October 27, 2020

ये आपने कब देखा था कि एक राज्य के चुनाव और उसके नतीजों में लगभग सवा महीने का फासला रखा गया हो? चुनाव आयोग ने हिमाचल प्रदेश में आठ नवंबर को चुनाव कराने का ऐलान किया है, लेकिन नतीजों का ऐलान 18 दिसंबर को किया जाएगा। कोई भी सामान्य बुद्धि रखने वाला शख्स भी समझ सकता है कि ऐसा क्यों किया गया है?
क्या चुनाव आयोग अब केंद्र सरकार की सहूलियतों के हिसाब से चुनाव की तारीखें तय करेगा? गुजरात में भी दिसंबर में ही चुनाव होने हैं। होना तो यह चाहिए था कि चुनाव आयोग दोनों राज्यों के चुनाव की तारीख एक साथ ऐलान करता, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। हिमाचल प्रदेश के चुनाव नतीजों की तारीख 18 दिसंबर करने का मतलब यह है कि गुजरात के चुनाव भी 18 दिसंबर से पहले ही कराए जाएंगे और उसके चुनाव नतीजों की तारीख भी 18 दिसंबर ही रखी जाए तो कोई ताज्जुब नहीं होगा।
गुजरात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ताबड़तोड़ रैलियां, कई परियोजनाओं का उद्घाटन आदि बहुत कुछ कह देते हैं। इसका मतलब क्या है? क्या गुजरात में भाजपा को हार दिख रही है? ऐसा तो नहीं होना चाहिए। आखिर ‘गुजरात मॉडल’ ही ने तो भाजपा को देश की सत्ता पर बैठाया है, वह भी पूर्ण बहुमत के साथ। इतना ही नहीं, कई राज्यों में उसकी लगातार जीत इस बात का सबूत भी है कि देश की जनता नरेंद्र मोदी के नेतृत्व से खुश है और वह हर चुनाव में उसकी झोली वोटों से भर रही है।
नोटबंदी के बाद लगा था कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में उसे झटका लगेगा, लेकिन जनता ने उम्मीद से ज्यादा सीटें देकर भाजपा को खुश कर दिया। इसका मतलब यह था कि जनता नोटबंदी से खुश है और उसे उम्मीद है कि इससे गरीबी दूर होगी, अमीर रोएगा और गरीब हंसेगा। गरीबों की जिंदगी बदल जाएगी।
सब ठीक ठाक चल रहा था। एक जुलाई 2017 के बाद जब से जीएसटी लागू हुआ तो सब कुछ बदलने लगा। व्यापारी परेशान हो गए। जीएसटी के विरोध में आवाजें उठने लगीं। व्यापारी वर्ग सड़कों पर आ गया। इस बीच जीडीपी गिरने की खबर ने आग में घी का काम किया। बेरोजगारी के बढ़ते आंकड़ों ने केंद्र की मोदी सरकार को बैकफुट पर आने को मजबूर किया और ठीक दिवाली से पहले कुछ चीजों पर जीएसटी की दरों में परिवर्तन किया गया। लेकिन इतना काफी नहीं था।
नोटबंदी और जीएसटी का मिलाजुला असर बाजार पर साफ दिखाई देने लगा। नोटबंदी को एक कड़वी दवा की तरह देश की जनता ने पचा लिया था, लेकिन जीएसटी उससे भी ज्यादा कड़वी साबित हुई जो देश की जनता के हलक के नीचे नहीं उतर रही है। केंद्र की मोदी सरकार को उम्मीद थी कि ‘जनहित’ और ‘देशहित’ में जनता जीएसटी जैसी कड़वी दवा को भी हलक के नीचे उतार लेगी, लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा है। गुजरात चुनाव पर नोटबंदी और जीएसटी की छाया साफ दिखाई दे रही है। रही सही कसर गुजरात में बन रहे नए राजनीतिक समीकरणों ने भी भाजपा की पेशानी पर बल डाल दिए हैं।
पाटीदार नेता हार्दिक पटेल, दलित नेता जिग्नेश मेवाणी और पिछड़ों के नेता अल्पेश ठाकोर ने जिस तरह एक सुर में किसी भी हाल में भाजपा को हराने की बात कही है, उससे भाजपा खेमे में चिंता होना स्वाभाविक है। जरा कल्पना कीजिए। अगर गुजरात की जनता ने ही ‘गुजरात मॉडल’ को नकार दिया गया तो यह भाजपा के लिए कितना बड़ा झटका साबित होगा?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक महीने में पांच बार गुजरात दौरा बहुत कुछ कह देता है। आखिर जो गुजरात पहले से ही ‘विकसित’ है, वहां विकासवाद का ढिंढोरा पीटने की जरूरत क्या है? अगर 20 साल से गुजरात में भाजपा की सरकार रहते, और साढ़े तीन साल में केंद्र में मोदी सरकार के रहते भी गुजरात को अभी भी ‘विकास’ की जरूरत है, तो इसका मतलब क्या है? अगर वास्तव में गुजरात का विकास हो गया है, तो फिर वहां तो भाजपा को प्रचार की भी जरूरत क्यों होनी चाहिए? अगर गुजरात के ‘विकास मॉडल’ को आंकड़ों के आइने में देखें तो उससे निराशा होती है।
किसानों के साथ जो कुछ किया गया, वह इससे पता चलता है कि किसानों को फायदा पहुंचाने वाली सब्सिडी 2006-07 से लगातार घटती गई है। 2006-07 में 195 करोड़ और 2007-08 में 408 करोड़ से यह 2016-17 में घटकर मात्र 80 करोड़ रुपये (संशोधित अनुमान) रह गई है। इसके विपरीत अडानियों और अंबानियों के लिए यह 2006-07 में 1,873 करोड़ से बढ़कर 2016-17 में 4,471 करोड़ रुपये (संशोधित अनुमान) तक पहुंच गई है।
जहां तक गरीबों की बात है, खाद्य और नागरिक आपूर्ति के लिए आवंटन इसी अवधि में 130 करोड़ से घटकर 52 करोड़ रुपये रह गया है। 2004 में कैग के अुनसार गुजरात पर कुल कर्ज 4,000 करोड़ से 6,000 करोड़ रुपये के आसपास था। 2017 में गुजरात का कर्ज बढ़कर 1,98,000 करोड़ हो गया है। आंकड़े कैग या किसी अन्य संस्था के नहीं हैं, खुद गुजरात सरकार के हैं।
सामाजिक स्तर पर देखा जाए तो गुजरात में अल्पसंख्यक हमेशा की हाशिए पर रहे हैं। दलितों की हालत भी सही नहीं है। जब से गाय की खाल उतारने के नाम पर दलितों को सरेआम पीटा गया है, तब से दलितों में गहरा गुस्सा है। दलितों की उस आवाज को युवा दलित नेता जिग्नेश मेवाणी ने मुखरता उसे उठाया। अब उनका एक ही मकसद है, भाजपा को सत्ता से बाहर करना।
पटेल आरक्षण के चलते भाजपा से नाराज हैं। पिछड़ों के युवा नेता अल्पेश ठाकोर 23 अक्टूबर को गुजरात में राहुल गांधी के सामने कांग्रेस का हाथ थामने वाले हैं। पाटीदार नेता हार्दिक पटेल ने भी भाजपा के विरद्ध जाने का ऐलान किया है। दलित नेता जिग्नेश मेवाणी किसी पार्टी के साथ न जाने का ऐलान तो करते हैं, लेकिन भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोलने की बात साफ तौर पर कहते हैं।
गुजरात में भाजपा एक ऐसी ‘त्रिमूर्ति’ से मुकाबिल है, जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस के साथ है। भाजपा की यही मुश्किल है। वह कांग्रेस से निपट सकती है, लेकिन जब राज्य के दलित, पिछड़े और पटेल एक साथ भाजपा के खिलाफ जंग का ऐलान कर दें और जिनके साथ व्यापारियों के जाने का भी अंदेशा हो तो उसके सामने मुश्किल तो है। प्रधानमंत्री का गुजरात का एक महीने में पांच बार दौरा करने का मकसद ‘सुरक्षित किला’ बचाने के अलावा और क्या हो सकता है?
इस बीच चुनाव आयोग की विश्वसनीयता दांव पर है। अगर हाल फिलहाल चुनाव आयोग गुजरात में चुनाव का ऐलान करता है और नतीजों की तारीख 18 दिसंबर ही रखता है, तो चुनाव में कांग्रेस जीते या भाजपा, लेकिन चुनाव आयोग दोनों ही सूरतों में हार जाएगा।
(लेखक ‘दैनिक जनवाणी’ से जुड़े हैं)

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Saleem Akhtar Siddiqui

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