क्या किसी विरोधी विचारधारा के किसान संगठन के बैनर तले इकठ्ठा होकर किसान प्रदर्शन करें तो भारतीय जनता पार्टी और संघ के लोगों को किसानों की मांग और प्रदर्शन पर सवाल उठाने का अधिकार मिल जाता है. देश की लगभग हर राजनीतिक पार्टी और विचारधारा सरे सम्बन्ध रखने वाले अलग-अलग संगठन कार्य कर रहे हैं. उनमे छात्र संगठनों से लेकर युवा, मज़दूर और किसान संगठन भी आपको मिल जायेंगे.

देश में जहाँ किसानों और मज़दूरों के लिए वामपंथी संगठन आखिल भारतीय किसान महासभा है तो वहीं आरएसएस का संगठन भारतीय किसान संघ भी है. तो दूसरी ओर कांग्रेस का किसान संगठन किसान कांग्रेस भी है. सवाल ये उठता है, कि क्या इनमें से कोई भी संगठन जो किसानों की आवाज़ उठाये तो क्या आप उसका इसलिए विरोध करेंगे, क्योंकि वो आपकी विचारधारा के संगठन से जुड़ा नहीं है, जबकि किसान उस संगठन के बैनर तले खड़े हों.

ऐसी हिमाकत अक्सर भाजपा के नेताओं द्वारा की जाती रही है, न्यूज़18 के मुताबिक़ भाजपा सांसद पूनम महाजन ने मुंबई में प्रदर्शन कर रहे किसानों को अर्बन माओवादी दूसरे अर्थों में शहरी नक्सली करार दिया है. आप और हम समझ सकते हैं, इन किसानों को इस तरह से क्यों संबोधित किया गया है.क्योंकि ये किसान एक वामपंथी किसान संगठन के बैंर तले इकठ्ठा हुए हैं. पूरी यात्रा और रैली में किसानों के संग लाला झंडों को देखा जा सकता है.

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अब भाजपा के नेताओं को कोई तो बहाना चाहिए, जिससे वो इस किसान आन्दोलन को फेल कर सके. फिर क्या था, आजकल भाजपा ने एक तरीका अपनाया हुआ है. हर विरोध प्रदर्शन को विरोधी राजनीतिक पार्टियों का सड़यंत्र साबित करके उस विरोध प्रदर्शन पर ही सवाल खड़े कर दो.

इससे भाजपा दो तरह की राजनीति करती नज़र आती है, एक तो ये कि किसी भी विरोध को विरोधी पार्टियों का राजनीतिक षड्यंत्र बताकर उस विरोध को नकार देना, दूसरे लोगों की नज़र में इसे सरकार की छवि खराब करने वाले कृत्यों के रूप में दिखाना. जब से नरेंद्र मोदी सरकार सत्ता में आई है. एक –एक कर सभी किसान और छात्र आंदोलनों को ऐसे ही नकार दिया गया. ऐसे ही उन विरोध प्रदर्शनों पर सवाल खड़े किये गए.

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एक क़दम आगे बढ़कर गोदी मीडिया भी अपनी भूमिका निभाता नज़र आता है, जहां इतने बड़े स्तर पर किसान 180 किलोमीटर की दूरी तय करके नासिक से मुंबई पैदल पहुंचाते हैं. मीडिया को शुरूआत में इन प्रदर्शनों को दिखाने का समय नहीं था. हमारा मीडिया मुहम्मद शमी के पारिवारिक झगड़े अर रिपोर्टिंग का रहा था. पर उसके पास समय नहीं था, कि वो देश राजधानी में प्रदर्शन कर रहे छात्रों को दिखाता. महाराष्ट्र में पैदल मुंबई की तरफ़ निकलने वाले किसानों की व्यथा को बताता.

पूनम महाजन की तरह भाजपा का आईटी सेल भी सक्रीय हो चुका है, कोई तो इनकी समस्याओं पर बात कर ले. पर सत्ता का नशा सर चढ़कर बोल रहा है. बातों में ऐसा घमंड नज़र आ रहा है, जैसे वो हमेशा के लिए इस मुल्क के बादशाह बना दिए गए हों.

ये पहली बार नहीं है, कि प्रदर्शन करने वाले किसानों के लिए भाजपा नेताओं के बयान आये हों. ऐसा अक्सर होता है, क्योंकि भाजपा के लिए और मज़दूर कभी प्राथमिकता नहीं रहे. आपको याद होगा एक भाजपा नेता क्या कह गए थे, जब किसानों की आत्महत्या की बता हो रही थी. तो उन्होंने ये तक कहने से गुरेज़ नहीं किया था, कि किसानों आत्महत्या एक फैशन बन गया है.

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कुछ लोग सोशलमीडिया में पदयात्रियों की उन तस्वीरों को को पोस्ट कर रहे हैं,जिनमे कुछ लोग अच्छे कपड़े पहने हुए हैं. जींस और महंगे शर्त पहने हुए हैं. उन पर सवाल किया जा रहा है, कि इतने अच्छे कपड़े पहनने वाले किसान कैसे हो सकते हैं. उन अहमकों से सवाल करिए, कि क्या किसानो के बच्चे अच्छे कपड़े नहीं पहनते. या फिर उनकी सोच ऐसी ही है, कि वो किसानों को अच्छे कपड़े में देखना पसंद नहीं करते.

उन्हें वो तस्वीर दिखाईये, जिसमें एक किसान के पैदल चलने की वजह से खून निकल रहा है. उन्हें ये नहीं दिख रहा है. उन्हें तो वो तस्वीर खटक रही है, कि कैसे इन किसानों को सम्पूर्ण विपक्ष ने समर्थन दिया है. उन्हें ये भी खटक रहा है, कि कांग्रेस, शिवसेना, मनसे समेत सभी पार्टियों ने इस विरोध को अपना समर्थन दिया है. उन्हें वो तस्वीर भी अखर रही होगी, जिसमे मुंबई के डब्बेवाले इन किसानों को खाना खिला रहे हैं. उन्हें वो तस्वीर तो और ज्यादा आखर रही है, जिसमे कुछ मुस्लिम युवा चोटिल किसानों की पट्टी कर रहे हैं. उन्हें रास्ते में पाने पिला रहे हैं. इस तरह पूरे देश में इस अद्भुत शांतिपूर्ण प्रदर्शन की चर्चा है.

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इनकी नज़र में तो प्रदर्शन का अर्थ सिर्फ तोड़फोड़ ही होता है, शांतिपूर्ण प्रदर्शन तो इन्हें हज़म ही नहीं होते. आखिर तोड़फोड़ और विध्वंस इनकी विचारधारा में है, और ये विचारधारा इनकी रग रग में बसी हुई है.

मध्यप्रदेश के किसान नेता कक्का जी को तो आप जानते ही होंगे, किसी समय वो मध्यप्रदेश भारतीय किसान संघ से जुड़े हुए थे. कक्का जी किसानों के नेता हैं, इसलिये संघ के संगठन से जुड़े होने की बावजूद मध्यप्रदेश के किसानों ने हमेशा उनके प्रदर्शनों में साथ दिया है. यही वजह रही, कि जब शिवराज सरकार के दौरान कक्का जी प्रदर्शन कर रहे थे. तो संघ और भाजपा ने आँखे तरेरना शुरू कर दिया था और बाद में कक्का जी के ऊपर कई केस थोप दिए गए.

फ़िलहाल भाजपा नेताओं का घमंड सातवे आसमान पर है, ऐसे में उनसे किसानों के लिए अच्छी सोच बेमानी जैसी है, आप सोचियेगा एक तरफ़ भाजपा ही मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस किसानों से बात करने के लिए अपना प्रतिनिधिमंडल भेजते हैं. बात करने के बात वो किसानों की सभी मांगों को मानते हुए उन्हें पूरा करने के लिए 6 माह का समय भी मांगते हैं. तो दूसरी तरफ़ भाजपा सांसद पूनम महाजन किसानों के विरोध और प्रदर्शन को सिर्फ इसलिए धता बताने की कोशिश करती हैं. क्योंकि वो एक वामपंथी किसान संगठन के बैनर तले इकठ्ठा हैं.

कोई इनको बताये, कि लोकतंत्र में विपक्ष का काम ही यही होता है कि जहां सरकार की नीतियां गलत हों. उन क्षेत्रों में सरकार के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद करे. ये विपक्षी पार्टियों का लोकतांत्रिक अधिकार होता है. क्या पूनम महाजन और उन जैसे घमंड में चूर भाजपाई नेता इस देश के लोकतांत्रिक ढाँचे पर विश्वास नहीं करते हैं. हो सकता है, उनका ये घमंड जल्द ही जनता चूर चूर कर दे, क्योंकि देश की जनता ने ऐसे ही कांग्रेस के घमंड को चूर-चूर करके इन्हें सत्ता दी थी. ऐसे ही त्रिपुरा और बंगाल में वामपंथियों का घमंड भी चूर चूर हुआ था. अब भाजपा के लिए भी वही समय करीब नज़र आता है.