December 4, 2021
व्यक्तित्व

वो अंग्रेज़ महिला जिसे भारतीयों ने माँ की उपाधि दी थी….

वो अंग्रेज़ महिला जिसे भारतीयों ने माँ की उपाधि दी थी….

लंदन ( Landon) में जन्मी एनी बेसेंट (Annie besent) ने हमेशा भारत को अपना घर माना। 1920 का दशक था जब एनी भारत आई थी, एनी ने भारतीय संस्कृति को खुद में आत्मसात किया था। वो यहाँ ऐसे रहा करती थी जैसे भारत से उनका पुराना नाता हो। उन्होंने दुनियाभर के धर्मों का अध्ययन करके उन्होंने जाना कि वेदों और उपनिषदों का धर्म ही सच्चा मार्ग है। एनी को भारतीयों ने “मां वसंत” और गांधी ने “वसंत देवी” की उपाधि दी थी। उन्होंने भारत को आध्यात्मिक और राजनीतिक रूप से जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई थी। आज एनी बेसेंट की पुण्यतिथि पर हम पेश कर रहें उनकी ज़िंदगी से जुड़ी कुछ अहम बातें ।

एनी को आयरिश महिला कहा जाता है:

भारतीय स्वन्त्रता संग्राम में एनी पहली ऐसी महिला थी जो अंग्रेज़ थी। लेकिन उन्होंने भारत के आज़ादी आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। एनी का जन्म 1 अक्टूबर 1847 को लंदन में हुआ था। उनकी मां आयरिश महिला थी और एनी का धर्म के प्रति खसा झुकाव था।

इसलिए एनी बेसेंट को आयरिश महिला भी कहा जाता है। उनके पिता एक विद्वान गणितज्ञ थे। 1852 में पिता की मृत्यु के बाद बचपन गरीबी और अभावों में बिता। घर में एक बड़ा भाई था, एनी की मां ने दोनों बच्चों का पालन पोषण बड़ी मुसीबतों से किया था। इसी दौरन मेरियत नाम की एक शिक्षिका ने एनी को अपने संरक्षण में लेते हुए उनकी पढ़ाई का प्रबंध किया था।

स्वतंत्र विचारों के चलते लिया था तलाक:

एनी 22 साल की थी जब उनका विवाह 1867 में एक युवा अंग्रेज़ पादरी फ्रैंक बेसेंट से कर दिया गया था। हालांकि, विवाह से एक साल पहले ही एनी को अध्यात्म के प्रति झुकाव होने लगे था। एनी रहस्यमय किताबो को पढ़ना पसंद करती थी।

एनी अपने स्वतंत्र विचार रखती थी, इसी को लेकर पति के साथ मतभेद होते रहते थे। एनी के पति फ्रैंक बेसेंट एक पादरी थे और रूढ़िगत विचारों को मानते थे। लेकिन एनी इन विचारों को स्वीकारना बिल्कुल पसंद नहीं करती थी। और इसी वजह से उन्होंने अपने पति से 1973 के आस-पास  तलाक ले लिया। इस बीच उनके दो बच्चे हुए थे, जिनमे एक लड़का और एक लड़की थी।

धर्म विरुद्ध लेख लिखने पर चला था मुकदमा:

वेबदुनिया के एक लेख के मुताबिक, एनी स्वतंत्र विचारों को मानने के साथ-साथ समाज सुधार पर भी ध्यान केंद्रित करती थी। अपनी शादी से लेकर तलाक के बीच पति से वैचारिक मतभेद होते ही रहते थे। इसी समय एनी ने एक लेख लिखा था। लेख का नाम “फूट्स ऑफ फिलॉसफी” था। इस लेख में एनी ने ” बर्थ कंट्रोल” की बात की थी। यानी परिवार परिसीमन की।

उस समय धार्मिक लिहाज से ये गुनाह के समान था। धर्म विरुद्ध लेख लिखने पर एनी पर मुकदमा भी चलाया गया। यही एक कारण था कि पति फ्रैंक के लिए एनी के खुले विचार विद्रोह समान थे। मुकदमे की सुनवाई में एनी के तर्कों से न्यायधीश सहमत थे लेकिन जूरी के विचार जज से मेल नहीं खाते थे। एनी को इसके लिए माफ़ी तो मिल गयी, लेकिन माफ़ी की एवज़ में एनी को सिर्फ बेटी की कस्टडी मिली थी।

थियोसोफिस्ट विचारों से हुई थी प्रभावित:

एनी एक ब्रटिश समाजवादी, थियोसोफिस्ट, महिला अधिकार कार्यकता, लेखक, वक्त और शिक्षाविद थी। लेखक के रूप में उन्होंने 300 से अधिक पुस्तकें लिखी थी, वहीं शिक्षाविद के तौर पर भारत का बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापकों में उनका नाम गिना जाता है।

1888 में उनकी मुलाकात समाज को उन्नत करने की प्रेरणा रखने वाली श्रीमती स्टेड से हुई। इन्ही की बदौलत एनी का रुझान “थियोसोफी” की तरफ बढ़ा। स्टेड ने ही एनी को थियोसोफिस्ट मादाम ब्लावाटस्की की पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। एनी मादाम से काफ़ी प्रभावित हुई और 1889 में उनसे मिलकर थियोसोफिस्ट के उद्देश्यों को जाना। इसके बाद एनी उसी साल ” थियोसोफिस्ट सोसायटी” से जुड़ गयीं और 1907 में इसी सोसायटी की अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष भी चुनी गईं।

एनी का भारत की ओर रुख:

16 नवम्बर 1893 को एनी ने भारत में कदम रखा, वो पहली बार भारत के तूतीकोरिन बंदरगाह पर आई थी। दिसम्बर महीने में ही उन्होंने “थियोसोफिकल सोसायटी” में “दी बिल्डिंग ऑफ कस्मास” पर भाषण दिया। इसके बाद भारत भ्रमण पर निकल गयी। कहतें है वो भारत की ओर आकर्षित हुई थी, और तब से ही उन्हें लगा कि उनकी कर्मभूमि भारत है। 1894 में कांग्रेस की सदस्यता लेने के बाद उन्होंने इंडियन नेशनल कांग्रेस में अपना पहला भाषण दिया था। उन्होंने दुनियाभर के धर्मो का अध्ययन किया था, साथ ही धर्म पर ही उनकी एक किताब “सेवन ग्रेट रिलिजेन्स” छपी थी।

“सेंट्रल हिन्दू कॉलेज” की स्थापना:

1895 का समय था, जब वो एनी वाराणसी गयी। यहां उन्होंने न केवल संस्कृत सीखी बल्कि गीता का अनुवाद भी किया। यहीं उनकी किताब ” चार माह धर्म” 1897 में प्रकाशित हुई थी। इसके बाद 1898 “सेंट्रल हिन्दू कॉलेज” की स्थापना वाराणसी में कई गयी। इसमें एनी की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इसके बाद ‘ब्रदर्स ऑफ इण्डिया’ की स्थापना। “समाज सुधार के लिए ” ब्रदर्स ऑफ सर्विस” की स्थापना, “यंग मैन्स इंडिया लीग” और ” संस् ऑफ इंडिया” की स्थापना की थी। इसके अलावा ‘वेक अप इण्डिया’ नाम की पुस्तक भी प्रकाशित हई थी।

भारतीय राजनीति में प्रवेश:

1913 मव एनी ने भारतीय राजनीति में प्रवेश किया था। बम्बई में कोंग्रेस नेताओ की एक बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें एनी ने होमरूल आंदोलन करने का ज़िक्र किया। हालांकि, कांग्रेस इसके लिए राजी नहीं थी। इसके बाद एनी ने इसका बेड़ा खुद उठाया और 1916 में “होमरूल लीग” की स्थापना की और होमरूल आंदोलन शुरू कर दिया। 1917 में एनी को उनके के दो साथियों के साथ “न्यू इंडिया” समाचार पत्र की जमानत जब्त करते हुए नज़रबंद कर दिया गया था।

एनी ने किया था गांधी का विरोध:

Webdunia के हवाले से 1920 में गांधी का सत्यग्रह शुरू हो रहा था। ये वो वक्त था जब महात्मा गांधी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिल रही थी। लेकिन एनी उनके सत्यग्रह के समर्थन में भी थी और इसके खिलाफ भी थी। दरअसल , गांधी का ये सत्यग्रह दो स्तरों पर किया जाना था। एक व्यक्तिगत स्तर पर और दूसरा सामूहिक स्तर पर।

गांधी जी और एनी बेसेंट

एनी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह को तो स्वीकारा, मगर सामुहिक सत्याग्रह का विरोध किया, उनका कहना था कि यह सत्याग्रह को तोड़ने वाला है। ये हिंसा भड़का सकता है और इससे आंदोलन का संचालन नेताओ के हाथों से निकल सकता है। भारत की आज़ादी के बाद ये कष्टदायक हो सकता है।

40 सालों तक एनी बेसेंट ने भारत को आध्यात्मिक और राजनीतिक रूप से जागृत तो किया है, ,वहीं स्वतंत्रता आंदोलन में भी योगदान दिया। वो पहली अंग्रेज़ महिला थी जो भारत के लिए अंग्रेज़ो के खिलाफ थी। 24 दिसम्बर 1931 में डालना अंतिम भाषण उन्होंने चेन्नई में दिया था। 20 सितंबर 1933 को चेन्नई के अड्यार में, 86 की उम्र में आखिरी सांस ली।

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Sushma Tomar