किसान कर्जमाफी और रोज़गार की मांग अगर चिढ़ाने के लिए भी की जा रही हो तो भी इसका स्वागत किया जाना चाहिये। जब से पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव सम्पन्न हुये हैं और भाजपा की पराजय हुयी है तब से सोशल मीडिया में एक परिवर्तन देखने को मिल रहा है। हिंदुत्व खतरे में हैं, और मंदिर वही बनाएंगे, पाकिस्तान चले जाओ आदि आदि उत्तेजनात्मक बातें करने वाला युवा वर्ग या लोग, किसानो की कर्ज़ माफी और बेरोजगारों के लिए रोज़गार की बात करने लगे हैं। इसका कारण है कि कांग्रेस ने किसानों की कर्ज़ माफी का वादा और लोगों को नौकरी देने की भी बात हाल ही में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में प्रचार के दौरान की है। कर्जमाफी और रोजगार के मुद्दों के अतिरिक्त लोगों को जीएसटी की जटिलता, और अन्य जनोपयोगी मुद्दे भी उठाने चाहिये।

लोगों को राजनैतिक दलों के घोषणापत्र का पुनः अध्ययन और पुनि पुनि पारायण करना चाहिये जिससे सत्ता के गंड स्थल पर निरंतर  अंकुश का प्रहार कर के उसे नियंत्रित रखा जाय। सत्ता हांथी की तरह होती है। महावत के अंकुश के अभाव में वह अनियंत्रित और लापरवाह हो जाती है। उसका विशाल आकार उसे उच्छृंखल बनाने की संभावनाएं की ओर ठेलता रहता है। जनता को एक कुशल महावत की तरह सचेत हो, अंकुश के रूप में प्राप्त जागरूकता के हथियारों का प्रयोग निरन्तर करते रहना चाहिये। राजनीतिक दलों को यह एहसास दिलाते रहना बहुत आवश्यक है कि भविष्य में चुनावी घोषणापत्र जारी करते समय यह सदैव यह बात गांठ बांध लें कि जो वे कह रहे हैं उन्हें पूरा करना उनकी जिम्मेदारी है अगर वे पूरा न कर सकें तो ऐसे आश्वासन बिल्कुल न दें।

हो सकता है लोगों को यह भी लगता हो कि नयी सरकारें इन जनोपयोगी मुद्दों के प्रति सचमुच में गंभीर हैं इसलिए लोग उससे यह अपेक्षा करने लगे हों। क्योंकि पिछले पांच सालों में लोगों ने एनडीए सरकार से केवल उन्ही मुद्दों पर जवाब तलब किया जो भाजपा और संघ परिवार का एजेंडा है। जैसे मंदिर, संविधान की धारा 370 की समाप्ति, समान नागरिक संहिता, गौहत्या पर प्रतिबंध पर कभी भी रोज़गार, शिक्षा, किसान समस्या, मज़दूरों की बात, विकास के अन्य मुद्दे, आदि आदि पर सरकार से कोई जवाबतलबी नहीं की गयी। हो सकता है लोगों को लगा हो भाजपा सरकार कर्ज़ माफी और रोज़गार के नुद्दो पर गम्भीर ही न हों। किसान कर्ज माफी को तो इस सरकार ने बेशर्मी से वाहियात मुद्दा कह कर इस मुद्दे से अपना पल्ला ही झाड़ लिया था, जबकि अपने चहेते पूंजीपतियों के अरबों रुपये एनपीए के नाम पर माफ कर दिए गए। या यह भी हो सकता है वे हार की कुंठा से कर्ज माफी और रोज़गार के मुद्दे कांग्रेस सरकार और उसके समर्थकों को चिढ़ाने के लिए उठा रहे हों। अगर ये मुद्दे चिढ़ाने के लिए भी उठाये जा रहे हों तो कांग्रेस को बिना चिढ़े इन्हें गम्भीरता से लेना चाहिये क्योंकि यह उसकी जिम्मेदारी है।

चुनाव लोकतंत्र में सरकार चुनने की एक संवैधानिक प्रक्रिया है । यह भले ही लड़ा जाता हो, पर यह कोई युद्ध नहीं है। चुनाव को युद्धों के प्रतीक से देखने की एक परम्परा सभी चुनावी गणतंत्र में सामान्य बात है। चुनाव लड़ना, हरा देना, जीत जाना, ध्वस्त कर देना, ज़मीन सुंघा देना, धूल चटा देना आदि आदि मुहावरे हमारे अवचेतन में व्याप्त हिंसक और युयुत्सु भाव को ही दिखाते हैं। पर चुनाव न युद्ध है और न ही यह उन व्यक्तिगत क्षमता, शौर्य और वीरता से जीता या इनके अभाव में हारा जाता है। यहाँ जिताने और हराने की क्षमता जनता में होती हैं जिसके सामने तमाम ताकतों, बाहुबल, धनबल, जातिबल के बावजूद चुनाव लड़ने वाला विनम्रता की चादर ओढ़े, शराफत और कर्तव्यनिष्ठा की बेहतरीन अदाकारी के साथ वह सब करने को तत्पर रहता है जो अगर चुनाव न हो तो उसे करने की कभी वह सोचे भी नहीं। जबकि युद्ध मे यही अदाकारी, विनम्रता और शराफत उसे कहीं का नहीं रहने देगी।

चुनाव और युद्ध मे एक और मौलिक अंतर होता है । वह है, युद्ध का उद्देश्य, राज्य विस्तार, संपदा की लूट, धर्म का प्रसार या दम्भ का तुष्टिकरण आदि आदि होता है। पर चुनाव में इसका उद्देश्य एक ऐसी सरकार का गठन जो जनहित में जनता के लिये, जनता की इच्छा और अपेक्षानुसार राज्य का प्रबन्धन करे, करना है । लोगों में शान्ति बनी रहे और लोग भयमुक्त होकर समृद्धि के पथ पर बढ़ते रहें यह सरकार का उद्देश्य है। पर युद्ध का उद्देश्य है, भय, अराजकता का प्रसार ताकि शत्रु पराजित हो या तो आत्मसमर्पण करे या मारा जाय। युद्ध में आक्रांता पराजित, लूट और बरबाद कर के वापस लौट सकता है क्योंकि उसके लिये, जहां उसने आक्रमण किया है  वह शत्रु क्षेत्र है, पर चुनाव में वह अपने घर मे होता है न कि शत्रु क्षेत्र में। चुनाव कुछ वादों, उम्मीदों और कुछ सपनों पर लड़ा जाता है पर युद्ध सभी वादों, उम्मीदों और सपनों को धराशायी कर देता है। चुनाव में कोई विपक्षी नही रहता है, बल्कि सभी जनमुखापेक्षी होते हैं, याचक होते हैं। युध्द में जनता गौण और सेना महत्वपूर्ण हो जाती है। क्योंकि सैन्यबल के अभाव में युद्ध जीता ही नहीं जा सकता है। पर चुनाव में जनता  सर्वोपरि है। वही एक समूह के साथ आकर जिताती और हराती है। युद्धों में योद्धा के लिये यह आवश्यक है कि अपराजेय भाव से रहे। क्योंकि अपराजेयता का यह भाव युद्धरत का मनोबल बढ़ाता है और मनोबल के अभाव में युद्ध जीते भी नहीं जा सकते हैं। मसल मशहूर है कि, युद्ध मे हथियार ही महत्वपूर्ण नहीं होता है, बल्कि हथियार के पीछे उसे लेकर खड़ा सैनिक कितनी मजबूती से खड़ा है, यह महत्वपूर्ण होता है।

लेकिन चुनाव के मैदान में, ( यह मैदान शब्द भी इसी युयुत्सु भाव से उपजा है ) अपराजेयता, दंभ को प्रदर्शित करती है और नेता का दंभ जनता को कभी पसंद नहीं आता है। क्योंकि जनता यह जानती है कि जीत और हार जनता की सामुहिक सोच और ताकत पर निर्भर है। अपार धन और बाहुबल रखने वाले लोग भी चुनावों में पराजित हुये हैं और साधनविहीन लोग भी केवल अपनी जनप्रियता के कारण विजयी हुये हैं। राजनेताओं को इस अपराजेयता के दम्भ से मुक्त रहना चाहिये। जब वह समझ लेता है कि वह अब कभी भी किसी भी परिस्थिति में पराजित नही किया जा सकता है, तभी उसके पतन की पटकथा शुरू हो जाती है।

दुनियाभर के लोकतांत्रिक चुनावों का इतिहास खँगालिये तो इस सच से आप रूबरू होंगे। हाल के भारत के इतिहास में इंदिरा गांधी ने जब खुद को अपराजेय समझना शुरू किया तो उनका यह दंभ टूटा और अब जब मोदी शाह की जोड़ी ने पचास साल तक राज करने और अपराजेयता की दर्पोक्ति की तो उनका भी यह घमंड टूटा। जनता भले ही ऐसा दिखती हो कि वह नेता पर लहालोट है, दीवानी है पर जब पोलिंग बूथ पर उंगली में लगी स्याही विजयी मुस्कान के साथ कैमरे या सेल्फी मोड में सोशल मीडिया में वही जनता फ़्लैश करती है तो वह संकेत वोटों की गिनती तक अबूझ बना रहता है। जनता जनार्दन है और जनार्दन ने आसुरी दंभ का सदैव मानमर्दन किया है। इसीलिए आवाज़ ए ख़ल्क़ को नक्कारा ए खुदा कहा गया है।

जनता अब जागरूक है। पहले महँगी गाड़ियों के काफिले, नारे लगाते बेरोजगार युवाओं की फौज, खोखली मुस्कान चिपकाए चेहरे, और विनम्रता की कबा ओढ़े लोग जो कभी आकर्षित करते थे अब कभी कभी जुगुप्सा भी जगाते हैं। चुनाव दर चुनाव उनका निकम्मापन खुद ही उनकी पोल खोलने को आतुर हो जाता है। ऊपर से नामुराद यह सोशल मीडिया कुछ भूलने भी तो नहीं देता है। सारे दृश्य श्रव्य हथेली में समेटे यह समानांतर मीडिया एक क्लिक पर सारे भूत और वर्तमान के लेखे जोखे उगल देता है। वह सब भी दिखा और बता देता है जो आप न देखना चाहते हैं और न सुनना। जब अतीत और वर्तमान दृश्य हो तो भविष्य का अनुमान तो लग ही जाता है।

अगर राजनेता जनता की इस नब्ज़ को नहीं समझेंगे तो वे अपराजेय रहने की बात तो छोड़ ही दें, चुनाव में खड़े होने की भी हैसियत में नहीं रहेंगे।  सार्वजनिक जीवन की अपनी बंदिशें और अपने खतरे भी होते हैं। राम तक इस खतरे को भुगत चुके हैं। सीता का परित्याग लोक जीवन की लांछना का ही परिणाम था। राजनेताओं को यह मर्म समझ लेना चाहिये कि जनता को उनकी शर्तों पर भरमाया तो जा सकता है पर बराबर चलाया नहीं जा सकता है। और भ्रम और अब्र कितने भी घने हों, एक न एक दिन छंटते ही हैं।

( विजय शंकर सिंह )