गृहमंत्री कभी भी किसी आपराधिक पृष्ठभूमि और तड़ीपार रह चुके जैसे जनप्रतिनिधियों को नहीं बनाना चाहिए। वे पुलिस को नियम कानून के अनुसार काम ही नहीं करने दे सकते हैं। कानून के प्रति उनमे सम्मान भाव रहता ही नहीं है। कानून तोड़ना जिसकी आदत में शुमार हो, वह भला कानून को लागू और वह भी कानूनी तरह से लागू करने की अपेक्षा पुलिस से करेगा ? वह पुलिस में सबसे पहले ऐसे अफसरों और पुलिसजन को ढूंढेगा जो उसके एजेंडे के अनुसार कुछ भी करने को, चाहे वह अपराध ही क्यों न हो, करने के लिये राजी हों, को छांटेगा। यह छँटा हुआ ग्रुप एक गिरोह की तरह विभाग, और कानून के प्रति निष्ठावान नहीं बल्कि उस जनप्रतिनिधि के प्रति निष्ठावान बन जाएगा।

जेएनयू में किसने हिंसा की आज के संचार क्रांति युग मे जब एक ही घटना के पचासों वीडियो पल पल की खबर अनेक एंगल से दे रहे हों तो, लोग वास्तविकता जानने के लिये पुलिस की कहानी पर कम विश्वास करते हैं। जैसे पुलिस को हर बात पर सन्देह से देखने का प्रशिक्षण प्राप्त है वैसे ही जनता को तो पुलिस पर सतत और सनातन अविश्वास है।  आपराधिक पृष्ठभूमि का मंत्री मनचाही तफतीश का स्क्रिप्ट लिखेगा ओर कडक वर्दी से ढंकी कमज़ोर रीढ़ का अफसर, अपनी नौकरी बचाएगा और फिर टीवी पर दुनिया भर के सामने अपना तमाशा बनाएगा। जेएनयू में जो कुछ हो रहा है, या हो चुका है या होगा, उस पर भारत की ही नहीं बल्कि दुनियाभर की नज़र है और आज, सबके हांथो में पड़े स्मार्टफोन ने हर आदमी को जांचकर्ता बना दिया है। आजतक, एनडीटीवी, इंडिया टुडे की तो बात ही छोड़ दीजिए। दिल्ली पुलिस आप अपनी साख बचाइए, ऐसे आंदोलन के हंगामों की जांचों में होता हवाता कुछ नहीं, सिवाय पुलिस के प्रोफेशनलिज़्म की आलोचना के। आज जेएनयू हिंसा की जांच में हर वह व्यक्ति जो दिल्ली पुलिस की प्रेस वार्ता देख रहा है, वह आजतक, इंडिया टुडे और एनडीटीवी भी देख रहा है।

इंडिया टुडे के स्टिंग के वीडियो में जिसमें बीजेपी के छात्र विंग एबीवीपी से जुड़े एक जेएनयू के छात्र अक्षत अवस्थी का कहना है कि वह खुद हिंसा में शामिल था। उसने इस बात का भी खुलासा किया है कि 20 लोग जेएनयू के थे और 20 लोग बाहर से बुलाए गए थे। स्टिंग में अवस्थी खुद कहता है कि उसने झंडे वाला डंडा अपने हाथ में लिया था और उससे उसने कई लोगों को पीटा। उसका कहना है कि उसने एक दाढ़ी वाले शख्स को पीटा। अवस्थी का कहना है कि लेफ्ट के छात्रों को अंदाजा भी नहीं था कि एबीवीपी उनका पलटवार करेंगे, इस स्टिंग में एबीवीपी का रोहित भी जेएनयू में हमले को स्वीकार रहा है जिसमें वह खुद भी शामिल था। हमलावर छात्रों ने यह भी स्वीकार किया कि पुलिस ने उनकी मदद की, पुलिस ने बिजली बन्द की । क्या उन पुलिस वालों के खिलाफ भी करवाई होगी अब ? क्या पुलिस को अब भी सबूतों की जरूरत है ?

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  • इंडिया टुडे की टीम ने एक प्रमुख हमलावर को कैमरे में यह स्वीकार करते हुए कैद किया कि उसने कैंपस से और बाहरी छात्रों को हिंसा के लिए संगठित किया था।
  • जेएनयू में फ्रेंच डिग्री प्रोग्राम के प्रथम वर्ष के छात्र अक्षत अवस्थी ने रविवार को हमले के दौरान लिए गए वीडियो में खुद ही खुद की पहचान की और उसने खुद को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद एबीवीपी का कार्यकर्ता बताया।
  • 5 जनवरी की हिंसा वाली वीडियो में अक्षय अवस्थी हाथ में लाठी लिए हुए दिखते हैं, जिसके बारे में वे कहते हैं कि उन्हें हॉस्टल कॉरिडोर में गुस्से से भागते हुए देखा जा सकता है। वे दरवाजों को पीट रहे हैं और उनके रास्ते में जो भी आ रहा है, उस पर हमला कर रहे हैं।
  • इंडिया टुडे के अं​डरकवर रिपोर्टर ने अवस्थी से पूछा, “आपके हाथ में क्या है?”
    उन्होंने कहा, “ये लाठी है सर. इसे मैंने पेरियार हॉस्टल के पास लगे झंडे से निकाला था.”
    रिपोर्टर ने पूछा, “क्या आपने किसी को मारा?”
  • अवस्थी ने स्वीकार किया, “बढ़ी हुई दाढ़ीवाला एक आदमी था. वह कश्मीरी जैसा दिख रहा था. मैंने उसे पीटा और लात मारकर दरवाजा तोड़ दिया.” उन्होंने कहा, “मैं कानपुर के ऐसे इलाके से आता हूं जहां हर गली में गुंडे आम बात हैं. हमने ये सब बहुत देखा है.”
  • अक्षत अवस्थी ने कहा कि यह हमला उसी दिन पेरियार हॉस्टल में वामपंथी छात्रों द्वारा कथित रूप से किए गए हमले के जवाब में किया गया था. “यह क्रिया की प्रतिक्रिया थी.”
  • कुछ ही घंटे में भीड़ को कैसे इकट्ठा किया, यह पूछने पर अवस्थी ने ​अलग अलग कैंपसों के ABVP के पदाधिकारियों का नाम बताया. अवस्थी ने विस्तार से बताया, “वे ABVP के ऑर्गेनाइजेशनल सेक्रेटरी हैं. मैंने उन्हें कॉल की. लेफ्ट विंग के छात्रों और अध्यापकों ने साबरमती हॉस्टल के पास एक मीटिंग रखी थी. जब वहां पर हमला किया गया, वे सभी छुपने के लिए अंदर भाग गए.”
  • उन्होंने बताया कि कैसे साबरमती हॉस्टल के सामने एक सड़क पर वाहनों को और हॉस्टल के फर्नीचर्स को तोड़ा गया.
  • उन्होंने कहा, “वहां पर जो भी छात्र और अध्यापक खड़े थे, वे भाग गए. उन्हें यह उम्मीद नहीं थी कि ABVP इस तरह से जवाब ​देगा.”
  • रिपोर्टर ने अवस्थी से पूछा, “आप बता रहे थे कि ABVP के 20 कार्यकर्ता जेएनयू के थे और 20 बाहर से बुलाए गए थे.”
    अवस्थी ने दावा किया, “मैं आपको बता सकता हूं क्योंकि सारी भीड़ मैंने ही एकत्र की थी. उनके पास इतना दिमाग नहीं है. आपको पता है, इसके लिए आपको किसी सुपरिटेंडेंट या कमांडर की तरह काम करना होता है. जो करना है वह क्यों करना है और कहां करना है. मैंने उन्हें हर चीज के बारे में गाइड किया, कहां उन्हें छुपना है, कहां जाना है. मैंने उन्हें नियोजित ढंग से सब समझा दिया था. मेरी कोई खास पोजीशन नहीं है, लेकिन उन्होंने मेरी बात को गौर से सुना.”
  • उन्होंने कहा, “मैंने सिर्फ उन्हें एकत्र ही नहीं किया बल्कि उनके गुस्से को सही दिशा में निकालने में मदद की.”
  • हिंसा के अगले दिन 6 जनवरी को जब ABVP ने जेएनयू कैंपस में प्रदर्शन किया, तब भी इंडिया टुडे की टीम ने अक्षत को अपने कैमरे में कैद किया.
  • फ्रेंच प्रोग्राम फर्स्ट इयर में ही पढ़ने वाले एक और छात्र ने पुष्टि की कि 5 जनवरी को हुए हमले में अक्षत अवस्थी की संलिप्तता थी।
  • रोहित शाह नाम के एक छात्र ने स्वीकार किया कि जब अवस्थी हमले की तैयारी कर रहे थे तब उसने अपना हेलमेट अवस्थी को दिया था. रोहित शाह ने कहा, “जब आप शीशे तोड़ते हैं तो यह (हेलमेट) सुरक्षा के लिए जरूरी था.”
  • अक्षत अवस्थी ने कहा, कि भीड़ हॉस्टल में एबीवीपी के एक कमरे में एकत्र हुई, जिसके बाद उसने उन्हें हॉस्टल में रहने वालों के बारे में जानकारी दी कि कौन किस संगठन का है.
    रोहित शाह ने कहा, “यह हमला जिस तरह से किया गया, अगर ऐसा नहीं होता तो संभव नहीं था. उन्हें (वामपंथी छात्रों को) एबीवीपी की ताकत का अंदाजा नहीं लग पाया.”
  • अवस्थी ने दावा किया, “वे (पुलिस) कैंपस के बाहर नहीं, बल्कि अंदर थे. पेरियार हॉस्टल में (पहले की झड़प में) एक लड़के को चोट लगी थी, उसके बाद मैंने खुद पुलिस को बुलाया था. वह मनीष (एक छात्र) से मिले और कहा, ‘उन्हें मारो, उन्हें मारो’.”
  • भीड़ ने अपना चेहरा क्यों ढंका था, यह पूछने पर इस छात्र ने कहा कि यह तरीका लेफ्ट के हमला करने के तरीके की ही नकल था. “हमने उनकी नकल की. लेफ्ट के लोग चेहरा ढंक कर आए थे. इसलिए हमने कहा कि हम भी चेहरा ढंक लेते हैं.”

अवस्थी ने भीड़ में मौजूद चेहरा ढंके हुए एक लड़की के अलावा अन्य कई लोगों की भी पहचान की. इंडिया टुडे पुलिस के समक्ष संदिग्ध लोगों की पहचान जाहिर कर सकता है।

अब कहा जा रहा है कि सीसीटीवी फूटेज नहीं मिली। तमाम वीडियो फूटेज घटना के दिन से ही लाइव हो कर सोशल मीडिया में तैर रहे हैं और रोना सीसीटीवी फुटेज का।  दिल्ली पुलिस सर, इस न्यूज़ चैनलों को देखने के बाद पुलिस की थियरी पर केवल तरस ही खायी जा सकती  है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस बारे में कुछ नही  कहा गया कि देर से पुलिस पहुंचने की जिम्मेदारी किस अफसर पर है ? चीफ प्रॉक्टर का कहना है कि वे लगातार पुलिस के संपर्क में थे। और पुलिस का कहना है कि वह वीसी की अनुमति की प्रतीक्षा में थी। जो व्हाट्सएप्प संदेशों के स्क्रीन शॉट सब टीवी और मीडिया वालों के पास हैं, उनकी क्या सच्चाई है ? यह सारे सवाल दबेंगे नहीं और उभरेंगे। अगर दबाव में ही कुछ करना था तो कम से कम, प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के किरकिरी तो न कराते।

अक्षत अवस्थी तो एक मोहरा है। उसे केवल एक काम के लिये चुना गया था। मदद में पुलिस को और सरेख दिया गया। पर वह कौन था जो फीसवृद्धि के खिलाफ इस आंदोलन को हिंसा कर के तोड़ना चाहता है ? कुलपति ? चीफ प्रॉक्टर ? मानव संसाधन मंत्रालय ? या कोई और ? यह घटना इतनी ही नही है जितनी दिल्ली पुलिस और टीवी चैनल के स्टिंग ऑपरेशन बता रहे हैं। और भी गहरी और जटिल है। पर इतनी गहराई और जटिलता में न तो कोई विवेचक जाएगा और न ही उसे वे जाने देंगे जो इस घटना के सूत्रधार हैं। या तो इस घटना की जांच हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के पर्यवेक्षण में सीबीआई करे या न्यायिक जांच हो।

~ पूर्व आईपीएस विजय शंकर सिंह