‘चरखे से आजादी नहीं मिली’ कहने वाले, यह जरूर पढ़ लें

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बीसवीं सदी के इतिहास पर जब भी चर्चा छिड़ेगी, महात्मा गांधी की स्थिति उस कालखंड की सबसे महत्वपूर्ण शख्सियत के रूप में मानी जायेगी। उनका योगदान भारत के स्वाधीनता संग्राम में तो है ही, पर उनका सबसे बड़ा योगदान है भारत के जनमानस में गहरे पैठे ब्रिटिश साम्राज्य के डर को निकाल देना । राजनीतिक व्यक्तित्व वैसे भी जनता से जुड़ता रहता है, पर गांधी का जनता से जुड़ाव अद्भुत था। स्वाधीनता संग्राम का इतिहास कहें या 1919 से लेकर 1948 तक का भारत का इतिहास, इसे आप गांधी युग भी कह सकते हैं, हर ऐतिहासिक घटनाक्रम को गांधी जी ने प्रभावित किया है। गांधी केवल भारतीय स्वाधीनता संग्राम के एक नायक ही नहीं थे, बल्कि उनके दर्शन और प्रयोगधर्मी चिंतन ने समाज और बौद्धिकी के हर आयाम को प्रभावित किया है।

साहित्य, कला, इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, दर्शन, आदि, मानविकी का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र बचा हो, जिस पर गांधी के विचारों या दर्शन का प्रभाव न पड़ा हो। जनता से, उनकी कनेक्टिविटी जबरदस्त थी। वे अपने पास आये हर पत्र का जवाब देते थे औऱ लोक को प्रभावित करने वाले हर बिंदु पर चाहे वह महत्वपूर्ण हो या सामान्य या व्यक्तिगत, अपनी राय रखते थे। भारतीय जन के साथ गांधी की इस सम्प्रेषणीयता का मूल कारण था, उनका जनता से अनवरत संवाद। वे जनता की नब्ज़़ समझते थे और जनता का अटूट विश्वास उन्हें प्राप्त था। 

गांधी ने लोक मानस और लोक साहित्य को भी गहराई से प्रभावित किया है। ऐसा भी नही था कि गांधी के पहले देश मे जननेता नहीं उभरे थे, पर जनता से जितना मुखर, विश्वसनीय और दिल को छू लेने वाला संवाद गांधी ने स्थापित किया था, उसे कोई छू तक नही सका। गांधी जी की विचारधारा, उनके कुछ कदमों और नीतियों की आलोचना भी खूब हुईं, पर इन तमाम आलोचनाओं के बाद भी गांधी ने जनता के दिल पर बेताज बादशाह की तरह राज किया। गांधी ने लेखकों को प्रभावित किया, फिल्मकारों को, प्रभावित किया और गांधी ने देश की लोकचेतना औऱ लोकमानस को प्रभावित किया। उन पर बड़े-बड़े शोधग्रंथ लिखे गए, संस्मरण लिखे गए तो लोक ने उनपर गीत भी रचे औऱ वे लोकपरंपरा से समाज मे फैलते हुए सुरभि की तरह व्याप्त हैं।

लोकमानस की व्याख्या करते हुए, हिंदी के सुप्रसिद्ध समीक्षक डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा है, “लोक की वेदना लोक की भाषा में ही ठीक-ठीक व्यक्त होती है। उसी में सुनाई पड़ती है जीवन की प्राकृत लय और उसकी भीतरी धड़कन। मनुष्य की सभ्यता और संस्कृति का उसके संपूर्ण रूप का अंतरंग साक्षात्कार लोक-भाषाओं में ही होता है।’’ निश्चित रूप से जब गांधी जी ने लोक वेदना को स्वर दिया, जनता की दुखती रग पर हांथ रखा, उसकी समस्याओं, दुःख, शोषण के प्रति सहानुभूति दिखाई तो गांधी जी की बातें जनमानस में पैठती चली गयीं। गांधी लोकगीतों में उतरने लगे, और उनका तादात्म्य कौशल उन्हें लोकगीतों में भी अमर कर गया। गांधी की भूमिका, देश मे राजनीतिक आज़ादी से अलग हट कर भी थी और समाज को समझने, स्वर देने, उसके साथ खड़े होने की गांधी की नीति ने उन्हें बीसवीं सदी और स्वाधीनता संग्राम के कालखंड का सर्वोच्च नेता बना दिया। 

गांधी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से वापस स्वदेश लौट आये और वे अपने साथ दक्षिण अफ्रीका में किये अपने नए विचार सत्याग्रह और असहयोग भी साथ लाये थे। गांधी जब स्वदेश लौटे तो तब देश मे कांग्रेस के मुख्य नेताओं में गोपाल कृष्ण गोखले औऱ बाल गंगाधर तिलक थे। गोखले, प्रतिवेदनवादी थे, यानी वे सरकार से अपनी बात कहते थे, सरकार की नीति का विरोध करते थे पर उनका रवैया नरम था, जबकि तिलक, ‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है,’ कह कर अपना उद्देश्य और इरादा ज़ाहिर कर चुके थे। गांधी, भारतीय राजनीति में गोखले के शिष्य थे। गोखले ने उनसे एक साल तक भारत भ्रमण करने और देश को समझने की सलाह दी। गांधी का देश के साथ यह पहला साक्षात्कार था। इसी बीच गांधी के जीवन में एक अल्पज्ञात व्यक्ति का आगमन होता है, वे थे, चंपारण के राज कुमार शुक्ल। 

भारत के आज़ादी के आंदोलन में गांधी जी का प्रवेश जिस आंदोलन के जरिए हुआ है, वह इतिहास में ‘चंपारण सत्याग्रह’ के नाम से विख्यात है। यह आंदोलन किसानों का था जो नील अंग्रेज जमीदारों के शोषण की व्यथा झेल रहे थे। नील की खेती और किसानों के शोषण का एक लंबा और दुःखद इतिहास है। बांग्ला के दीनबंधु मित्र के नाटक नीलदर्पण में इसे बेहद संजीदगी के साथ वर्णित किया गया है। कांग्रेस पार्टी के 1916 के लखनऊ अधिवेशन में राजकुमार शुक्ल ने कांग्रेस के शीर्षस्थ नेताओं एवं गांधीजी के सामने, चंपारण के किसानों की व्यथा रखी थी। शुरू में गांधी जी ने बहुत ध्यान नहीं दिया, पर बाद में वे चंपारण जाने के लिए राजी हो गए। अपनी आत्मकथा सत्य के साथ मेरे प्रयोग में इस घटना का रोचक विवरण है।

‘नील के धब्बों’ और ‘तीनकठिया’ जैसी शोषण की प्रथा से पीड़ित चंपारण के किसानों की बात महात्मा गांधी को सुनाई गयी। साहित्य अमृत के एक लेख के अनुसार, राजकुमार शुक्ल ने गांधीजी को जो पत्र भेजा था, उसकी प्रारंभिक पंक्तियाँ थीं, 

किस्सा सुनते हो रोज औरों के

आज मेरी भी दास्तान सुनो।

गांधी ने चंपारण जाकर, वहां के किसानों की व्यथा जानने और उनके हक में लड़ने के लिये तैयार हो गए और वे चंपारण के लिये रवाना हुए। 

15 अप्रैल 1917 को गांधी मोतीहारी पहुंचते हैं और वहां पहुंच कर उन्होंने गांव-गांव घूमना शुरू कर दिया। दक्षिण अफ़्रीका में वहां की सरकार के खिलाफ, आजमाए अपने प्रयोग, सत्य, अहिंसा, असहयोग, सत्याग्रह का यहां भी प्रयोग उन्होंने शुरू किया। चंपारण आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि जनता के मन मे आज़ाद होने की ललक पैदा हुयी और गोरे निलहे जमीदारों का भय, जनता के मन से दूर हुआ। निर्भीकता का यह भाव न केवल चंपारण के किसानों के मन मे फैला बल्कि, इसका असर दूर-दूर तक हुआ। गांधी ने, इस आंदोलन के माध्यम से किसानों, जमींदारों, मजदूरों की एक अच्छी खासी जमात को जोड़ने में सफलता हासिल की।

इस आंदोलन में न तो पुलिस की लाठियाँ, गोलियाँ चलीं और न ही किसी को लंबी जेल यातना झेलनी पड़ी। यह आंदोलन एक युगांतकारी घटना थी, जिसने एक सुषुप्त ग्रामीण समाज की प्रतिरोध शक्ति को उभार दिया। गांधी दर्शन का मूल तत्व, न तो अन्याय सहन करेंगे और न ही अन्याय करेंगे का यह एक उदाहरण था। गांधी की ईमानदारी, निष्ठा और समझदारी के प्रति आम जनमानस की पूरी आस्था और समर्पणशीलता भी इन आंदोलन में प्रतिविम्बित हुयी।

यह पूरा आंदोलन जाति, संप्रदाय, धर्म आदि दीवारों को तोड़कर समाज के गरीब, निर्बल, मजदूर, मेहनतकश, किसान, शिक्षित, निरक्षर तबकों को एक साथ लेकर आगे बढ़ा था और यह गांधी का भारत मे पहला प्रयोग था। उसके बाद तो, गांधी, स्वाधीनता संग्राम के प्रतीक बन गए ।

चम्पारण एक ऐसे इलाके में है, जिसका नाम भी शायद, गाँधीजी ने 1916 के पहले, नहीं सुना होगा। उस प्रवास के दौरान गांधी जी को वहां की जनता का को जो प्यार, श्रद्धा एवं सम्मान प्राप्त हुआ, वह वहां की भाषा भोजपुरी में आज भी विद्यमान है। अब न अंगेज़ हैं, न शोषक जमींदारी प्रथा, न नील की खेती, न डरे, दबे कुचले लोग, पर भोजपुरी के वे कर्णप्रिय गीत और धुनें ज़रूर आज भी गांधी की कीर्तिगाथा को दुहरा रही हैं। कल्पना कीजिए, तब न आवागमन के पर्याप्त साधन थे, न संचार सुविधा, पर गाँधी कहीं भी जाते थे, तो लोग जीवंत और चैतन्य हो जाते थे।

हज़ारों की संख्या में ग्रामीण उपस्थित होकर उनका जय-जयकार करते, उन्हें लगता कि उनके दुःख को दूर करने के लिये कोई अवतार धरती पर उतरा है। गाँधी जी ने अपनी चम्पारण यात्रा पर क्या कहा है, इसे उन्ही के शब्दों में पढ़िए, 

“बिहार ने ही मुझे हिन्दुस्तान में जाहिर किया। उससे पहले तो मुझे कोई जानता भी न था। पहले मैं जानता भी न था कि चम्पारण कहाँ है, लेकिन जब यहाँ आया तो मुझे ऐसा मालूम हुआ कि मैं बिहार के लोगों को सदियों से जानता था और वे भी मुझे पहचानते थे।”

चंपारण आंदोलन खत्म हुआ और गांधी जी वहां से वापस चले गए। पर जनमानस पर उनके इस आंदोलन का जो असर पड़ा, वह लोकसाहित्य और लोक गीतों में, भोजपुरी, मैथिली, मगही, अंगिका, बज्जिका आदि बोलियों के क्षेत्रों मे, सुरभित होंगे लगा औऱ उसकी सुगंध आज तक लोकसाहित्य में विद्यमान है। ऐसा बिल्कुल नहीं था कि किसानों की यह व्यथा गांधी के चंपारण सत्याग्रह के बाद ही गीतों में पिरोई गयीं थी, पर लोक ने अपने शोषण की व्यथा को, अपनी भाषा और अपनी बोली में, अत्यंत मर्मस्पर्शी भावों से अभिव्यक्त किया है।

चंपारण का क्षेत्र भोजपुरी भाषी क्षेत्र है जो अंगिका और वज्जिका के क्षेत्रों से मिला हुआ है। इन बोलियों में 1857 के बिहार के महानायकों मंगल पांडेय और वीर कुँवर सिंह की वीरता के बखान का समृद्ध इतिहास है। चंपारण सत्याग्रह ही नहीं, उसके बाद होने वाले, असहयोग आंदोलन, दांडी यात्रा और ‘नमक कानून भंग, सविनय अवज्ञा आंदोलन, भगत सिंह की कीर्तिगाथा, नेताजी सुभाष का बेहद ओजस्वी अभियान आदि महत्वपूर्ण घटनाओं की भी भोजपुरी सहित अन्य बोलियों में बहुत से गीत रचे गए हैं। इन पर एक किताब लिखी जा सकती है। एक लेख में इसे समेटना कठिन है। हम आज की पीढ़ी, उन गीतों से दूर हो रही है, यह भी एक बड़ी विडंबना है। 

चंपारण के गांव पकड़ी के एक लोककवि, शिवशरण पाठक ने चंपारण सत्याग्रह के पहले ही एक मर्मस्पर्शी स्वरचित गीत, महाराज बेतिया को सुनाया था, जिसमें निलहे शोषकों को खदेड़ने का उनसे अनुरोध, किया गया था।महाराजा बेतिया जो स्वंय एक कवि थे ने शिवशरण पाठक का यह गीत सुनकर, मर्माहत हो गये। गीत की यह पंक्तियाँ, मैं साहित्य अमृत के लेख से लेकर उद्धरित कर रहा हूँ। 

राम नाम भइल भोर गाँव लिलहा के भइले।

चँवर दहै सब धान गोंएडे लील बोअइले॥

भइ भैल आमील के राज प्रजा सब भइले दुःखी।

मिल-जुल लूटे गाँव गुमस्ता हो पटवारी सुखी॥

असामी नाँव पटवारी लिखे, गुमस्ता बतलावे।

सुजावलजी जपत करसु साहेब मारन धावे॥

थोरका जोते बहुत हेंगयावे तेपर ढेला थुरावे।

कातिक में तैयार करावे, फागुन में बोअवावे॥

इसे लील दुपता होखे, वोइसे लगावे सोहनी।

मोरहन काटत थोर दुःख पावे, दोजी के दुःख दोबरी॥

एक उपद्रव रहले-रहल दोसर उपद्रव भारी।

सभे लोग से गाड़ी चलवावे सभे चलावे गाड़ी॥

ना बाचेला ढाठा पुअरा, ना बाचेला भूसे।

जेकरा से दुःख हाल कहीला से मारेला घूसे॥

होइ कोई जगत् में धरमी, लील के खेत छोड़ावे।

बड़ा दुःख बाम्हन के भइले दूनो साँझ कोडवावे॥

सभे लोग तो कहेला जे काहे ला दुःख सहऽ।

दोसरा के दुःख नाहीं छूटे, तऽ महाराज से कहऽ॥

महाराजजी परसन होइहें छनही में दुःख छूटी।

कालीजी जब किरपा करिहे, मुँह बयरी के टूटी॥

नाम बड़ाई गावत फिरब, रह जइहें अब कीरित।

कि गाँव लीलहा से छूटे, ना त मिले बीरित॥

शिवशरण पाठक के उक्त गीत के बाद एक प्रमुख नाम आता है, रघुबीर नारायण सिंह का जिन्होंने ‘बटोहिया’ नाम से एक गीत रचा था जो पूरे पूर्वी उत्तरप्रदेश और बिहार में बहुत ही लोकप्रिय हुआ था। डॉ राजेश्वरी शांडिल्य ने अपने लेख, ‘भोजपुरी लोकगीतों में गांधी दर्शन’ में इस गीत की चर्चा करते हुए लिखा है कि, 

” इस गीत में भारत-दर्शन के साथ-साथ उसके प्रमुख व्यक्तियों, उनके सिद्धांतों और देश की नदियों, वनस्पतियों तथा पशु-पक्षियों के बारे में भी अत्यंत जीवंत वर्णन प्रस्तुत किया गया है। इस गीत को पढ़कर, गाकर और सुनकर लोगों में अपनी सुंदर मातृभूमि के प्रति न्यौछावर होने की उत्कंठा उत्पन्न हुई।”

गीत इस प्रकार है, 

सुन्दर सुभूमि भैया भारत के देसवा से मोरे प्रान बसे हिम खोह रे बटोहिया।

एक द्वार घेरे राम हिम-कोतवलवा से, तीन द्वारसिंधु घहरावे रे बटोहिया।

इसी प्रकार, एक अन्य साहित्यकार, मनोरंजन प्रसाद सिंह ने ‘फिरंगिया’ नामक एक गीत की रचना की, जो अत्यंत लोकप्रिय हुआ। इस गीत में भी उन्होंने अंग्रेज़ों के शासन-काल में भारत की बिगड़ती आर्थिक, राजनीतिक एवं धार्मिक स्थिति का उल्लेख करते हुए देशवासियों का आह्वान किया कि जैसे भी हो, देश की रक्षा के लिए अंग्रेज़ों को भगाना ही होगा। यह गीत प्रवासी भारतीयों में भी बहुत लोकप्रिय बन गया। इस गीत पर बाद में अंग्रेज़ी शासन ने प्रतिबंध लगा दिया था। राजेश्वरी शांडिल्य के लेख से यह गीत उद्धरित कर रहा हूँ, 

सुन्दर सुघर भूमि भारत के रहे रामा

आज इहे भइल मसान रे फिरंगिया,

अन्न,धन, जन, बल, बुद्धि सब नास भइल,

कौनौ के ना रहल निसान रे फिरंगिया।

देश के लूट जाने की व्यथा से भरा यह गीत उपनिवेशवाद की दारुण कथा कर रहा है। 

1932 में उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रहे, सारण, बिहार के निवासी, गोपाल शास्त्री ने असहयोग आंदोलन का अपने इलाके में नेतृत्व किया था, औऱ उन्होंने, एक ऐसा गीत लिखा, जो अपनी लोकप्रियता और ओजस्विता के कारण, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया। गीत इस प्रकार है, 

उठु उठु भारतवासी अबहु ते चेत करू,

सुतले में लुटलसि देश रे विदेशिया।

जननी – जनम भूमि जान से अधिक जानि,

जनमेले राम अरुं कृष्ण रे विदेशिया।

अब यह पंक्तियां पढ़ें, 

चलु भैया आजु सभे जन हिलिमिली,

सूतल जे भारत के भाई के जगाईं जा।

यह गीत 1969 में, बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके सरदार हरिहर सिंह द्वारा रचित गीत की पंक्तियां हैं। वे एक उच्चकोटि के साहित्यकार थे, असहयोग आंदोलन, नमक आंदोलन एवं भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भाग लिया था। 

ईस्ट इंडिया कम्पनी का उद्देश्य ही भारत की संगठित लूट करना था। निलहे किसानों का शोषण, उस संगठित लूट की एक बानगी थी। उस दौरान किसानों पर तरह तरह के 46 प्रकार के टैक्स, किसानों पर लगाए गए थे। उनका जीना दूभर हो गया था। भोजपुरी के एक गीत की इन पंक्तियों में जुल्मी टैक्स और कानूनों को रद्द करने हेतु लोकमानस की व्यग्रता पूरी तीव्रता में अभिव्यक्त हुई है—

स्वाधीनता हमनी के, नामो के रहल नाहीं।

अइसन कानून के बा जाल रे फिरंगिया॥

जुलुमी टिकस अउर कानूनवा के रद्द कइ दे।

भारत का दइ दे, सुराज रे फिरंगिया॥

एक गीत, मनोरंजन प्रसाद सिंह का पढ़े, जिंसमे, बिहार में किसानों और आम जनता की स्थिति का मार्मिक और यथार्थ चित्रण देखने को मिलता है, 

जहवां थोड़े ही दिन पहिले ही होत रहे

लाखो मन गल्ला और धान रे फिरंगिया!

उहें आज हाय रामा मथवा पर हाथ धरि

विलखि के रोवेला किसान रे फिरंगिया!

एक गीत, जेल की यंत्रणा के बारे में, 

गांधी के आइल जमाना हो, देवर जेलखाना अब गइले।

जब से तपे सरकार बहादुर, भारत मरे बिनु दाना,

हाथ हथकडि़या, गोड़वा में बेंडि़या, देसवा बनि हो गइल दिवाना

धरम राखि लेहु भारत भइया, चरखा चलावहु मस्ताना

गांधी जवाहर काम कइले मरदाना, देवर अब जेलखाना हो गइले॥

‘चरखा’ गांधीजी के स्वावलंबन के सिद्धांत का प्रतीक तो था ही, यह भी लोकगीतों में ढल गया। गांधी और चरखे के प्रति लोकमानस में जो श्रद्धा का भाव, पनप रहा था, उसे पढ़े, 

 

देखो टूटे न चरखा के तार, चरखवा चालू रहै।

गांधी महात्मा दूल्हा बने हैं, दुलहिन बनी सरकार,

सब रे वालंटियर बने बराती, नउवा बने थानेदार।

गांधी महात्मा नेग ला मचले, दहेजे में माँगैं सुराज,

ठाड़ी गवरमेंट बिनती सुनावै, जीजा गौने में देबै सुराज।

भोजपुरी कवि चंचरीक के एक ‘कजरी’ लोकगीत में भी गांधी का संदेश मानकर ‘चरखा’ के प्रति व्यक्त प्रतिबद्धता के स्वर सशक्त रूप में अभिव्यक्त हुए हैं—

सावन भदऊवा बरसतवा के दिनवा रामा

हरि हरि बैठि के चरखवा कतबै रे हरि

अपने तऽ गांधी के हुकुमवा हम मनबै रे हरि

अपने नगरिया हम तऽ करबै हो सुरजवा राम

हरि हरि देसवा के अलखवा हम जगइबे रे हरि।

एक विवाह-गीत में गांधीजी एवं अन्य नेताओं की इंग्लैंड-यात्रा को ससुराल-यात्रा बताते हुए राष्ट्रीय भावना की अभिव्यंजना की गई है—

बान्हि के खद्दर के पगरिया, गांधी ससुररिया चलले ना

गांधी बाबा दुलहा बनले, नेहरू बनले सहबलिया,

भारतवासी बनले बराती, लंदन के नगरिया ना

गांधी ससुररिया चलले ना॥

एक चना बेचनेवाले के गीत में ‘सत्याग्रह-आंदोलन’ की मनोभावना को देखा-परखा जा सकता है—

चना जोर गरम बाबू मैं लाया मजेदार चना जोर गरम।

चने को गांधीजी ने खाया

जा के डंडी नमक बनाया

सत्याग्रह संग्राम चलाया, चना जोर गरम।

‘सत्याग्रह-आंदोलन’ के क्रम में जेल गए एक सत्याग्रही के लिए उसकी धर्मपत्नी की चिंता इन पंक्तियों में द्रष्टव्य है—

सत्याग्रह के लड़ाई, सईयाँ, जेहल गईले भाई,

रजऊ कइसे होईहें ना।

ओही जेहल के कोठरिया रजऊ कइसे होईहें ना।

गोड़वा में बेडि़या, हाथ पड़ली हथकडि़या

रजऊ कइसे चलिहें ना।

गांधी जी का राजनीतिक आकार जितना विराट और व्यापक है, उससे कहीं अधिक उनकी सामाजिक भूमिका व्यापक है। दक्षिण अफ्रीका में वे सत्ता को बदलने के लिये नहीं सड़कों पर उतरे थे, बल्कि सत्ता को मानवीय और अन्याय मुक्त बनाने के लिये आंदोलन किया था। पर भारत मे वे ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिये सड़क पर उतरे। लेकिन सिर्फ यही राजनीतिक मक़सद उनका नहीं था। उनका मक़सद था, हर तरह के भेदभाव और अन्याय से जनता को जागरूक बनाना।

यह काम उन्होंने चंपारण से शुरू किया और धीरे धीरे जब वे अपने असहयोग आंदोलन की घोषणा करते हैं तो उस समय आज़ादी के आंदोलन के सबसे बड़े नेता के रूप में उभर जाते हैं। उनके पहले से स्थापित नेता, मोतीलाल नेहरू, सीआर दास, लाला लाजपत राय, एमए जिन्ना, धीरे-धीरे नैपथ्य में जाने लगते हैं और वे भारतीय जन के एकमात्र प्रवक्ता और नेता बनकर उभरते हैं।

नरेश मेहता उनका मूल्यांकन, अपने उपन्यास, :वह पथ बंधु था’ में इन शब्दों में करते हैं, “धर्म के क्षेत्र में, बुद्ध ने, साहित्य के क्षेत्र में तुलसी ने और राजनीति के क्षेत्र में गांधी ने जितना जनता को प्रभावित किया है, वैसा इतिहास में कोई अन्य उदाहरण नही मिलता है।”

 

( विजय शंकर सिंह )

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