आप क्या समझते हैं घर वापसी, बीफ बैन, मस्जिद से अज़ान, लाउड स्पीकर्स पर बवाल, मदरसों पर बवाल, जनसँख्या पर बवाल, लव जिहाद, तीन तलाक़, धर्मांतरण पर बवाल, बुर्क़े पर बवाल, तीन तलाक़, हलाला जैसे मुद्दों पर दिन रात न्यूज़ चैनल्स पर हिन्दू मुस्लिम बहसें कर मुसलमानों की नेगेटिव छवि पेश करना, पांच हज़ारी मौलानाओं द्वारा इस्लाम की नेगेटिव इमेज पेश करना, गौरक्षकों द्वारा मुसलमानों का बीच सड़क पर क़त्ले आम, ये सब क्या है ?

ये इस्लामोफोबिया का फूहड़ भारतीय संस्करण है, और ये एक मनोवैज्ञानिक गेम है जिसे स्लो पाइजन की तरह जनमानस में ठूंसा जा रहा है और ये कामयाब भी हो रहा है ! और ताज़ा खबर आयी है कि DU में इस्लामी आतंकवाद पाठ्यक्रम शुरू करने को मंज़ूरी दे दी गयी है, इस हरकत के बाद अब कोई शक नहीं रह गया है कि इस्लामोफोबिया के फूहड़ संस्करण को भारत में लागू करने की सुनियोजित कुटिल साजिश की जा चुकी है.

अगर बात इस्लामोफोबिया की करें तो बहुत लम्बी पोस्ट हो जाएगी, संक्षेप में इसे यूं समझ सकते हैं कि इस्लाम विरोधी कुछ बड़े अमरीकी और यहूदी घरानों और दक्षिणपंथी थिंक टैंकों द्वारा 2001 से अमरीका और यूरोप में इस्लाम के प्रति नफरत फ़ैलाने के लिए एक सुनियोजित दस वर्षीय मनोवैज्ञानिक अभियान चलाया गया, और इस पर 2001 से 2009 तक 4 करोड़ 20 लाख डालर जैसी भारी भरकम राशि खर्च की गयी, और इसे कामयाबी भी मिलने लगी, 9 /11 के हमले ने इस इस्लामॉफ़ोबिक मुहीम को ज़बरदस्त रफ़्तार दी.

इस्लामोफोबिया के लिए की गयी इस भारी भरकम फंडिंग के बारे में अमरीका में जारी रिपोर्ट आप यहाँ क्लिक कर पढ़ सकते हैं :-

इस अभियान को सफल बनाने के लिए इस दक्षिणपंथी समूह ने पूरा एक नेटवर्क विकसित किया और इसके लिए इन्होने ‘मीडिया का सहारा’ लिया, इस नेटवर्क में सेंटर फॉर सिक्योरिटीपॅालिसी के फ्रैंक जैफ्नी, फिलाडेल्फिया के मिडिल ईस्ट फोरम के डैनियल पाइप्स, इन्वेस्टिगेटिव प्रोजेक्ट ऑन टेररिज़्म के स्टीवन इमर्सन, सोसाइटी ऑफ अमेरिकन्सफॉर नेशनल एग्जि़स्टेंस के डेविड येरूशलमी और स्टॅाप इस्लामाइजेशन ऑफ अमेरिका के रॉबर्ट स्पेन्सर जैसे लोग शामिल हैं

जिनको ”इस्लाम और उसकी वजह से अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा पर तथाकथित खतरे’ के मुद्दे पर टिप्पणी करने के लिए प्राय: टेलीविज़न चैनलों और ‘दक्षिणपंथी रेडियो टॉक शो’ (यहाँ इनवर्टेड कोमा में समेटे गए शब्दों और वाक्यों पर गौर कीजिये) पर बुलाया जाता है और जिनको रिपार्टमें ‘सूचना को विकृत करने वाले विशेषज्ञ’ बताया गया है.

इस उपरोक्त जानकारियों से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि विश्व में इस्लामोफोबिया के विस्तार के लिए कितने बड़े स्तर पर काम किया जा रहा है, तहलका के स्टिंग में नंगे हुए मीडिया घरानों की हकीकत को मुल्क में न्यूज़ चैनल पर मुस्लिम विरोधी माहौल बनाने, हिन्दू-मुस्लिम बहसों, लव जेहाद, धर्मांतरण, तीन तलाक़ और हलाला जैसे मुद्दों पर इस्लाम की नकारात्मक छवि पेश करना.

जैसा कि ऊपर के एक पेराग्राफ में सबूत है कि किस तरह से दक्षिणपंथी समूह ने पूरा एक नेटवर्क विकसित किया और इसके लिए इन्होने ‘मीडिया का सहारा’ लिया, और चुनिंदा ‘दक्षिणपंथी रेडियो टॉक शो’ पर बैठकर तयशुदा एजेंडे को लोगों के दिमागों में ठूंसा गया.

ठीक उसी तर्ज़ पर एक दशक से और खासकर ‘पिछले चार सालों’ से ये मनोवैज्ञानिक गेम खेला जा रहा है, और ये सब बिना पैसे के संभव नहीं है, सभी ने देखा है कि तहलका के स्टिंग में कई मीडिया घराने पैसों के बदले मुस्लिम विरोधी एजेंडे को हवा देने और हिंदूवादी एजेंडे परोसने को राज़ी हो गए थे.

“इस्लामोफोबिया का ये फूहड़ संस्करण देश में फूहड़ तरीके से कामयाब भी हो रहा है, इस प्रोपगंडे के चलते देश में मुसलमानों को शंकित दृष्टि से देखा जाने लगा है, वो अप्रत्याशित तौर पर अवांछित, आततायी, कठमुल्ले जेहादी और आतंकी के तौर पर स्थापित होते नज़र आ रहे हैं, ये झूठ इतनी बार यक़ीन के साथ परोसा गया है कि इस झूठ पर कुंद ज़हन लोगों ने यक़ीन करना शुरू कर दिया है, और देश के दक्षिणपंथी न्यूज़ चैनल्स व पांच हज़ारी मौलाना रोज़ न्यूज़ चैनल्स की डिबेट्स में इस नफरत के प्रोपगंडे को पुख्ता करने इकठ्ठे नज़र आते हैं.’

आगे बात करते हैं अपनी मीडिया की या ‘दक्षिणपंथी न्यूज़ चैनल्स’ की डिबेट्स की, इस नफरती इस्लामॉफ़ोबिक मुहिम को रोज़ हवा देते और मुंह से झाग निकालते एंकर्स को कौन नहीं जानता, तीन तलाक़ हो या फिर धर्मांतरण, या फिर लव जेहाद या फिर मदरसे या फिर बुर्का या फिर हलाला, मुसलमानों के खिलाफ रोज़ नयी टैग लाइन के साथ वैचारिक मॉब लिंचिंग करने वाले ये एंकर्स कौन हैं, किस के इशारे पर ये सब कर रहे हैं, अब किसी से छुपा नहीं है और इस नफरती मुहीम या ‘इस्लामोफोबिया के फूहड़ भारतीय संस्करण’ को बढ़ावा दे रहे न्यूज़ चैनल्स पर बैठकर स्क्रिप्टेड बहसों में इस्लाम की नेगेटिव इमेज पेश करने वाले पांच हज़ारी लाना, ये जाने अनजाने कुछ हज़ार के लिए इस कुटिल प्रोपगंडे का औज़ार बन रहे हैं, और अपनी ही क़ौम का भयंकर नुकसान कर रहे हैं जिसकी भरपाई शायद दसियों साल में न हो पाए.

इस एजेंडे को उपरोक्त नफरती मुहिम से जोड़कर समझ सकते हैं कि इस माध्यम के ज़रिये देश में मुसलमानों के खिलाफ परोसे जा रहे मनोवैज्ञानिक गेम में इनका कितना बड़ा रोल है, अब इसमें कोई शक बाक़ी नहीं रह गया है कि देश में इस्लामोफोबिया का फूहड़ भारतीय संस्करण लागू किया जा रहा है और आपस में एक दूसरे की टांग खींचने वाले, फ़िरक़ा फ़िरक़ा खेलने वाले ‘हम सब’ असहाय होकर इस नफरती मुहिम को कामयाब होते देख रहे हैं.

इससे बचाव या इसके तोड़ पर फिर कभी किसी पोस्ट में.