देश के 5 राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव का शोर आख़िर थम गया जिसमें से 3 राज्य ( राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ ) में कांग्रेस की वापसी हुई और भाजपा की हार हुई है। इन तीनों राज्यों में कांग्रेस सरकार बना लेगी और दो राज्य मिज़ोरम में मिज़ोरम नेशनल फ्रंट व तेलंगाना में तेलंगाना राष्ट्र समिति ने दो तिहाई बहुमत हासिल किया।

मैं यहां बात करूंगा तेलंगाना विधान सभा की जिसमें 119 विधानसभा सीट में 88 सीट जीत कर तेलंगाना राष्ट्रीय समिति ने एक तरह से इतिहास रच दिया है। ज्ञात रहे कि तेलंगाना पहले आंध्र प्रदेश का हिस्सा था जिसको अलग राज्य बनाने की मांग बहुत पहले से उठने लगी थी और इसी संघर्ष का नतीजा था के 2 जून 2014 को यह राज्य भारत का हिस्सा बना जिसके पहले मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव बनें।

तेलंगाना में कुल 31 ज़िला है, 2014 के विधानसभा चुनावों में इस पार्टी ने 119 में 110 सीटों पर पर अपने प्रत्याशी खड़े किए ओर 63 सीटें जीती थीं, वहीं इस बार पार्टी 105 सीटों पर चुनाव लड़ी ओर 88 सीटें जीतने में सफ़ल हुई जिसका मतलब लगभग 70% सीटें अकेले इस पार्टी ने जीती। ज्ञात रहे कि इस बार तेलंगाना में असदउद्दीन ओवैसी साहब की मजलिस इत्तेहाद उल मुस्लिमीन ओर तेलंगाना राष्ट्रीय समिति ने एक साथ मिल कर चुनाव लड़ा जबकि भाजपा और कांग्रेस ने इसे हराने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने अपने कई रैलियों में मुसलमानों के विरूद्ध सख़्त बातें कही और कांग्रेस ने भी टीआरएस को सांप्रदायिक पार्टी घोषित कर दिया। जिसका उन्हें कोई फ़ायदा नहीं हुआ ओर दोनों पार्टियों की दुर्गति हुई।

इस जीत के कई मायने हैं, मैं बिंदुवार सब पर बात करूंगा। सबसे पहले बात करते हैं मजलिस के अध्यक्ष जनाब असदउद्दीन ओवैसी साहब की, उन्होंने टीआरएस को चुनाव पूर्व ही अपना समर्थन दे के मास्टर स्ट्रोक मार दिया था। एक तीर से कई निशाना लगा कर उन्हों ने यह साबित कर दिया के वह भी राजनिति के चाणक्य है। भले से लोग उनको तेलंगाना तक ही सीमित मानें, उन्होंने बड़ी चालाकी के साथ कांग्रेस ओर भाजपा के सभी चालों को नाकाम बना कर उनका सूपड़ा साफ कर दिया।

आपको बता दें कि वहां कांग्रेस ने टीडीपी के साथ गठबंधन कर के चुनाव लड़ा था ,जिसका परिणाम यह हुआ के वहां कांग्रेस के कई बड़े दिग्गज नेताओं को हार का मुंह देखना पड़ा।

असद साहब को पता था कि वह ना तो कांग्रेस के साथ जा सकते हैं और ना ही टीडीपी और ना ही भाजपा के साथ। इसलिए उन्होनें आरंभ से ही टीआरएस के साथ दोस्ताना संबंध बना कर रखा और इस दोस्ताना को आप चुनावी समर में स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। मजलिस और टीआरएस ने बखूबी अपना-अपना वोट बैंक एक दूसरे को ट्रांसफ़र किया जिसका नतीजा हम सबके सामने है।

अगर आप मजलिस द्वारा 8 में से 7 सीटों पर जीत का परचम लहराने की वजह मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण मान रहे हैं तो मैं बता देना ज़रूरी समझता हूं कि मजलिस और उनके सदर ने अल्पसंख्यकों के सशक्तीकरण के लिए कई तरह के काम किये हैं। जैसे असदउद्दीन ओवैसी साहब के कई स्कूल ओर कॉलेज चलते हैं, जहां अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चे बहुत ही कम फ़ीस पर शिक्षा हासिल करते हैं। महिलाओं के उद्धार के लिए उन्हों ने कई सारी सेंटर खोले हुए हैं, जहां से महिलाएं हुनर सीख कर अपने पैर पर खड़ी होना सीख रही हैं।

असदउद्दीन ओवैसी साहब एक उच्च शिक्षा ग्रहण किए हुए राजनेता है,लंदन से उन्हों ने बैरिस्टरी की डिग्री हासिल की है।  सदन में हर मुद्दे पर खुल कर ओर पूरे डेटा के साथ अपनी बात रखते हैं, उन्हें संसद रत्न से सम्मानित किया जा चुका है, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। देश में अल्पसंख्यकों की एक मुखर आवाज़ हैं।

अब बात करते हैं के तेलंगाना में मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव को जनता ने भारी बहुमत से कैसे जिताया। इसके पीछे वजह कई हैं, सबसे पहले केसीआर जी के व्यक्तित्व पर बात की जाए तो वह एक साफ़ व्यक्तित्व, ईमानदार और कर्मठ नेता के रूप में जाने जाते हैं, जिसने अपने राज्य की जनता के उद्धार के लिए कई सारे काम किए हैं, जिसका हम विस्तार से चर्चा करेंगे:

  1. शिक्षा, इस क्षेत्र में यहां की सरकार बहुत अधिक ध्यान देती है, ख़ास तौर से अल्पसंख्यकों के लिए कई सारी स्कीमें हैं, 2100 करोड़ रुपए का बजट सिर्फ़ अल्पसंख्यकों के लिए है। 900 वैसे अल्पसंख्यक छात्र जो विदेश में पढ़ते हैं उनका सारा ख़र्च सरकार ख़ुद उठाती है, इसी तरह एससी एसटी छात्रों के लिए 104 और अल्पसंख्यक छात्रों के लिए 206 स्कूल व डिग्री कॉलेज बनाए हैं।
  2. आसरा स्कीम – इस स्कीम में गरीब बेवाओं, कलाकारों, बुनकरों, एड्स से पीड़ित मरीजों और बीड़ी बनाने वाले मजदूरों को प्रति व्यक्ति 1000 रुपया और विकलांगों के लिए 1500 रुपया महीना दिया जाता है, इस स्कीम से 39 लाख 21 हज़ार 27 लोग फ़ायदा उठा रहे हैं।
  3. इसी तरह एक तेलगु त्योहार परएक ग़रीब महिला को एक साड़ी मुफ़्त दी जाती है, इस से एक साल में 1 करोड़ महिलाओं ने फ़ायदा उठाया।
  4. इसके इलावा खेती के लिए प्रति एकड़ 8000 रुपए सालाना दिया जाता है, इससे 50 लाख किसानों ने फ़ायदा उठाया, इस पर 12000 करोड़ रुपए ख़र्च हुए।
  5. मछली पालन के लिए 50 सीसी की बाइक और पिक अप की सुविधा, इस से 3 लाख लोगों ने फ़ायदा उठाया।
  6. मक्खीऔर मच्छर के काटने से एक ख़ास बीमारी (Filaria) से बीमार हो जाने वाले को 1000 रुपया दिया, जिस से 13 हज़ार मरीजों को फ़ायदा मिला।
  7. शादी मुबारक ओर कल्याण लक्ष्मी – इस स्कीम से शादी ओर निकाह के लिए प्रति बालिका 1 लाख 116 रुपए दिए जाते हैं जिस से अब तक 40 लाख 1 हज़ार 899 बालिकाओं को लाभ मिल चुका है।
  8. 10 एकड़ ज़मीन में 10 करोड़ की लागत से एक कम्युनिटी भवन का निर्माण किया गया है जहां हर समुदाय के लोग अपने अपनेत्योहार मना सकें।
  9. मस्जिद के मूअज़ज़िन, इमाम, मंदिर के पुजारियों का वज़ीफा मुकर्रर किया गया, इस से 17000 इमाम और पुजारी लाभ ले रहे हैं।
  10. हेरिटेज इमारत के संजोने ओर उसे सजाने संवारने में सरकार अहम योगदान करती है।
  11. ऐसे 25000 नाई जनको अपनी दुकान स्टैंडर्ड तरीक़े से बनाने के लिए 1 से 2 लाख रुपए की मदद दी गई।
  12. रमज़ान ओर क्रिसमस के दौरान साढ़े चार लाख लोगों को मुफ़्त कपड़े दिए गए।

इसके अलावा दर्जनों स्कीमें हैं जो जनता की उन्नति के लिए राज्य स्तर पर चलाई जा रही हैं, जिसकी जितनी तारीफ़ की जाए कम है। देश में ऐसी स्कीमें शायद ही किसी और राज्य में देखने को मिले, जहां समान रूप से हर वर्ग के लिए काम किया जाता है, यही वजह है के जनता ने दोबारा मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव पर भरोसा किया है। इस बात को भी नहीं भूलना चाहिए के अल्पसंख्यकों के लिए जितनी स्कीमें हैं उस के लिए कहीं ना कहीं मजलिस पार्टी के अध्यक्ष असदउद्दीन ओर उनके भाई अकबरउद्दीन उवैसी तारीफ़ के पात्र हैं। क्यूंकि मुख्यमंत्री केसीआर ने ख़ुद कई जगह पर इस बात की पुष्टि की है कि मजलिस और अकबरूद्दीन ओवैसी के तत्परता के कारण ही अल्पसंख्यक समाज की बेहतरी के लिए इतनी स्कीमें लाने में सरकार कामयाब रही है।

फिलहाल मजलिस पार्टी के मुखिया जनाब असदुद्दीन ओवैसी साहब राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बने हुए हैं, और आगे लोकसभा चुनावों में उनकी एक ख़ास भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है। बिहार के सीमांचल को स्पेशल स्टेट का दर्जा दिलाने के लिए वह हर संभव प्रयास कर रहे हैं, जिससे उस उम्मीद को बल मिलता है कि वहां से अगले लोकसभा चुनाव में मजलिस अपना खाता खोल सकती है?