December 8, 2021
देश विचार स्तम्भ

डॉ अंबेडकर पूजने की "वस्तु" नहीं..अपनाये जाने वाले "लीजेंड"(दिव्यचरित्र) हैं

डॉ अंबेडकर पूजने की "वस्तु" नहीं..अपनाये जाने वाले "लीजेंड"(दिव्यचरित्र) हैं

मैं, फ़िक्रमंद हूँ कि वर्णाश्रम के आख़िरी पायदान पे लटका दिये गए “शूद्र” अपना “ज़िंदा अस्तित्व” मनुवादी निज़ाम मे कैसे ढूंढ सकते हैं? उसमें भी ख़ासकर अतिशूद्र वर्ग ?  इससे बुरा और क्या हो सकता है कि अछूतों के अंदर भी “महाअछूत” वर्ग है जो “इनके” पढ़े लिखे वर्ग के लिए भी उतना ही घृणित है, जितना ब्राह्मणों के लिए “ये शिक्षित दलित”.
अचंभित हूँ कि ब्राह्मणवादी “राजनीतिक तोड़फोड़” में बगैर “समुचित बार्गीनिंग” के “ये लोग” कैसे हिस्सेदारी कर सकते हैं ? अच्छा होता अगर ये “उनकी” गोद में बैठकर भी अपने “असली समाज” को “राजनीतिक” हथियार से लैस कर, सशक्त कर सकते. (अगर ऐसा किया जाता तो यक़ीनन इन्हें उन मनुवादि “बैसाखियों” की ज़रूरत नहीं पड़ती- इनकी अपनी “जनता” ही इन्हें विधायिका और संसद मे पहुंचाती) मगर अफ़सोस ऐसा किया नहीं गया…..! वजह? (“ख़ुद” का “विकास”/ भगवान बनने की ख़्वाहिश या कुछ और………!)
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हैरानी इसपे भी होती है कि दलित समाज के नेतागण, “ब्राह्मणवादी राजनीतिक तोड़फोड़” को समझने-बुझने वाले सांगठ्निक लोग भी, अपने निज़ी स्वार्थ (सिर्फ़ मंच पे बैठने के विवाद में) के चलते,हिन्दू राष्ट्र बनाम ब्राह्मणराज्य के संगठित ज़ुल्म के खिलाफ़ “एकजुट आवाज़” बनने को तैयार ही नहीं हैं. (वही डेढ़ ईंट वाली मस्जिद जैसी ज़िद ) इन सबके बरअक्स, महादलित समुदायों मे “गुरबत” का ये आलम है कि इनके युवाजन “कुछ भी” करने को मजबूर हैं..!
इनकी औरतें/बेटियाँ/बहुए 200-300 रुपयों मे किसी के भी “जुलूस” में जाने को मजबूर हैं. ब्राह्मणवादियों ने इनकी युवशक्ति को अपराधों और शराबों में ग़र्क़ कर दिया है. मज़े की बात ये है कि डॉ अंबेडकर के नामपर मरने-मारने को उतारू ये जज़्बाती जनसमूह अपने ही (कम धनवान)लोगों द्वारा “विदेशी आर्यों” को खदेड़ने और संविधान बचाने जैसी आवाज़ों पर ज़िंदाबाद कहने के लिए बाहर आना नहीं चाहते, जब तक कि उनके गली का “नेता” “हुक्मेआम ना कर दे. इसीलिए आज महादलित इंसान से ज़्यादा समान समझा जा रहा है जिसे इधर या उधर लाने ले जाने के लिए उसी के “भाई बंद” ठेकेदार बनकर मनुवादि, देशद्रोही राजनीति के पुरोधाओं से कुछ “रुपयों या पद” के लालच में उनका सौदा करने लगे हैं. फ़िर चाहे कहीं वोट छापना हो या मारकाट मचाना हो.
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यहाँ सब चलता है…..!  ऐसा जानबूझकर किया जा रहा हो ऐसा हम भी नहीं मानते हैं. दरअसल उन्हें व्यक्तिपूजा के इतर “असली राजनीति” सिखाई ही नहीं गई है. उन्हें ये नहीं सिखाया गया है कि बेखौफ़ होकर गैरसंवैधानिक गतिविधियां करने वाले “भी” उनके खुले दुश्मन हैं, इसलिए उनपर त्वरित क़ानूनी कार्रवाई किए जाने के लिए लोकतान्त्रिक तरीक़े से आवाज़ बुलंद करना वैसे ही उनका फ़र्ज़े अव्वलीन (पहला कर्तव्य)है, जैसे हर दिन दिहाड़ी के लिए घर से निकलना….! डॉ अंबेडकर के आदेश- “मानसिक गुलामी से आज़ादी हासिल करो- “अपनी” झुग्गी बनाओ”..ग़ज़ब का विचार है. सर पे “अपनी छत” का होना, कितनी बड़ी “ताक़त” है  इससे अंदाज़ा खुद्दार शिक्षा कोई और हो ही नहीं सकती.
मगर अफ़सोस, सालाना करोड़ों का टर्न ओवर रखने वाले “महासंगठन”,ट्रस्टों के मालिकान, इनके कन्धों पे चढ़ इन्हीं के वोट से विधायिका/संसद में पहुंचे पाषाण नेतागण, अपने ही “परिवार” के “महादलितों” को झोंपड़ी के लिए (70 बरस ना सही पिछले 20-25 बरसों में ही) सस्ता लोन मुहैया कराने जैसी “अपनी” कोई स्कीम नहीं ला सके हैं…!
“अपना” कोई बैंक नहीं खोल सके हैं….!
अपने “अति” ग़रीब बच्चों की शिक्षा के लिए अपना स्कूल/कालेज/यूनिवर्सिटी नहीं खोल सके हैं…!
छोटे मोटे उद्योग डालकर अपने युवाओं के लिए सम्मानजनक रोज़ी और खुद्दारी की रोटी का इंतेज़ाम नहीं कर सके हैं…!
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काश के समाज की सेहत को लेकर कोई “सामूहिक चर्चा” शुरू की गई होती तो ख़ून की कमी से जूझती अपनी बहन/बेटियों/और असमय काल के गाल में समा गए नौनिहालों की ज़िंदगियाँ बचाई जा सकती थी. सिर्फ़ दलित होने के एवज़ इनपे किए जा रहे ज़ुल्म, उत्पीड़न, अत्याचार, शारीरिक/यौनिक हिंसा/बलात्कार से पीड़ित और पुलिस प्रशासन से दोबारा अपमानित उपेक्षित अपनी मासूम बच्चियों/ युवतियों को अपमान और क्षोभ के ट्रोमा से निकालने के लिए कोई Help line, काउंसिलिंग सेंटर जैसा कोई ढांचा खड़ा करने की कोशिश की जाती तो शायद हजारों नहीं तो सैंकड़ों युवतियों की खिलखिलाहट आँगनों मे गूंज रही होती. जबकि इन सबके लिए सरकारी लोन (with subsidy) का प्रावधान बाबासाहब 68 बरस पहले ही कर गए हैं. काश के ऐसा कुछ भी करने कि कोशिश की गई होती तो शायद रोहित वेमुला, कृष जैसे नौजवान हमारे बीच आज ज़िंदा बचे रह सकते थे, छुआछूत और गैरबराबरी से अपमानित बहुत से बेटे/ बेटियाँ स्कूल से बाहर नहीं किए जाते या बेइज्ज़ती का दंश लेकर ख़ुदकुशी करने से बच सकते थें…!
हे मूलनिवासी बहुजनों, तुम्हारी “व्यक्तिपूजक” फ़ितरत तुम्हारा सर्वनाश किए दे रही है. अब तो सम्हल जाओ. इस समाज के जागरूक युवा अगर अपना थोड़ा वक़्त दे दें तो सामुहिक प्लानिंग करके इस दिशा में ठोस क़दम उठाए जा सकते हैं!  अगर किसी में समाज को खुद्दार बनाने की मंशा हो तो…..!!!
ज़ुलैखा जबीं
नई दिल्ली

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Zulaikha jabeen

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