क्रिकेट

एक सभ्य खेल की कवरेज को इतना असभ्य क्यों बना रहे हैं टीवी एन्कर्स

एक सभ्य खेल की कवरेज को इतना असभ्य क्यों बना रहे हैं टीवी एन्कर्स


भारत और पाकिस्तान का मैच है,पूरी तेयारी है आखिर क्रिकेट का सबसे बड़ा मुकाबला जो ठहरा,और इससे भी ज्यादा 1947 से लेकर आज तक के तमाम हालात भी सामने है,मगर खेल है हो रहा है और दसूरे मुल्क में हो रहा है तो मसला अलग है,मगर खेल तो खेल ही रहा है और हमेशा ही खेला गया है,लेकिन आज बात दूसरी है की क्रिकेट “जेंटल मैन्स” गेम है,और ये बात इसके तकरीबन डेढ़ दो साल पुराने इतिहास से जुडी हुई बात भी है,लेकिन इस बार या लगभग हर बार ही भारत और पाकिस्तान का मैच खेल से कुछ ज्यादा हो जाता है.
 
और इतना ज्यादा हो जाता है की इसे ‘जंग’ ‘रनयुद्ध’ या ‘धुल चटा’ देना जेसी उग्र भाषा का बड़ी आसानी से बन जाता है और बाईस गज की पिच पर खेला जाने वाला बस ये ‘मैच’ सच में एक जंग जेसा ही बन जाता है,और इस कथित जंग का प्रयोजन हमारा मीडिया और सोशल मीडिया बड़ी ही इमानदारी से करता है.
 
जिस तरह हाल फिलहाल में हर जगह फेसबुक,ट्विटर,इन्स्टाग्राम से लेकर यूटुब तक हर एक जगह पर पहले तो इसको लेकर “हैश्टैग वॉर” चलाया जाता है और फिर उस पर सिद्धांत,तहज़ीब और सभ्यता और तमीज को सिर्फ और सिर्फ मैड इन “लाइव” के कथित राष्ट्रवाद की चाशनी में डुबो कर एक जगह परोसा जाता हैऔर इस चाशनी में डुबो कर हर एक पकवान मीठा ही नजर आता है,और इस पकवान की भाषा “बाप बाप करेगा पाक”,”पहले पोते को हराया अब बेटे के बारी” से लेकर “औकात” जेसे शब्दों की या इस जेसे कितने ही शब्दों का बहुत आसानी के साथ शब्दों का मीडिया के कई चैनलों के अलावा सोशल मीडिया की बड़ी हस्तियाँ तक करती है.
 
लेकिन उसमें ये लग सकता है की सिर्फ ‘मज़े’ के लिए ‘मौज’ के लिए ऐसा होता है लेकिन येम भाषा हरगिज़ ऐसी नही होती है जिसे बेहतर कहा जा सकें,क्यूंकि ये भाषा दर्शकों को ऐसे उकसा जाती है मानो मसला जंग का है लेकिन यहाँ तो मैच ही है न तो उसे मैच क्यों नही रहने दिया जाता है.
 
क्रिकेट जब जेंटल गेम है तो क्यों उसके प्रशंसको की भाषा ‘जेंटल’ नही है?क्यों उसके प्रशंसक किसी को बाप किसी को बेटा बना रहें है,क्या बाप और माँ तक पहुचना इतना ही आसान है,और है तो क्यों हो रहा है ऐसा ? सवालों के जवाब से पहले एक और सवाल आ जायगा की पाकिस्तान में भी ऐसा ही होता है,तो क्या हम भी “पाकिस्तान” बनना चाहते है,बुरा बनना चाहते है?
 
अगर वो ऐसा कर रहें है तो क्या हम भी उनकी तरह “ओछा” बन जाना चाहते है?बेशक हमे अपनी टीम का सप्पोर्ट करना है और करना भी चहिये लेकिन वो बिना किसी को कोसे और सभ्य का भाषा का इस्तेमाल करके भी बखूबी हो सकता है तो करिये और खेल को खेल रहने दीजिये, क्योंकी ये बस सात से आठ घंटे का मैच है बस मैच न की सात से आठ घंटे की जंग,शायद हम इस फर्क को जान पायें और सब भी जान पाए की जिस तरह ये खेल जेंटल मैन गेम है ठीक उसी तरह इसके हर एक “प्रशंसक” को भी जेंटल होना चाहिए……

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Asad Shaikh

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