व्यक्तित्व

उत्तर प्रदेश के चर्चित मुख़्तार अंसारी परिवार से जुड़े कुछ अनछुए और दिलचस्प पहलू।

उत्तर प्रदेश के चर्चित मुख़्तार अंसारी परिवार से जुड़े कुछ अनछुए और दिलचस्प पहलू।

मुख़्तार अंसारी की छवि भले ही एक बाहुबली की हो, लेकिन कम लोग ही जानते होंगे कि वर्तमान समय में देश में शायद ही कोई ऐसा जीवित व्यक्ति होगा, जिसके सगे दादा व नाना ने देश के लिए इतनी सेवाएं दी होंगी, जितना कि मुख़्तार के दादा व नाना ने दी हैं। मुख़्तार अंसारी के दादा डॉ॰ मुख्तार अहमद अंसारी, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग के अध्यक्ष थे। वे जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के संस्थापकों में से एक थे और 1928 से 1936 तक वे इसके कुलाधिपति भी रहे। उन्होंने मद्रास मेडिकल कॉलेज से चिकित्सा की डिग्री प्राप्त की और छात्रवृत्ति पर अध्ययन के लिए इंग्लैंड चले गए और वहां एम.डी. और एम.एस. की उपाधियाँ हासिल की। उन्होंने लंदन में लॉक हॉस्पिटल और चैरिंग क्रॉस हॉस्पिटल में में काम भी किया और आज भी चैरिंग क्रॉस हॉस्पिटल में उनके कार्य के सम्मान में एक अंसारी वार्ड मौजूद है। वे देश के उच्च कोटि के सर्जन थे, डॉ॰ अंसारी 1927 के सत्र के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। डॉ॰ अंसारी महात्मा गांधी के बहुत करीब थे और भारतीय मुस्लिम राष्ट्रवादियों के ऐसे पुरोधा थे जिन्होंने जिन्ना के इस दृष्टकोण का विरोध किया था कि केवल मुस्लिम लीग ही भारत के मुस्लिम समुदायों की प्रतिनिधि हो सकती है। उनके निधन पर उन्हें दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया के परिसर में ही दफनाया गया। मुख़्तार अंसारी के नाना महावीर चक्र से सम्मानित ब्रिगेडियर उस्मान थे, जिन्हें को नौशेरा का शेर कहा जाता है, जो भारत और पाकिस्तान के प्रथम युद्ध में शहीद हो गए थे। वह भारतीय सेना के सर्वाधिक प्रतिष्ठित और साहसी सैनिकों में से एक थे, जिन्होंने जम्मू में नौशेरा के समीप झांगर में मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राण गंवा दिए थे। वह भारतीय सैन्य अधिकारियों के उस शुरुआती बैच में शामिल थे, जिनका प्रशिक्षण ब्रिटेन में हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध में अपने नेतृत्व के लिए प्रशंसा पाने वाले ब्रिगेडियर उस्मान उस 50 पैरा ब्रिगेड के कमांडर थे, जिसने नौशेरा में जीत हासिल की। यह उल्लेखनीय है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उनकी कैबिनेट के सहयोगी जुलाई 1948 में उनकी राजकीय अंत्येष्टि में शामिल हुए। यह वह सम्मान है जो इसके बाद किसी भारतीय फौजी को नहीं मिला। पाकिस्तानी नेताओं मोहम्मद अली जिन्ना और लियाकत अली खान ने इस्लाम और मुसलमान होने की दुहाई देकर, ब्रिगेडियर उस्मान को पाकिस्तानी सेना का चीफ बनाने तक का लालच दिया, बावजूद इसके वतनपरस्त उस्मान ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और बाद में पाकिस्तान के खिलाफ़ ही लड़ते हुए देश के लिए कु़र्बान हो गए। देश के उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी भी मुख़्तार अंसारी के सगे रिश्तेदार हैं।

Avatar
About Author

Team TH

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *