इन दिनों गोदी मीडिया ने देश के मुसलमानों से नफरत पैदा करने, उन्हें हाशिये पर डालने, उन को बदनाम करने की सुपारी ली हुई है, जिसे आप इस न्यूज़ चैनल की टैग लाइन से समझ सकते हैं, इसे आप इस्लामोफोबिया का फूहड़ भारतीय संस्करण भी कह सकते हैं, मोदी सरकार से पहले मीडिया की हिम्मत नहीं थी कि वो इस तरह की टैग लाइन देकर न्यूज़ चैनल पर डिबेट कराये, फोटो पर ध्यान न दें और मूल में जाकर रौशनी डालें कि ये मुस्लिम मुक्त भारत का फंडा है क्या ?

ज़्यादा पीछे नहीं जाकर संघ के एजेंडे को देखें और समझें तो इसके लिए सुब्रमनियन स्वामी का एक लेख ही काफी है, जिस पर काफी बवाल हुआ था, उस लेख का शीर्षक था ‘How to wipe out Islamic terror’ इसमें ‘Terror’ को ढाल बनाकर देश के मुसलमानों को ही ‘वाइप आउट’ करने का एजेंडा सामने रखा गया था ! कभी वक़्त मिले तो उस लेख को पढ़िए आपको इस ‘मुस्लिम मुक्त भारत’ की परिकल्पना समझ आ जाएगी !

आज़ादी के बाद संघ को अपने उस ‘वाइप आउट’ एजेंडे को मूर्तरूप देने का ये पहला (और शायद आखरी) भरपूर मौक़ा मिला है, और इस पर अमल भी शुरू कर दिया गया है, जिसके सैंकड़ों उदाहरण हमारे सामने हैं, मीडिया को साथ लेकर मुस्लिम विरोधी माहौल तैयार करना, सोशल मीडिया पर मुसलमानों के खिलाफ हेट स्पीच में बेतहाशा वृद्धि, घर वापसी से लेकर मुग़लों द्वारा नामित सड़कों, शहरों और स्मारकों के नाम बदलना, ताजमहल से लेकर क़ुतुब मीनार को हिन्दू स्मारक बताना, टीपू सुलतान के खिलाफ ज़हर उगलना आदि इत्यादि !

मुस्लिम मुक्त भारत का मतलब यूं समझिये कि धीरे धीरे करके देश के मुसलमानों को अवांछित या देश पर बोझ साबित करना, देशद्रोही या पाकिस्तान परस्त क़रार देना, सियासी स्ट्रीम से मुसलमानों को पूरी तरह से बेदखल कर देना, आगे जाकर किसी भी बहाने से उन्हें मताधिकार से भी वंचित कर देना, उन्हें नौकरियों, धंधों से दूर कर देना, हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा में यदि मुसलमान देश में रहें तो वो केवल नागरिक के तौर पर रहें, देश के राजनैतिक, आर्थिक क्षेत्र में उनकी कोई हिस्सेदारी न हो, न ही वो इनका कोई लाभ ले सकें !

और इसी नफरती एजेंडे का नतीजा है कि मुसलमानों को कई बार उनकी आइडेंटिटी की वजह से ही ट्रेनों और बसों में मारा पीटा गया है, उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया है, मॉब लिंचिंग की गयी है, उनसे ज़बरदस्ती जय श्रीराम के नारे लगवाए गए हैं और उनके वीडिओज़ सोशल मीडिया पर अपलोड किये गए हैं !

संघ यही चाहता है कि उसके परचम तले यदि मुसलमानों को रहना है तो उसे वंदे मातरम भी कहना होगा, सूर्य नमस्कार भी करना होगा, योग भी करना होगा, भारत माता की जय भी बोलनी होगी, जो ये नहीं करेगा वो भारतीय नहीं कहलायेगा, संघ के पसंद के मुसलमान बनने के लिए मुसलमानों को अपनी आइडेंटिटी, अपनी भाषा, परंपरा, खान-पान, रहन-सहन, विरासत सब छोड़ देना होगा !

मुसलमानों को सुनियोजित साजिश के तहत धकेल कर कोने में कर दिया गया है, आज मुसलमान आहत और बेचैन हैं, शैक्षिक, आर्थिक, राजनैतिक क्षेत्र में पिछड़े होने की वजह से उस पर ये दोहरी मार है !

हिटलर के न्यूरेम्बर्ग लॉ को पढ़ेंगे तो समझ आएगा कि किस सुनियोजित ढंग से यहूदियों को देश की मुख्यधारा से काट कर अलग थलग कर दिया गया था, 1933 में हिटलर के सत्ता में आने के बाद नाजीवाद जर्मनी की सरकारी विचारधारा बन गया था, और यहूदियों को व्यवस्थित और सुनियोजित तरीके से निशाना बनाया गया था, 15 सितंबर 1935 के दिन न्यूरेम्बर्ग कानून बनाकर जर्मन यहूदियों को जर्मन नागरिकता से वंचित कर दिया गया था, और उल्टे स्वस्तिक को नाजी जर्मनी का आधिकारिक प्रतीक बना दिया गया था !

तो फिर इस ‘मुस्लिम मुक्त भारत’ की साजिश को नाकाम करने के लिए मुसलमानों को क्या करना होगा ? ये सवाल आसान तो है मगर इसका जवाब काफी लम्बा और मतभेद वाला भी हो सकता है, वजह कि देश का मुसलमान शैक्षिक, सामाजिक भौगोलिक, आर्थिक और राजनैतिक तौर पर कई हिस्सों में बंटा हुआ है,‌और पिछड़ा हुआ भी है, साथ ही उसकी ‘सामूहिक चेतना’ बिखरी हुई है !

मोटे तौर पर अगर नज़र सानी करें तो इसके लिए देश के मुसलमानों को खुद को शैक्षिक, सामाजिक और आर्थिक तौर पर मज़बूत करना होगा, शिक्षा ही वो हथियार है, जिससे वो इस देश में अपनी हिस्सेदारी का पुर वक़ार ढंग से दावेदारी कर सकता है, और आर्थिक तौर पर मज़बूत हो सकता है, सिस्टम में अपनी ताक़तवर मौजूदगी दर्ज करा सकता है, देश की मुख्यधारा में जब तक आपकी मौजूदगी की धमक और हिस्सेदारी नहीं होगी आप अवांछित ही क़रार दिए जाओगे, शैक्षिक, सामाजिक और आर्थिक तौर पर मुसलमानों को मज़बूत होना होगा और‌ एकजुट होकर अपनी क़ौम के लिए सर्वमान्य सामूहिक चेतना पैदा करना होगी !

मुसलमानों की प्राथमिकताओं पर हमेशा बहस होती है, और ये बात सच है कि मुसलमानों की प्राथमिकताएं बड़ी अजीब हैं, इस मुल्क के मुसलमानों ने खुद को कई फ़िरक़ों में तक़सीम कर लिया है, अपनी अपनी मस्जिदें अलग बना कर बोर्ड लगा दिए गए हों, क़ब्रिस्तान अलग बना लिए हैं, जिस देश के मुसलमानों की प्राथमिकताओं में मस्जिद के लाउड स्पीकर पहली पायदान और तालीम, अस्पताल, स्कूल, कॉलेज सब आखरी पायदान पर हों, उस देश के मुसलमानों की बर्बादी का ज़िम्मेदार कोई और कैसे हो सकता है ?

जैसे संघ ने पांच सात दशक अपने एजेंडे को मूर्तरूप देने के लिए लगाए ठीक वैसे ही मुसलमानों को इस देश में खुद को स्थापित करने के लिए तयशुदा एजेंडे को लेकर मज़बूती से आगे बढ़ना होगा, और इसके लिए किसी सियासी पार्टी,किसी सियासी रहनुमा, किसी मज़हबी रहनुमा का मुंह न देखें, ना ही इंतज़ार करें, शुरुआत अपने ही घर से ही करें, घर से शुरुआत हो चुकी हो तो पड़ोस से शुरुआत करें, गांव क़स्बे में तालीमी बेदारी की अलख जगाएं, याद रखिये जिस दिन आपकी इस देश की मुख्यधारा और सिस्टम में हिस्सेदारी और मौजूदगी बढ़ जाएगी उस दिन ये ‘मुस्लिम मुक्त भारत’ का एजेंडा चौराहे पर चीथड़े चीथड़े हुआ पड़ा मिलेगा !

अगर ये नहीं कर सकते तो फिर शिकायत करना बंद कीजिये और चुपचाप ‘मुस्लिम मुक्त भारत’ मुहिम को कामयाब होता देखिये !