मुज़फ्फरनगर का सरवट इलाका, मेन सिटी से थोड़ी दूर। यहां एक लाइन से कंस्ट्रक्शन और लकड़ी के सामान से जुड़ी कई दुकान हैं। इसी पंक्ति के बीचोंबीच घर है हामिद हसन का। घर की चौखट में दाखिल होने से पहले ही कानों में आरा मशीन की घरघराहट पड़ती है। घर में दाखिल होते ही दिखता है कि आरा मशीन से लकड़ियों की कटाई हो रही है, इसके बगल में एक कमरा है जिसके बाहर दो नई बनाई गई, लेकिन तोड़ी गई अलमारियां खड़ी हैं, इसी कमरे के जिसके तख्त पर बैठे हामिद हसन नमाज़ पढ़ रहे थे । नमाज़ अता करने के बाद, उन्होंने अपनी पोती रूकैया की शादी का कार्ड आगे बढ़ाया । पूरे हॉल में फर्नीचर और इलेक्ट्रॉनिक्स का सामान सहेज कर रखा गया था, फिर वही नया , लेकिन तोड़ा गया । हर चीज़ दो-दो के जोड़े में थी, दो फ्रिज, दो एसी। हामिद हसन आगे कहते हैं कि – अब ये सारा सामान फिर से खरीदना पड़ेगा । बड़ी मुश्किल से पैसे जोड़कर दो लड़कियों की शादी का सामान यहां रखा था। सारा सामान एक दो दिन में लड़कों वालों के घर भिजवाना ही थी कि ये सब हो गया। उन्होंने शादी के सारे मंसूबों पर पानी फेर दिया। अब क्या किया जा सकता है? वो रात कयामत की रात थी।

दरअसल 73 साल के हामिद हसन 20 दिसंबर की रात का जिक्र कर रहे हैं, ये वहीं रात है, जिसके बाद मुजफ्फनगर में कई घरों की जिंदगी बदल गई। हामिद हसन बताते हैं – रात ग्यारह बजे इसी कमरे में मैं अपने 15 साल के पोते मोहम्मद अहमद के साथ सोया हुआ था, उसी वक्त एक दर्जन से ज्यादा पुलिसवाले धड़ाधड़ दरवाज़ा तोड़कर घर में दाखिल हो जाते हैं। उनमें से एक ने बिना कुछ कहे मुझ पर हमला किया, मुझे बचाने के लिए पोती सामने आ गई। पुलिसवालों में से एक ने रूकैया पर भी हमला किया, उसका सिर फट गया और 14 टांके लगाने पड़े। इसके बाद हम घर की दूसरी मंजिल पर आ जाते है, परिवार के ज्यादातर सदस्य यहीं रहते हैं। एक महीने बाद भी घर की तबाही के निशान हर जगह हैं, फ्रिज तक को नहीं छोड़ा गया। परिवार का आरोप है कि घर के पुरुष सदस्यों को बेतहाशा पीटा गया। हामिद के छोटे बेटे साजिद को पहले बहुत मारा और फिर पुलिस उसे अपने साथ ले गई। इस बीच पुलिस पुलिस की नज़र में जो कुछ आया वो तोड़ा गया , सदस्यों के साथ मारपीट की गई ।

अपनी भर्राई आवाज़ में हामिद कहते हैं कि दोनों पोतियों की शादी के लिए मैंने सोने के जेवर बनवाए थे, लेकिन अलमारी तोड़कर जेवर निकाल लिए गए, साथ ही बारात की दावत के लिए साढ़े पांच लाख रूपये का इंतज़ाम भी किया था, वो सारा भी लॉकर तोड़कर लूट लिया गया। हामिद और उनकी पत्नी चारपाई पर बैठे हैं, तो उनकी सबसे बड़ी पोती रूकैया उनके पीछे ही चारपाई पर बैठी है। अपने माथे पर चोट का गहरा निशान लिए 22 साल की रूकैया अपनी उम्र से ज्यादा समझदार है, तीन -बहन भाइयों में सबसे बड़ी रूकैया ने बहुत छोटी उम्र में मां को खो दिया था, लिहाज़ा ज़िम्मेदारी की गंभीरता चेहरे से छलक ही जाती है।

वो कहती है कि 20 दिसंबर रात वो अपनी ज़िंदगी में कभी नहीं भूल सकती। जब सब लोग सोने की तैयारी कर रहे थे, उस वक्त पुलिस की बेरहम दंखलअंदाज़ी ने जहन पर बुरा असर डाला है, वो आगे बताती है कि बीते दिनों पड़ोसियों के घर जश्न मनाया जा रहा था, लोग पटाखे फोड़ रहे थे, लेकिन हमें डर लगा कि फिर कुछ हो गया है। हामिद आगे बताते हैं- मैं चालीस साल से यहां रह रहा हूं, कभी किसी ने इस बात का अहसास नहीं दिलाया कि मैं मुसलमान और वो हिंदू हैं। लेकिन उस दिन पुलिस ने कहा कि आज़ादी लोगे? तो बहुत खराब लगा, लेकिन पुलिस वाले मारते जा रहे थे और बीच में बोलते, आजादी लोगे ?

इस इलाके में आगे बढ़ते हुए मुज़फ्फरनगर का खालापार इलाका आता है, यहां घुसने के बाद जो चीज़ ध्यान खींचती है, वो हैं, एक लाइन से टूटे हुए शीशे के दरवाज़े और खिड़कियां। पुलिस की कार्रवाई को एक महीना बीत चुका है और कई दुकानों और घरों में फिर से शीशे लगवाएं जा चुके हैं। लेकिन फिर भी एक महीने पहले जो कुछ हुआ उसकी अनहोनी तासीर को अभी भी फिज़ा में महसूस किया जा सकता है।

ऐसे ही एक मोहल्ला मेन रोड से गुजरता है, सामने ही तीन मंज़िला घर है हाजी नसीम का। घर के बाहर खड़ी सैंट्रो कार के शीशे अभी भी चकनाचूर हैं। मेरे दरवाज़ा खटखटाने पर एक पैंतालीस-पचास की महिला बाहर निकलती है, घर में घुसने पर पता चलता है कि इस घर का भी वही हाल है जो हामिद हसन के घर का था। टूटे फर्नीचर में 85 फीसदी ठीक करवाया जा चुका है, लेकिन अब भी बहुत कुछ ऐसा है, जो कि यूपी पुलिस का वो चेहरा दिखा रहा है, जो डरावना है।

घर के मुखिया हाजी नसीम और पत्नी आज भी उस रात को याद कर कांप जाते हैं, वो कहते हैं कि 20 दिसंबर का दिन उन पर क़हर बनकर गुज़रा। उस दिन रात को 12 बजे के करीब कई सारे लोग पुलिस की वर्दी में घर में जबरन दाखिल हुए। वो कहती हैं – उस दिन घर पर सिर्फ मेरा भाई था, वो पास के गांव से ही आया था। घर में आते ही पुलिसवालों ने तोड़फोड़ मचाना शुरु कर दिया। बर्तनों से लेकर फर्नीचर कुछ नहीं छोड़ा। उस वक्त घर में सिर्फ दो महिलाएं ही रह गई थी। वो बार-बार पुलिस से तोड़फोड़ ना करने की गुजारिश करती रही, लेकिन उनकी एक ना सुनी गई। हारकर वो दोनों एक कंबल में दुबक कर बैठ गईं। पुलिस तोड़फोड़ करती रही, अपशब्द कहती रही। आखिरकार दहशत की वो रात गुज़र गई। पुलिस ने आधे घंटे में जो कुछ किया, उसे शायद उनके लिए ताउम्र भुलाना मुश्किल होगा । आज भी ये परिवार इतना डरा हुआ है कि बहुत संभल-संभल ही कुछ कह रहा है। डर उनकी आंखों से उतर कर ज़बान पर आ गया है। मैं वहां से निकलती हूं, तो वही धूल और टूटे कांच से लिपटी सैंट्रो कार फिर से देखती हूं, जिसे दाखिल होते वक्त देखा। कुछ वक्त बाद इसका रंगरोगन करा दिया जाएगा, लेकिन आंखों की पुतली में समा चुका डर क्या हामिद हसन और हाजी नसीम का परिवार हटा पाएगा। कहना मुश्किल है

क्रमश: