October 26, 2020
क्या आप जानते हैं

क्या है अपराध के घटनास्थल का रिक्रिएशन या नाट्य रूपांतरण ?

क्या है अपराध के घटनास्थल का रिक्रिएशन या नाट्य रूपांतरण ?

क्राइम सीन का रिक्रिएशन या नाट्य रूपांतर  विवेचना का एक नया कंसेप्ट है। यह जटिल और उलझे हुये आपराधिक मामलों में घटनास्थल, अपराध की प्रकृति, और अपराध की सारी घटनाओं को मिलाकर, अपराध की बारीकी समझने के लिये किया जाता है। यह विवेचना का वैज्ञानिक पहलू है। इसमे जैसी घटना हुई होती है उसी के अनुसार सीन का रिक्रिएशन या नाट्य रूपांतर किया जाता है। जब मुल्ज़िम जुर्म कबूल कर लेता है तो उससे विस्तार से पूछताछ होती है, और वह इंटेरोगेशन लम्बा तथा एक एक विंदु पर होता है। इस पूछताछ से, अपराध के समय मुल्ज़िम की स्थिति, लोकेशन तथा उसके द्वारा किये गए जुर्म की पूरी घटना का सीक्वेंस, घटनास्थल पर ही रचा जाता है। वही मुल्ज़िम से मौके पर भी पूछताछ की जाती है।  यह प्रक्रिया मुल्ज़िम की गिरफ्तारी और उसकीं जुर्म की स्वीकारोक्ति के बाद ही की जाती है। अगर उसने जुर्म स्वीकार नहीं किया है तो, फिर घटनास्थल का रिक्रिएशन हो ही नही सकता है क्योंकि वह वहाँ जाकर भी यही कहेगा कि हमें क्या मालूम, मैं तो जुर्म में था ही नही। इकबाल जुर्म इसकी पहली शर्त है।
अदालत पुलिस कस्टडी में अभियुक्त की स्वीकारोक्ति को सुबूत के रूप में, स्वीकार नहीं करती है। पर उस स्वीकारोक्ति के आधार पर कोई और तथ्य या सुबूत या ऐसी बरामदगी होती है जो मुक़दमे से जुड़ी है तो वह अंश साक्ष्य अधिनियम के अनुसार अदालत में मान्य है। सीन का रिक्रिएशन या नाट्य रूपांतर, जिस समय और जिस स्थान की घटना है उसी समय और उसी स्थान पर किया जाना चाहिये। यह रूपांतर घटना के अनुसार हू ब हू किया जाना चाहिये।
हैदराबाद मुठभेड़ के चारो मुल्ज़िम डॉ रेड्डी बलात्कार कांड में पहले ही गिरफ्तार हो चुके थे औऱ अखबार के अनुसार उन्होंने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया था। तभी उनसे अपराध की वास्तविक स्थिति समझने के लिये घटना के मौके पर ले जाया गया था। उसी सीन रिक्रिएशन के समय ही उन्होंने भागने की कोशिश की होगी, जहां वह मुठभेड़ में मारे गए। विवेचना का एक सीधा सा सूत्र है कि अगर मुल्ज़िम ने स्वतः आत्मसमर्पण नहीं किया है तो, वह पुलिस की हिरासत से भाग सकता है या भागने की कोशिश करेगा । यहां भी यही सूत्र लागू होता है।
इस केस के चारो मुल्ज़िम गिरफ्तारी के बाद से ही, या तो ज्यूडिशियल कस्टडी में रहें होंगे या पुलिस हिरासत में। अगर वे ज्यूडिशियल कस्टडी में थे तो उनको पुलिस रिमांड पर लेकर ही पुलिस ने अपनी हिरासत में दुबारा लिया होगा। पुलिस कस्टडी रिमांड भी पुलिस जिस उद्देश्य के लिये मांगती है उसे अदालत जब संतुष्ट हो जाती है तभी देती है। इस केस में भी अदालत ने पुलिस तफ्तीश की केस डायरी और सुबूतों को देखा होगा तभी यह रिमांड  दिया होगा। यह रिमांड एक निश्चित अवधि जो एक दिन से चार पांच दिन तक या अधिक से अधिक 14 दिन का हो सकता है, अदालत स्वीकृति करती है। अदालत को पुलिस के विवेचक को यह बताना पड़ता है कि यह रिमांड क्यों जरूरी है और अदालत पुलिस के तर्क से संतुष्ट हो जाने के बाद ही रिमांड देती है।
जब कोई मुल्ज़िम, मैजिस्ट्रेट की अदालत द्वारा पुलिस कस्टडी रिमांड पर दिया जाता है तो उसके साथ अगर अदालत चाहे तो मुल्ज़िम के  वकील को भी मुल्ज़िम की खैर खबर लेने के लिये अनुमति दे सकती है। यह कोई तयशुदा नियम नहीं है, बल्कि ऐसा मुल्ज़िम की हैसियत और अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करता है।  रिमांड पर लिये, मुल्ज़िम का मेडिकल चेकअप भी कराया जाता है, और यह मेडिकल चेकअप, कस्टडी रिमांड में लेते समय और रिमांड की अवधि बीत जाने के पहले जब उस मुल्ज़िम को पुनः जेल में दाखिल किया जाता है तो, कराया जाता है। इस प्रकार के मेडिकल चेकअप का उद्देश्य यह है कि,मुल्ज़िम के साथ पुलिस रिमांड के समय कोई मारपीट न हो और वापस लौटाते समय मुल्ज़िम को कोई नयी चोट जो रिमांड  कस्टडी में लेने के बाद की आयी हो, तो इसकी जिम्मेदारी पुलिस के विवेचक पर दी जा सके। क्योंकि अदालत उसी विवेचक की कस्टडी में रिमांड स्वीकृति करती है। मुल्ज़िम को सुरक्षित और बिना किसी चोट के रिमांड की अवधि बीत जाने के बाद वापस करना, यह विवेचक का वैधानिक दायित्व है।
तेलंगाना के बारे में मुझे बहुत अधिक नहीं पता है, पर उत्तर प्रदेश में अदालतें अकसर पुलिस कस्टडी का रिमांड आसानी से स्वीकृत नहीं करती हैं। अत्यंत ज़रूरी मामलो में भी, थाना प्रभारी या अन्य अधिकारियों को भी, पुलिस रिमांड के लिये, व्यक्तिगत रूप से मैजिस्ट्रेट से अनुरोध करना पड़ता है । पुलिस भी, जब तक मुल्ज़िम जुर्म की स्वीकारोक्ति स्वेच्छा से नहीं कर लेता है तब तक या उससे अपराध से जुड़ी किसी वस्तु, हथियार, दस्तावेज, धन आदि की बरामदगी की कोई ठोस उम्मीद नहीं रखती है, तब तक पुलिस कस्टडी रिमांड पर नहीं लेती है। यूपी में अगर रिमांड मिला तो भी,  रिमांड की अवधि भी दो तीन दिन से अधिक नहीं होती है। लेकिन अगर यही विवेचना सीबीआई या एसआईटी या सीबीसीआईडी जैसी स्पेशल आपराधिक विवेचना की शाखाएं करती हैं तो उन्हें आसानी से पुलिस कस्टडी रिमांड मिल जाता है।
इसका कारण यह है अदालतें यह धारणा बना कर चलती हैं कि जिला पुलिस अपनी अभिरक्षा में मुल्ज़िम को यातना देगी और जबर्दस्ती जुर्म कुबूल करवाएगी या बरामदगी में कोई हेराफेरी कर सकती है। यह पुलिस की साख का संकट है। अदालत मुल्ज़िम से यह पूछती भी है कि वह क्या, कहाँ और कैसे अपराध से जुड़ी किसी, सुबूत की बरामदगी कर सकती है। यह रिमांड इसलिए  भी लिया जाता है कि रिमांड पर दिए गए मुल्ज़िम के अतिरिक्त, अन्य मुल्ज़िम अगर घटना में शामिल हों औऱ अब तक नही पकड़े गए हों तो उनका भी पता लगाया जाय और उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाय।
अगर मुल्ज़िम, ज्यूडिशियल कस्टडी यानी न्यायिक अभिरक्षा में जेल में नहीं है और पुलिस की ही गिरफ्त में है तो पुलिस उससे पूछताछ करने के लिये स्वतंत्र है और अदालत का इससे कोई सरोकार ही नहीं है। लेकिन पुलिस चौबीस घँटे से अधिक किसी भी अभियुक्त को अपनी हिरासत में रख भी नहीं सकती है, उसे मुल्ज़िम को मैजिस्ट्रेट के सामने पेश करना ही होगा। मैजिस्ट्रेट तब भी सीधे ही पुलिस को उसकी अभिरक्षा में रिमांड पर दे सकता है या ज्यूडिशियल कस्टडी, न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज सकता है। अगर जुर्म जमानत के योग्य और मैजिस्ट्रेट की जमानत देने की शक्तियों के अंतर्गत है तो वह जमानत पर भी छोड़ सकता है।
पुलिस अभिरक्षा में मुल्ज़िम की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी पुलिस पर ही होती है। मुल्ज़िम कितना भी दुर्दांत हो, कितने भी मुक़दमे में शरीक रहा हो, कितना भी समाज के लिये घातक हो, अगर उसकी मृत्यु किसी भी कारण से, चाहे वह आत्महत्या कर ले, या अपनी सामान्य मृत्यु से मर जाय, तो यह सम्बंधित थाने के लिये एक गंभीर घटना मानी जाती है। उत्तर प्रदेश में पुलिस हिरासत में हुई मृत्यु पर थाना प्रभारी का निलंबन, उसके खिलाफ हत्या का मुकदमा और मैजिस्ट्रेट की जांच के स्थायी आदेश हैं और साथ ही राज्य मानवाधिकार आयोग  तथा गम्भीर मामलो में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी दखल देता है।  इसके कारण कभी कभी कानून व्यवस्था की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है।
जब मुल्ज़िम पुलिस कस्टडी रिमांड पर लिया गया है तो यह स्थिति और गंभीर हो जाती है, क्योंकि उसका मेडिकल चेकअप रिमांड लेते समय हो चुका होता है। इसी लिए हवालात में ऐसी कोई चीज नहीं रहती है जिससे अभियुक्त आत्महत्या कर सके। उसे हवालात के बाहर भी कहीं किसी विवेचना के काम से ले जाया जाता है तो उसे हथकड़ी लगाकर और पर्याप्त सुरक्षा में ही ले जाया जाता है। अगर वह हिरासत से भाग जाता है तो उसकी भी ज़िम्मेदारी पुलिस के उन अफसरों पर होती है जो उसे लेकर बाहर किसी काम से गये थे। हिरासत से भागने पर भी जो पुलिस कर्मी उसकी सुरक्षा में या जांच या विवेचना में उस मुल्ज़िम के साथ गये थे, दंडित होते हैं। यह दंड भी गम्भीर होता है। गंभीर अपराधों का मुल्ज़िम अगर हिरासत से भागा है तो, सेवा से बर्खास्तगी भी होती है। हुयी भी है।

( विजय शंकर सिंह )
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