इज़राइल और फलस्तीन की दुश्मनी तो जग ज़ाहिर ही है। मगर पिछले कुछ दिनों सोशल मीडिया पर एक वीडियो खूब वायरल हो रहा है, जिसमे फलस्तीन की 16 वर्षीय किशोरी अहद तमिमी इज़राइली सैनिक को थप्पड़ मार रही है। इस वीडियो में वह इज़राइली सैनिक को ललकार रही है। औज़ारों से लेस सैनिक पर तमिमी ज़ोर -ज़ोर से चिल्लाकर कह रही है।कि”बाहर निकलो,यहां से हटो”।

ये घटना 15 दिसंबर की है। इस घटना को इज़राइल के खिलाफ विरोध के रूप में देखा जा रहा है। ऐसी हिंसा की संख्या अधिक होने की वजह एक ये बताई जा रही है, कि जबसे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने येरूशलम को इज़राइल की राजधानी घोषित किया है। तबसे वँहा हिंसा अधिक हो रही है। सवाल ये है कि वीडियो में एक 16 वर्षीय किशोरी सैनिक पर हमला क्यों कर रही है।

इज़राईली सैनिक के ज़ुल्म से अपने भाई को छुड़ाती अहद और उनका परिवार

वजह ये है  कि घटना से एक दिन पहले उसने एक सैनिक और अधिकारी पर हमला किया था, जिसमे एक सैनिक ने उनके 14 वर्षीय चचेरे भाई को सिर में गोली मारी थी। जिससे वह 72 घण्टे तक कोमा में रखा गया था। उसके बाद उसकी माँ और चचेरे भाई को भी गिरफ्तार कर लिया गया था। तब अहद इज़राइली सैनिकों के खिलाफ खड़ी हुई थी और उनके खिलाफ आवाज़ उठाई थी.

उसके बाद तमिमी को भी उस घटना के तीन दिन बाद सलाखों के पीछे कर दिया गया। गिरफ्तरी के बाद इज़राइली अधिकारियों ने अहद के खिलाफ सैनिको पर कथित रूप से हमला करने, सैनिक कर्तव्यों में बांधा डालने और पत्थर फ़ेकने के साथ -साथ 12 मामलो का आरोप लगाया है।

एक प्रोटेस्ट के दौरान अहद तमीमी

इन सब के बाद वह लम्बी अवधि तक जेल की सज़ा का सामना कर सकती है। अब सवाल ये है कि जो पश्चिमी देश नारीवाद, मानव अधिकारों,नारी सशकितकरण की बात करते है। उनकी यंहा कमी दिख रही है।जो लड़कियों की सशक्तिकरण के लिए चैंपियन के रूप में खुद को पेश करते है। मगर यंहा कोई प्रतिक्रिया नही है।

मलाला की तरह अहद भी अपने अधिकारों की मांग और व्यक्तिगत बलिदानो के खिलाफ खड़ी है। वह इज़राइल के बसने वालो लोगो द्वारा भूमि और पानी की चोरी का विरोध कर रही है। जिस तरह मलाला का इतिहास है उसी तरह अहद का भी इतिहास पर्याप्त है, जब 15 वर्षीय पाकिस्तानी कार्यकर्ता मलाला यूसुफजई को तहरीक-ए-तलिबान के सदस्य ने गोली मार दी थी,तो उसके लिए व्यवहार अलग था।”मैं हूँ मलाला “नाम से एक पिटिशन जारी किया था।

इज़राईली पुलिस की गिरफ्त में अहद तमीमी

यूनेस्को ने ” स्टैंड अप फ़ॉर मलाला “लॉन्च किया था। मलाला को 2013 में नोबल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित होने के लिए टाइम मैगज़ीन और ग्लैमर पत्रिका की “वूमन ऑफ द ईयर” द्वारा 100 सबसे प्रभावशाली लोगों में शामिल किया गया था और अंतरराष्ट्रीय स्तर के बड़े पत्रकारों ने उनके हित मे बात की थी। यंहा तक कि “मलाला दिवस “भी मनाया जाता है। मलाला के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत कुछ किया गया।

मगर अहद के लिए इतनी अलग प्रतिक्रिया क्यों है। अहद भी अपने अधिकारो और व्यक्तिगत बलिदानो के खिलाफ आवाज़ उठा रही है। अहद जैसे निहत्थे फलस्तीनियों को अपने परिवार की भलाई के लिए अपने 16 वर्षीय हाथो की ताक़त से अपने अधिकारों की रक्षा करने के लिये शायद सिर्फ कसरत ही कर रही थी। उसकी गिरफ्तारी के बाद लंदन,न्यू यॉर्क समेत दुनियाभर में पोस्टर कर प्रदर्शन किया तो जा रहा है मगर मलाला की तरह उनका अंतरराष्ट्रीय स्तर में शक्तिशाली सत्ताएँ उनका समर्थन नही कर रही है। आखिर तमीमी भी मलाला की तरह एक ऐक्टिविस्ट  है तो उनके साथ इतना दोहरा व्यवहार क्यों किया जा रहा है।

शगुफ्ता ऐजाज़