इस मंदी को राहु की तरह ग्रसे हुआ है। इसके बावजूद भी सरकार की प्राथमिकता आर्थिक मोर्चे पर नहीं राजनीतिक मोर्चे पर दिख रही है।

वैश्विक मंदी तो पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में समय समय पर 1929 के अमेरिकी महामंदी के समय से आज तक आती रही है। लाभ और शोषण पर आधारित पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में यह रुग्णता रहती ही है। ऐसी ही एक मंदी सन 2008 में भी आयी थी। तब डॉ मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री थे। लेकिन तब कोई बैंक नहीं डूबा था। न ही बाजार में इतना सन्नाटा था या मांग की कमी थी। वर्तमान आर्थिक मंदी, भारतीय आर्थिकी में आयी हुयी एक अभूतपूर्व मंदी है, जिसने हमारे बैंकिंग सेक्टर को हिलाकर रख दिया। इस मंदी की शुरुआत तो  नोटबंदी जैसे बेवकूफी भरे आर्थिक कदम के बाद ही हो गया था। जो मेरी बात से असहमत है वह नोटबंदी के फायदे गिना सकते हैं । सरकार ने जो लाभ औऱ अपेक्षा नोटबंदी के इस कदम से की थी उनमे से कितना लक्ष्य प्राप्त हुआ है, यह अभी तक सार्वजनिक नहीं हो पाया है। किसी को पता हो तो बता सकता है।

सरकार ने संसद में डूबे कर्ज़ से जुड़े आंकड़ों की जानकारी देते हुए देश के 5 बड़े सरकारी बैंक के एनपीए पर इसी 3 मार्च को राज्यसभा में पेश की गई एक रिपोर्ट के बताया है कि

  • वित्त वर्ष 2019-2020 में सबसे अधिक ₹  1,59,661 करोड़ का एनपीए भारतीय स्‍टेट बैंक का है।
  • पंजाब नेशनल बैंक 76,809 करोड़ के साथ दूसरे साथ पर है।
  • तीसरे स्थान पर बैंक ऑफ बड़ौदा है जिसका एनपीए ₹ 73,140 करोड़ का है।
  • बैंक ऑफ इंडिया का 61,730 करोड़ रुपये का कर्ज डूब गया है। यह चौथे स्थान पर है।
  • यूनियन बैंक ऑफ इंडिया का एनपीए अब तक ₹ 49,924 का हो चुका है।

5 करोड़ से अधिक कर्ज लेने वाले एनपीए खाताधारकों में, विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे लोग बैंकों के करोड़ों रुपए लेकर विदेश भाग चुके हैं और बैंक लाख कोशिशों के बावजूद अपने पैसे वापस पाने में अभी तक नाकाम रहे हैं। वे कब आएंगे यह किसी को नहीं पता है।

भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, 31 मार्च 2019 तक 5 करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज नहीं चुकाने वाले 6,699 खातों को डूबे कर्ज एनपीए के बट्टेखाते मे डाल दिया गया है। देश मे  निजी क्षेत्रों के बैंकों के कुल 1859 खाते है। इसके अलावा विदेशी बैंकों के भी 220 कर्जदारों को एनपीए की सूची में रखा गया है। जबकि लघु फाइनेंस बैंकों में पांच करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज लेकर उसे वापस न करने वाले कर्जदार सिर्फ 6 हैं।

एनपीए हुए या डूबे कर्ज़ से सबसे अधिक प्रभावित आम खाताधारक ही होते हैं। यह कहना है, एस्कॉटर्स सिक्योरिटीज के रिसर्च हेड आसिफ इकबाल का। उनके अनुसार

” एनपीए बढ़ने से सबसे अधिक नुकसान बैंक के सामान्य खाताधारकों को ही है। इस समय सरकारी बैंकों द्वारा दिए गए कुल कर्ज का 10 फीसदी से अधिक एनपीए हो चुका है, जो बैंकों की सेहत के लिए ठीक नहीं है. इससे आम खाताधारकों की ही जेब कटती है। ”

इससे यह स्पष्ट है कि

” अगर बैंक के पास कम पैसा होगा तो सामान्य ग्राहकों को आसानी से कर्ज के लिये धन नहीं मिलेगा. वहीं, बैंक अपनी ग्राहक सेवा  को बेहतर करने के लिए अपने आंतरिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर ज्यादा खर्च नहीं कर पाएगा. जैसे ऑनलाइन सर्विसेज, एटीएम सर्विसेज और ग्राहकों से जुड़ी अन्य सुविधाओं का विस्तार नहीं कर पाएगा। “

अर्थव्यवस्था के जानकारों के अनुसार, पहले बिना सोचे-समझे किसी सिफारिश और जुगाड़ से ऐसे व्यक्ति और संस्थान को बैंक लोन दे देते हैं, जो उसे वापस नहीं करते थे। फिर जब बैंक पर आर्थिक बोझ बढ़ने लगता है, तो नुकसान की भरपाई के लिए बैंक मैनेजमेंट अपने ग्राहकों पर तरह-तरह के अधिभार लगा  देते हैं। मिनिमम बैलेंस और क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड पर तरह-तरह का नियम थोप देते हैं। ट्रांजेक्शन पर पैसा कटने लगता है, एटीएम से पैसे निकालने पर चार्ज बढ़ा देते हैं, आपकी जमा रकम पर ब्याज कम कर देते हैं। हालांकि अभी स्टेट बैंक ने न्यूनतम जमा सीमा खत्म कर दी है और ऋण भी सस्ते किये हैं। बैंकों ने इन ग्राहकों पर बोझ बढ़ाने वाले कई अधिभारों से काफी कमाई की है लेकिन यह प्रथा लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा के विरुद्ध है।

आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक 31 मार्च 2015 को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का कुल एनपीए 2,79,016 करोड़ रुपये था जो 31 मार्च 2018 तक बढ़कर 8,95,601 करोड़ रुपए हो गया। सरकार की कोशिशों के बाद 31 दिसंबर 2019 तक यह फिर घटकर 7,16,652 करोड़ रुपये रह गया है। आरबीआई के मुताबिक 7,16,652 करोड़ रुपये है सरकारी बैंकों का एनपीए है। आरबीआई के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2016-17 में स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद का कुल डूबा कर्ज 18,212 करोड़ रुपये था। स्टेट बैंक ऑफ पटियाला का 17,847 करोड़ रुपये, स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर का 10,677, स्टेट बैंक ऑफ मैसूर का 9,915 और स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर का एनपीए 8,817 करोड़ रुपये का था। यहां तक कि भारतीय महिला बैंक लिमिटेड में भी 55 करोड़ रुपये का कर्ज डूब गया था।

सबसे बड़े निजी बैंकों में से एक यस बैंक का ही उदाहरण लें। हाल ही बैंक के संकटग्रस्त होने के कारण ₹ 50 हज़ार से अधिक की निकासी पर आरबीआई द्वारा रोक लगा दी गयी है। अब एक नज़र यस बैंक द्वारा दिये गए ऋण पर डालते हैं।

  • 2004 से 2014 मनमोहन सिंह की सरकार, इन दस वर्षों में यस बैंक ने ₹ 55633 करोड़ का लोन दिया है।
  • 2014 में मोदी सरकार के समय यस बैंक द्वारा लोन देने की रफ़्तार अचानक तेज हो जाती है।
  • 2014 – 2015 में बैंक से 20 हज़ार करोड़ के लोन दिए गए
  • उसके बाद एक साल 2015-2016  में 23000 करोड़ के अतिरिक्त लोन दिए गए ।

इसके बाद अर्थव्यवस्था का पतन काल शुरू हो जाता है। यह समय 8 नवम्बर 2016 को रात 8 बजे नोटबंदी से शुरू होता है।

  • 2014 से 2019 के बीच यस बैंक ने 186000  करोड़ के लोन दिए और यस बैंक डगमगाना शुरू करता है वर्ष 2016 से।
  • 2017 के बाद रिज़र्व बैंक ने एक डिप्टी गवर्नर को निगरानी के लिये नामित किया लेकिन ऋण बांटने का सिलसिला चलता रहा। आरबीआई द्वारा नामित अफसर किसके इशारे पर खामोश बना रहा।

अभी जांच यस बैंक के संस्थापक राणा कपूर के इर्दगिर्द चल रही है, पर यस बैंक ने सबसे अधिक ऋण तो तब बांटा जब राणा कपूर बैंक छोड़ गया था। जब बैंक आरबीआई के नियंत्रण में था तब बांटे गए लोन की जिम्मेदारी कौन लेगा?

8 नवम्बर की नोटबंदी के बाद उत्पन्न अव्यवस्था और आशंका भरी अफरातफरी के बीच यस बैंक पर और लोन देने का दबाव पड़ता है, क्योंकि नोटबन्दी से कारोबारी और आर्थिक माहौल में मंदी का प्रभाव शुरू हो चुका था। सरकार ने उद्योगों को नोटबंदी जन्य मंदी से उबारने तथा अपने पूंजीपति मित्रों को संभालने के लिये, बैंकों को और अधिक, ऋण बांटने हेतु बहुत से निर्देश दिए। इसके परिणामस्वरूप पहले से कुछ कमज़ोर बैंक, जिनका एनपीए अधिक था को यह उम्मीद जगी कि उन्हें  शायद सरकार संभाल लेगी और उनकी सहायता करने के लिये आगे आएगी। इसलिए तो कुछ बैंकों ने  इन निर्देशों के अनुसार और अधिक ऋण देना शुरू कर दिया।  जिन कंपनियों को किसी अन्य बैंक से लोन नहीं मिलता था, और वे ऋण देने से इंकार कर देती थीं। तो उसको यस बैंक, बिना सोचे बिचारे, लगातार ऊँची ब्याज दरों पर कर्ज देता रहा। इन कंपनियों में  कैफे कॉफी डे, जेट एयरवेज, वोडाफोन, अनिल अंबानी समूह, एस्सेल, डीएचएफएल, वीडियोकॉन,  आईएलएफएस उन संकटग्रस्त कंपनियों में शामिल हैं। इन सभी को यस बैंक ने खूब कर्ज दिया था। अब इन सभी कंपनियों में से कुछ पूरी तरह से डूब चुकी हैं और कुछ गंभीर रूप से संकटग्रस्त हैं।

कैफे कॉफी डे के मालिक ने आत्महत्या कर ली। जेट एयरवेज पिछले साल ही दिवालिया हो गई। जेट एयरवेज के मालिक, नरेश गोयल के खिलाफ जांच चल रही है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा आदेशित एजीआर भुगतान को लेकर आइडिया वोडाफोन का भविष्य अनिश्चित है। कब यह कम्पनी ऑफ एयर हो जाय नहीं कहा जा सकता है। दीवान हाउसिंग फाइनेंस ने तो अपना कारोबार ही बंद कर दिया है और 30 साल पुरानी  आईएलएफएस बुरी तरह से संकटग्रस्त  है। वीडियोकॉन बंद हो चुकी। अनिल अम्बानी ने तो लन्दन की एक अदालत में अपनी जेब उलट कर दिखा दिया कि उनके पास कुछ नहीं है। अलबत्ता अभी उनके पास राफेल का ठेका है।

गंभीरता से देखें तो यस बैंक और इन कंपनियों पर जो विपत्ति आई है वर्ष 2016 के बाद ही आयी है। नोटबंदी नामक बर्बर कार्यवाही ने पहले से कमजोर कंपनियों का दिवाला निकाल दिया। यस बैंक भी इसमें फंसकर अपनी पूँजी गँवा बैठा और आज उसको सरकारी क्षेत्र के सबसे बड़े पर सबसे बड़े एनपीए वाले बैंक एसबीआई की पीठ पर चढाने का प्रयास हो रहा है। हालांकि एसबीआई सबसे बड़ा बैंक है, पर उसका एनपीए भी बहुत अधिक है। अगर वह यस बैंक को बचाने के लिये सरकार के दबाव से सामने आता है तो भी उसे यस बैंक की बुरी अर्थिक हालत से प्रभावित होना पड़ेगा। इन स्थितियों में ग्राहक का पैसा बैंक में कितना सुरक्षित है हम नहीं जानते। यही सवाल बैंकों की साख और भरोसे पर बार बार अंकुश की तरह जनता या आम खाताधारकों के जेहन में उठ रहा है।

चूँकि नोटबंदी के दौरान लोगों ने बैंक में जमा अपना ही पैसा, बैंकों द्वारा न देने से इनकार करने का मामला पहली बार देखा है, तो वे अब बैंकों पर पूरी तरह से भरोसा नहीं कर पा रहे हैं। यह संकट  एक बैंक के डूबने का नहीं पूरे भारतीय बैंकिंग सिस्टम की टूट रही साख और भरोसे का है, जिसे तत्काल न रोका गया तो कोई भी बैंक भविष्य में बच पायेगा, इस पर संदेह है। साख का संकट और संस्थानों पर भरोसा अगर एक बार हो या टूट जाय तो फिर अर्थव्यवस्था हो या सामाजिक तानाबाना सबके उबरने की संभावनाएं कम हो जाती हैं। अगर आर्थिक हालत गड़बड़ है और सरकार इस समस्या को मान रही है तो उसे इस मंदी से उबरने के स्पष्ट और उचित उपाय विशेषज्ञों की सहायता से करने होंगे।

कोरोना महामारी तो अब आयी है। पर अर्थव्यवस्था में जो घातक वायरस है वह तो तीन साल पहले से आ चुका है। नोटबंदी के बाद सारे आर्थिक सूचकांक, चाहे वह बेरोज़गारी से जुड़े हो या मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर से या जीडीपी से संबंधित हो सबके परिणाम नोटबंदी के बाद लगातार निराशाजनक आ रहे हैं, और यह क्रम अभी भी थमा नहीं है। अब कोढ़ में खाज की तरह, कोरोना भी आ गया। कोरोना वायरस की आड़ में सरकार आपनी अक्षमता न छुपाए। कोरोना वायरस जन्य महामारी से बचाव के लिये जरूरी कदम उठाए जांय। सरकार कुछ कदम उठा भी रही हैं । कोरोना महामारी इस मंदी को और बढ़ाएगी। जैसा मौसम पलटी मार रहा है उसका असर खेती किसानी पर भी पड़ेगा। अगर यह मंदी कृषि क्षेत्र में आ गयी तो, फिर क्या होगा इसका अनुमान अभी नहीं लगाया जा सकता है।

इसी के साथ यह खबर भी महत्वपूर्ण है कि सरकार, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और उपराष्ट्रपति के प्रयोग के लिए डबल बोइंग वाला अत्याधुनिक जेट खरीदने जा रही है। ऐसी आर्थिक मंदी के दौर में सरकार की यह फिजूल खर्ची ही कही जाएगी। कम से कम सरकार को फिलहाल इस सौदे से दूर हो जाना चाहिये।

© विजय शंकर सिंह