पठानकोट, उरी और अब पुलवामा। ये तीन हमले 2014 के बाद एनडीए सरकार में  सीधे सीधे सुरक्षा बलों पर हुए। दो तरह के हमले होते हैं। एक तो वे हमले जिनमे लक्ष्य सुरक्षा बल नहीं बल्कि नागरिक या कोई वीआईपी या कोई प्रतिष्ठान होता है। उन्हें बचाने के लिये सुरक्षा बल सामने आते हैं, जो उनका दायित्व है और वे वह हमला अपने ऊपर लेकर मुकाबला करते हैं। ऐसे में सुरक्षा बलों का नुकसान हो भी सकता है और नहीं भी। ऐसे हमलों में प्राथमिक रूप से मुख्य टारगेट सुरक्षा बल नहीं होते हैं।

दूसरे तरह के वे हमले होते हैं जो सीधे सुरक्षा बलों के ठिकानों, पिकेटों और उनके काफिले पर होता है। यह हमला हमलावर आतंकियों के दुस्साहस का परिणाम होता है। क्योंकि उन्हें पता रहता है कि टारगेट मज़बूत है और प्रतिरोध अवश्य होगा। ऐसे हमले आत्मघाती दस्ते या फिदायीन करते हैं। ऐसे हमलावर मृत्यु को अवश्यम्भावी मान कर चलते हैं। इन हमलों में सीधा टारगेट सुरक्षा बल होते हैं। चूंकि सुरक्षा बल ऐसे हमलों के लिये मानसिक, और पेशेवर रूप से तैयार होते हैं तो आतंकी भी ऐस्र हमले पूरी तैयारी के साथ करते हैं।

पठानकोट हमला हमारे एयर बेस पर, उरी हमला हमारे सैन्य कैम्प में और पुलवामा हमला हमारे सीआरपीएफ के काफिले पर था। ये हमले आतंकियों के बढ़े हुए मनोबल को भी दर्शाते हैं और उनके पुख्ता इरादे को भी। 2 जनवरी 2016 को तड़के सुबह 3:30 बजे पंजाब के पठानकोट में पठानकोट वायु सेना स्टेशन पर भारी मात्रा में असलहा बारूद से लैस आतंकवादियों ने आक्रमण कर दिया। संभवत: जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों से मुठभेड़ में दो जवान शहीद हो गये जबकि तीन अन्य घायल सिपाहियों ने अस्पताल में दम तोड़ दिया। सभी आतंकवादीभी मारे गये। हालांकि किसी संभावित बचे हुए आतंकी के छुपे होने की स्थित में खोज अभियान पांच जनवरी को भी चल रहा था। बाद में सरकार ने न जाने क्या सोच कर पाकिस्तान की आईएसआई को इस हमले की जांच के लिये अपने एयरबेस में मौका मुआयना करने दिया। जबकि यह हमला भी आईएसआई प्रायोजित ही था। हमने मौका मुआयना के लिये आईएसआई को अनुमति तो दी पर पाकिस्तान ने यह सुविधा आईएसआई मुख्यालय में जाने की नहीं दी। यही नहीं उसने हमारे सारे सुबूत को भी रद्दी कह कर रद्द कर दिया।

उरी हमला 18 सितम्बर 2016 को जम्मू और कश्मीर के उरी सेक्टर में एलओसी के पास स्थित भारतीय सेना के स्थानीय मुख्यालय पर हुआ, एक आतंकी हमला है जिसमें 18 जवान शहीद हो गए। सैन्य बलों की कार्रवाई में सभी चार आतंकी मारे गए। यह भारतीय सेना पर किया गया, लगभग 20 सालों में सबसे बड़ा हमला है। उरी हमले में सीमा पार बैठे आतंकियों का हाथ बताया गया है। इनकी योजना के तहत ही सेना के कैंप पर फिदायीन हमला किया गया। हमलावरों के द्वारा निहत्थे और सोते हुए जवानों पर ताबड़तोड़ फायरिंग की गयी ताकि ज्यादा से ज्यादा जवानों को मारा जा सके। अमेरिका ने उड़ी हमले को “आतंकवादी” हमला करार दिया। इसी हमले के बाद सर्जिकल स्ट्राइक हुयी थी जिसमे आतंकी ठिकाना नष्ट किया गया था। भारतीय सेना यह एक उल्लेखनीय सफलता थी।

14 फरवरी 2019 को, जम्मू श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर भारतीय सुरक्षा कर्मियों को ले जाने वाले वाहनों के काफिले पर आत्मघाती हमला हुआ, जिसमें अब तक 44 सुरक्षा कर्मियों की जान जा चुकी है। यह हमला जम्मू और कश्मीर के पुलवामा ज़िले के अवन्तिपोरा के निकट लेथपोरा इलाके में हुआ जो एक आत्मघाती हमलावर द्वारा किया गया हमला था। इस हमले की जिम्मेदारी पाकिस्तान स्थित इस्लामिक आतंकवादी समूह जैश-ए-मोहम्मद ने ली है।

निश्चित रूप से इन तीनों हमलों को लेकर सुरक्षा खामियों की जांच हुयी होंगी या हो रही होंगी। पर जितनी खबरें हमले और उसके नुकसान को लेकर मीडिया में छपती और प्रसारित होती रहती हैं उतनी खबरें हमलों की जांच और दोषी पाए और दंडित किये गए अधिकारियों तथा कर्मचारियों को लेकर नहीं छपती हैं। जब कि सरकार को अधिकृत रूप से यह बताना चाहिये कि उन हमलों के लिये सुरक्षा चूक की जिम्मेदारी किस पर है, और इस चूक के लिये किसे दण्डित किया गया है। इस तरह की खबरें जब नहीं आती हैं तो गलत और मिथ्या खबरें तैरने लगती हैं जो अविश्वास का एक ऐसा वातावरण बना देती हैं जिससे सरकार और सरकारी तंत्र की साख पर बराबर सवाल उठते रहते हैं।

पठानकोट, उरी और पुलवामा हमलों की समीक्षा करें तो पुलवामा हमले में सुरक्षा संबंधी गंभीर चूक प्रत्यक्षतः दिखाई देती है। जबकि पठानकोट और उरी जो कि कैंप के अंदर किये हमले थे उनमें सतर्कता थी और इन्हीं सतर्कता के कारण हमलावर मारे गए थे। पुलवामा में टारगेट बिल्कुल साफ था और हमला करना आसान था। क्योंकि काफिला सड़क पर चल रहा था और जहां से शुरू हुआ और जहां तक उसे जाना था, वहां तक वह हमले के लिये वह बिल्कुल खुला हुआ टारगेट था। एक्सपोजर की समय सीमा भी अधिक थी। एक बेहद संवेदनशील इलाके में 2500 जवानों का कानवाय बसों ट्रकों से निकल रहा है और सड़क और उससे निकलती हुयी अन्य सड़कों, गलियों के मिलन विंदु पर कोई पिकेट और ड्यूटी न हो यह चूक सामान्य नहीं है।

सामान्य काफिले में भी एक योजना बनायी जाती है कि पायलट कौन करेगा, अंतिम वाहन के झंडे के गुज़र जाने के बाद ही कोई और वाहन जाने दिया जायेगा। कोई अपरिचित और बिना चेक किये गए वाहन या कोई चीज सड़क पर न रहे। काफिले का क्रम भंग कर के या फिर पीछे से अंतिम गाड़ी जिसपर झंडा लगा रहता है को ओवरटेक करके कोई वाहन आगे जाने ही नहीं दिया जाएगा। अगर ऐसा कुछ होता है तो उससे कैसे निपटा जाएगा यह भी तय रहता है।  फिर यह तो घोषित रूप से आतंकवाद प्रभावित क्षेत्र है तो यह न्यूनतम सुरक्षा ड्रिल तो होनी ही चाहिये थी। इन सब बंदोबस्त का एक स्टैंडिंग आर्डर या स्थायी आदेश जारी होता है और उक्त आदेश का उल्लंघन दंडनीय होता है।

अगर सरकार और सत्तारूढ़ दल के लोग यह सोच रहे हैं कि ऐसी चूकों और सुरक्षा के मामलों में सवाल नहीं उठाए जाने चाहिये तो यह उनका बेहद गैर जिम्मेदाराना रवैय्या है। यही रवैय्या पठानकोट और उरी के बाद हुआ और फिर यही रवैया पुलवामा के बाद भी जारी है । यह सवाल तब और उठते हैं जब मीडिया और न्यूज़ चैनल लगातार खबरें देने लगते हैं और वे उन सैन्य कार्यवाहियों के पल पल के ऑडियो विजुअल जारी करने लगते हैं जो अलग अलग चैनलों पर अलग अलग तथ्यों के साथ प्रस्तुत किये जाते हैं। चैनल इन खबरों का आधार अपने अपने सूत्र बताते हैं और उनके सूत्र क्या हैं यह अंत तक पता नहीं चलता है। ये सूत्र सरकार के अंदर बैठे लोगों के भी हो सकते हैं और जनता के भी। कोई भी इन सूत्रों के बारे में जानना नहीं चाहता है। मीडिया इन सूत्रों को बताने के लिये बाध्य भी नहीं है। इस प्रचार युद्ध से एक ऐसे भ्रम का वातावरण बनने लगता है जिससे यह पता ही नहीं चलता कि सच क्या है और झूठ क्या है । जब ऐसे धुंध और भ्रम का वातावरण बनेगा तो निश्चित रूप से इन सैन्य कार्यवाहियों पर सवाल उठेंगे और लोग सरकार से स्थिति साफ करने के लिये कहेंगे।

पुलवामा हमले की जिम्मेदारी जैश ने ली है और यह उसी दिन साफ हो गया था। 26 फरवरी को भारतीय वायुसेना ने  पाकिस्तान की सीमा में घुस कर बालकोट स्थित जैश के ठिकानों पर बमबारी की। यह बमबारी 3.30 बजे सुबह हुयी और सुबह से ही यह खबरें चलने लगीं। तभी एक चैनल ने 300, फिर दूसरे ने 350 और फिर किसी अन्य ने अन्य संख्या में आतंकियों के हताहत होने की खबरें देनी शुरू कर दी। पर सरकार और न ही वायुसेना की तरफ से कुछ कहा गया। इतनी जल्दी सैन्य प्रवक्ता और सरकार कहती भी नहीं है, जब तक कि वे सारी सूचनाओं का अध्ययन और उनकी प्रमाणिकता की पड़ताल न कर लें। भ्रम फैलने का एक बड़ा कारण यह रहा कि सत्तारूढ़ दल भाजपा के प्रवक्ता और अध्यक्ष ने भी जो संख्या दी उनकी भी पुष्टि न तो सरकार ने की और न ही वायुसेना के प्रमुख ने। ऐसे में सबसे अधिक साख सरकार और सेना की दांव पर लगती है और तब जो जो व्यक्ति और संगठन सवाल उठाते हैं, उन्हें देशद्रोही कह के सरकार और सत्तारूढ़ दल के प्रवक्ता खीज उतारते हैं।

क्या यह सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय के प्रवक्ता का यह दायित्व नहीं है कि वह अफवाह की तरह, सूत्रों के आवरण में लपेट कर खबरें फैलाने वाले खबरिया चैनलों के खबरों का तत्काल खंडन कर के जनता को यह बताएं कि कार्यवाही हुयी है विस्तृत और अधिकृत विवरण सरकार खुद बताएगी। ऐसी ही अफवाहें उरी के बाद हुयी सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भी उठीं थी और ऐसी ही अफवाहें अब भी उठी हैं।

सुबूतों का मांगना देशद्रोह नहीं है बल्कि सही खबरें और अधिकृत स्थिति से जनता को अवगत न कराना जनता को गुमराह करना है। यह गुमराहियत तब और अविश्वास उत्पन्न करने लगती है जब अलग अलग चैनल अलग अलग खबरें देते हैं और सरकार खामोश बैठ जाती है और न उन खबरों का खंडन करती है और न ही मंडन। जनता के ऊपर ही यह छोड़ देती है कि वह खुद ही अनुमान लगाए और उसी भ्रम की धुंध में भटकती फिरे। सरकार तो खामोश रहती है पर सरकारी दल के प्रवक्ता भी बढ़ चढ़ कर उन्हीं चैनलों की भाषा बोलने लगते हैं और जब उनसे तथ्य और प्रमाण मांगे जाते हैं तो उनकी खीज का अंत देशद्रोह पर जाकर टिक जाता है।

निश्चित रूप से सरकार की राजनैतिक इच्छा शक्ति इन हमलों के विरुद्ध की गयी जवाबी कार्यवाही के लिये प्रशंसा की पात्र है और सरकार तथा सैन्य बल की सराहना की जानी चाहिये, पर पठानकोट, उरी और पुलवामा हमलों के लिये जिम्मेदार सुरक्षा चूकों का जिम्मेदार कौन होगा ? क्या सरकार और सेना तथा सुरक्षा बलों के जिम्मेदार अधिकारियों को इन चूकों की जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिये ?