अमेरिका के एक अफ्रीकन-अमेरिकन सीनेटर हैं कीथ एलिसन. 19 साल की उम्र में इन्होने इस्लाम धर्म अपना लिया था. इनका ताल्लुक अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी से है और अमेरिकी पार्लियामेंट में इनका वोटिंग पैटर्न बहुत ही लिबरल रहा है. इन सब के बावजूद जब यह 1998 में अपना पहला चुनाव कीथ एलिसन मुहम्मद के नाम से लड़ रहे थे तमाम अमेरिकी मीडिया ने इनको कट्टरपंथी साबित करने में क्या कुछ नहीं कर दिया.

इनके बारे में लिखा गया की ये मुस्लिम कट्टरपंथी संस्थाओं के समर्थक हैं, मुस्लिम आतंकवादियों के लिए इनके दिल में सॉफ्ट कार्नर है आदि आदि. लिहाज़ा यह चुनाव हार गए. बाद में सन 2000 में ये फिर चुनाव लड़ें और इस बार अपने नाम से ‘मुहम्मद’ शब्द हटा लिया. मीडिया ने पिछली बार से कम मगर फिर इनकी वैसी ही छवि बनाई. बहरहाल, इस बार ये चुनाव जीत गए. शपथग्रहण समारोह में कुरआन शरीफ़ पर हाथ रख शपथ ली. मीडिया समझिए बऊरा गया. इसके बाद से लेकर आजतक इनको कम्युनल दिखाने के लिए जबतब कुछ न कुछ छपता ही रहता है.

इसी तरह लन्दन के एक पुराने नेता हैं सादिक खान. सारी उम्र लेबर पार्टी से जुड़े रहे. जिनको जानकारी न हो उनके लिए बता दें कि लेबर पार्टी ब्रिटेन की एक ‘लिबरल’ पार्टी है, लेफ्ट-विंग. मगर इसके बावजूद जब सादिक खान लन्दन के मेयर पद पर चुनाव लड़ रहे थे तो इनको कम्युनल दिखाने में मीडिया ने क्या कुछ नहीं किया. बहुत से आरोप लगे की देखो कट्टरपंथी मुसलमानों का ‘ख़ास’ है, इसको सपोर्ट किया है उसका दोस्त है आदि आदि. बहरहाल, सादिक खान जीत गए और अभी लन्दन के मेयर हैं. इसी तरह ब्रिटेन में ज़ाहिदा मंज़ूर के खिलाफ ऐसा ही कैम्पेन चला था.

भारत में असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) हैं. मुस्लिम आइडेंटिटी पॉलिटिक्स करते हैं. इनको भी मीडिया कम्युनल ही दिखाता है. हर स्पीच-बयान को बार-बार लगातार स्कैन किया जाता है, फिर कोई एक वाक्य पकड़ कर उनको कम्युनल पेंट कर देते हैं. भारत में और बहुत मुस्लिम नेता हैं, मिसाल के तौर पर कांग्रेस या समाजवादी पार्टी का ही कोई भी मुस्लिम नेता उठा लीजिए. यह लोग उतने कम्युनल नहीं हैं और न ही इनको उतना कम्युनल दिखाने की कोशिश की जाती है. वे तथाकथित ‘सेक्युलर’ राजनीती करते हैं.

मगर असदुद्दीन ओवैसी के मामले में हाल तो यह बना दिया गया है कि यदि आप पब्लिकली खुद को ओवैसी सपोर्टर बता दीजिए तो कई लोग मुंह सिकोड़ कर आप पर भी ‘कम्युनल’ होने का ठप्पा लगा देंगे. गूगल पर सर्च कीजिए असदुद्दीन ओवैसी कंट्रोवरसी और तमाम लिनक्स पढ़िए. मेरे लैपटॉप में फर्स्टपोस्ट का लिंक सबसे उपर आया. टाइटल है ‘ओवैसी हेट स्पीच: नॉट दी फर्स्ट टाइम’. ख़बर यह है कि ओवैसी ने मोहन भगवत के कहने पर भारत माता की जय बोलने से मना कर दिया. ऐसी सैंकड़ो ख़बरें थोक के भाव मिल जाएँगी इन्टरनेट पर.

यह वही असदुद्दीन ओवैसी हैं जिसके बारे में शहीद रोहित वेमुला अपने फेसबुक पर ‘ओवैसी: दी आल्टरनेटिव’ लिखते हैं. इसका मतलब वो रोहित वेमुला भी कम्युनल था? ओवैसी मुसलमानों की भारतीय राजनीती में हिस्सेदारी की बात कर रहे हैं तो कम्युनल हो गए. अहमद पटेल कांग्रेस की राजनीती में हिस्सेदारी की पैरवी करते हैं इसीलिए उतने कम्युनल नहीं हैं. ओवैसी से ज़्यादा किसी ग़ैर-दलित नेता ने दलितों के लिए आवाज़ नहीं उठाई है. असदुद्दीन ओवैसी ट्रिपल तलाक बिल का विरोध करते हैं, कम्युनल हैं. असदुद्दीन ओवैसी उस मुस्लिम मौलाना को जिसने स्टूडियो में औरत पर हाथ उठा दिया, उसको पर्सनल लॉ बोर्ड ने निकालने की माँग करते हैं ओवैसी तब भी कम्युनल हैं.

असल में मसला यह है कि ओवैसी यदि कल को कांग्रेस ज्वाइन कर लें, कल की शाम होते होते ही सेक्युलर हो जाएँगे. पॉलिटिक्स में हिस्सेदारी की बात करेंगे, मुस्लिम आइडेंटिटी पर कायम रहेंगे तो ओवैसी क्या आप भी कम्युनल बना दिए जाएँगे. पाकिस्तान में हिन्दू माइनॉरिटी में हैं, उनके लिए वहाँ की पार्लियामेंट में सीट अरक्षित है. यहाँ पर मुस्लिम-दलित और बाकि माइनॉरिटी की सीट अरक्षित करने को बोलिए, आपको तुरंत जिन्नाह का समर्थक बना देंगे. खुद को सेक्युलर दिखाने के लिए ओवैसी का विरोध करना भी कम्युनल होना ही है. हिस्सेदारी मिल जाए, फिर सेक्युलर बनते रहिएगा.

नोट : यह लेख , लेखक की फ़ेसबुक वाल से लिया गया है