रॉकेट साईंस नहीं है। हम पिछले साल ग्लोबल हंगर इंडेक्स में तीन पायदान नीचे सरक गए,यानी
119 देशों की लिस्ट में भारत 97 से 100 वें नंबर पर आ गया । परिवार राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण बताता है कि 1998-2002 के बीच 17 फीसदी बच्चे ही कुपोषण का शिकार थे, लेकिन 2012-2016 के बीच 21% बच्चे कुपोषण के दायरे में आ गए। यानि पांच साल के बच्चों की कैटेगरी में हमारे यहां दुनियाभर के औसत आंकड़े से दस फीसदी ज्यादा बच्चे कुपोषित हैं।
दिल्ली में तीन बच्चे 25 जुलाई, 2018 को दम तोड़ गए। कहा जा रहा है कि बच्चों की भूख मौत से हुई। वैसे अगर आप नीति आयोग की साइट पर जाएं तो, आपको बकायदा एक ब्लॉग के जरिए समझाया जाएगा, कि कैसे भूख के आंकडे गलत हैं और कुपोषण से निपटने के लिए सरकार क्या क्या कर रही। बकायदा आठ-दस योजनाओं के नाम विस्तार से लिखे हुए हैं।
एक अध्ययन ये भी बताता है कि भारत की महज एक फीसदी आबादी के पास देश के कुल धन का आधे से ज्यादा हिस्सा है। जिस साल हम ग्लोबल हंगर इंडेक्स में नीचे फिसले,उसी साल स्विस बैंकों में जमा किए जाने वाले वाले देशों की लिस्ट में छलांग मार दी, 2016 के मुकाबले 2017 में जमा काले धन में 50 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।
आप आंकडों से माथापच्ची करते रह जाएंगे,लेकिन कहीं झारखंड में संतोषी और दिल्ली में पारुल दम तोड़ देंगी। पॉलिटिक्स है और होती रहेगी,ना हमारे पढ़ने से कुछ होगा,ना बोलने सा। लेकिन अगर वाकई बच्चों की मौत भूख से हुई है,तो सरकार के साथ साथ क्या साथ रहने वाले पड़ोसियों,मुहल्ले वालों कि जिम्मेदारी नहीं कि ऐसे हालातों में इनसानित निभाई जाए। जिस दिल्ली में खाए जाने लायक भोजन रोजाना बर्बाद होता है,वहां तीन छोटे बच्चों की भूख के लिए सरकारों और नीतियों की ओर देखना बेमानी है। असंवेदनशील सिस्टम से जागरुक समाज ही मुकाबला कर सकता है। आस पड़ोस में देखिए,जरुरत मंदों की मदद कीजिए। ऐसा सिस्टम बनाइये जो मैटिरियलिस्टक ना हो कर मिनिमलिस्टिक हो।

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Alpyu Singh

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