आज इंसान ‘चांद’ पर पहुंच चुका है और वह दिन दूर नही जब ‘मंगल’ ग्रह पर इंसान पहुंच चुका होगा.इसरो पहले ही चांद पर पानी की पुष्टि कर चुका है और अपना मंगलयान भी भेज चुका है.जैसे जैसे टेक्नोलॉजी में उन्नति हो रही है, इंसान अंतरिक्ष की हर सीमा को लांघ रहा है. लेकिन वह कौन था, जिसने सबसे पहले स्पेस में कदम रखा?
12 अप्रैल,1961 को 27 वर्षीय सोवियत एयर फोर्स के पायलट ने अंतरिक्ष में कदम रख कर इतिहास रच दिया.वह पायलट कोई और नहीं रूस के यूरी गागरिन थे. इस अंतरिक्ष यात्रा के बाद युरी गागरिन मिडिया की सुर्खी बन गये और दुनिया भर में प्रथम अन्तरिक्ष यात्री के तौर पर पहचाने जाने लगे.
इसी दिन की याद में हर साल 12 अप्रैल को इंटनेशनल डे ऑफ ह्यूमन स्पेस फ्लाइट मनाया जाता है. यह जानकार थोड़ी हैरानी हो सकती है कि गागरिन से पहले 3 नवंबर, 1957 को अंतरिक्ष में फीमेल डॉग ‘लाइका’ को भेजा गया था. हालांकि वह अंतरिक्ष में केवल छह घंटे ही जीवित रह सकी.चैंबर का तापमान ज्यादा होने की वजह से उसकी मौत हो गई थी.राकेश शर्मा पहले भारतीय थे, जो अप्रैल 1984 में अंतरिक्ष में पहुंचे थे. उनके बाद रवीश मल्होत्रा, कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स भी अंतरिक्ष की यात्रा कर चुके हैं.
दुनिया के पहले अंतरिक्ष यात्री युरी गागरिन का जन्म 9 मार्च 1934 को पश्चिमी मास्को में एक छोटे से गाँव क्लुशिनो में हुआ.रूस को तब सोवियत संघ के नाम से जाना जाता था. वो चार भाई-बहन थे जहाँ उनके पिता एलेक्सी एवोंविच गागरिन बढाई का काम किया करते थे और माँ अन्ना टिमोफेय्ना गागरिन दूध की डेयरी में काम करती थी.
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अभी युरी गागरिन सात वर्ष के ही थे कि वर्ष 1941 में नाज़ियों ने सोवियत संघ पर हमला कर दिया. गागरिन परिवार को फ़ार्म में उनके घर से बेघर कर दिया गया.नाज़ियों ने युरी गागरिन की दो बहनो को भी बंधुआ मजदूर बनाकर जर्मनी भेज दिया.
जैसे तैसे सरातोव के एक ट्रेड स्कूल में यूरी गागरिन की पढाई आरम्भ हुयी , उन्हें गणित और भौतिकी में दिलचस्पी थी.इसी स्कूल में उन्होंने धातुओं का काम सीखा.यही के एक लोइंग क्लब में भी उन्होंने दाखिला ले लिया और जल्द ही हवाई जहाज उडाना सीख गये. वर्ष 1955 में उन्होंने पहली बार अकेले हवाई जहाज उड़ाया. उड़ान के प्रति रुझान बढ़ने के कारण उन्होंने सोवियत एयरफोर्स की नौकरी कर ली. उड़ान की सटीक कुशलता देख अधिकारियों ने उन्हें आरेनबर्ग एविएशन स्कूल में भेज दिया,जहाँ वो मिग विमान उडाना सीख गये.
नौकरी के दौरान वर्ष 1957 में ही उन्होंने उच्च श्रेणी से ग्रेजुएशन पूर्ण किया. अब वो फाइटर पायलट बन गये ,लेकिन उनका सपना अन्तरिक्ष में उड़ान भरना था. जब सोवियत सरकार ने अंतरिक्ष में जाने के लिए आवेदन मांगे तो 3000 आवेदन आये , जिनमे गागरिन भी एक थे. इनमें से 20 लोगो को ट्रेनिंग के लिए चुना गया , इनमे भी गागरिन का चयन हो गया था. जब ट्रेनिंग शुरू हुयी तो एक एक कर सब लोग बाहर हो गये और सबसे योग्य अन्तरिक्ष यात्री के रूप में गागरिन बचे रहे. उनका छोटा कद भी उनका सहायक बना,क्योंकि वोस्तक प्रथम का कैप्सूल लगभग उन्ही के आकार जितना था.
12 अप्रैल 1961 को यूरी गागरिन ने एक संक्षिप्त भाषण में इस कार्य को देश के लिए गौरव और जिम्मेदारी बताया और अपने कैप्सूल में ही लेटे रहे.वो किसी भी तरह से इसे नियंत्रित नही कर सकते थे तय सुबह 9 बजकर 7 मिनट पर  बैकानूर से उनका अंतरिक्षयान उड़ा और वो बोले “पोयखेली  (हम दूर चले )” अन्तरिक्ष में प्रविष्ट होकर गगारिन ने पृथ्वी का एक पूरा चक्कर लगाया.इस समय वोस्तक प्रथम की गति 28.260 किमी प्रति घंटा थी.इसके बाद सुबह 10 बजकर 55 मिनट पर उनका यान पृथ्वी पर लौट आया.
गागरिन जब धरती पर लैंड कर रहे थे, तो वे व्हीकल में नहीं थे. करीब 7000 मीटर की ऊंचाई पर ही वे वेहिकल से अलग हो चुके थे और पैराशूट के जरिए उन्होंने लैंड किया. यह सुरक्षा कारणों को ध्यान में रख कर किया गया था. हालांकि इस बात को सोवियत यूनियन ने दशकों तक छुपाए रखा था.
इस अन्तरिक्ष यात्रा से अन्तरिक्ष युग का आरम्भ हुआ. वे अन्य अन्तरिक्ष यात्रियों को प्रशिक्षित करने लगे लेकिन दुर्भाग्य से केवल 34 वर्ष की आयु में ही 27 मार्च 1968 को जब वो एक मिगनड फाइटर जेट की परीक्षण उड़ान पर थे , वह दुर्घटना ग्रस्त हो गया और उनकी मृत्यु हो गयी .बाद में पता चला कि सामने से आते एक सुखोई फाइटर जेट ने उनके यान के पिछले भाग को टक्कर मार दी थी जिससे उनका यान चक्कर खाकर नीचे गिर गया था. एक साहसी अन्तरिक्ष यात्री का एक दुखद अंत हुआ लेकिन विश्व इतिहास में हमेशा के लिए युरी गागरिन का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित हो गया.

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Durgesh Dehriya

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