बनारस में एक अनोखा विश्वविद्यालय है संस्कृत विश्वविद्यालय। ब्रिटिश राज में पहले यह एक स्कूल बना जिसे क्वीन्स कॉलेज कहा गया। इंटर तक की पढ़ाई होती थी। अब क्वीन्स कॉलेज लहुराबीर चौराहे पर है। यह वाराणसी का गवर्नमेंट इंटर कॉलेज है।  उसके बाद संस्कृत विश्वविद्यालय वाला, इंटर कॉलेज बाद में गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज बना दिया गया । तँत्र विज्ञान के महान साधक और विद्वान महामहोपाध्याय पंडित गोपीनाथ कविराज इसके प्रिंसिपल थे। हिंदी के प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार डॉ विद्यानिवास मिश्र भी बहुत बाद में  इस विश्वविद्यालय के कुलपति रह चुके हैं।

बाद में जब डॉ संपूर्णानंद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने इस कॉलेज को एक संस्कृत विश्वविद्यालय में बदल दिया आए इसका नाम रखा, वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय। डॉ संपूर्णानंद एक प्रतिभाशाली और बहुमुखी प्रतिभा के राजनेता थे। उदार और प्रगतिशील विचारों के डॉ संपूर्णानंद ने कई किताबें लिखी हैं। उनका उद्देश्य, प्राचीन भारतीय संस्कृति, और संस्कृत साहित्य के परंपरागत अध्ययन को विकसित करना था। वे खुद भी प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति के विद्वान थे।

सरकार ने बाद में इस विश्वविद्यालय का नाम उनकी स्मृति में बदल कर डॉ संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय कर दिया गया। डॉ सम्पूर्णानंद की स्मृति को अक्षुण रखने का यह एक उचित कदम था। उनकी स्मृति में,  विश्वविद्यालय के सामने ही उनकी एक प्रतिमा की स्थापना की भी गयी, जिसका अनावनारण बाबू जगजीवन राम ने किया था। जगजीवन राम तब केंद्रीय मंत्री थे।

इस विश्वविद्यालय में वेद, पुराण, उपनिषद, दर्शन, कर्मकांड, आयुर्वेद आदि प्राचीन वांग्मय से जुड़े विषयो की परंपरागत रूप से शिक्षा दी जाती है।  पाली, प्राकृत, भाषा विज्ञान आदि कुछ विषय भी पढ़ाये जाते हैं। विदेशी भाषा विभाग भी है। पर शिक्षा का स्वरूप भारतीय परंपरा के अनुसार ही रहता है। इसका पुस्तकालय बहुत समृद्ध है। पांडुलिपि पुस्तकालय भी एक है। मुख्य भवन गॉथिक स्थापत्य का एक अनुपम उदाहरण है। मैं जब पढता था तो इस विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में बहुत जाता था। मेरा घर इस विश्वविद्यालय के पास ही है।

एक असहज करने वाला प्रसंग भी इस विश्वविद्यालय से जुड़ा है। जब बाबू जगजीवन राम ने डॉ संपूर्णानंद की प्रतिमा का अनावरण किया तो बाद में इसी विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने जिसमे सवर्ण छात्र अधिक थे ने जगजीवन राम द्वारा डॉ संपूर्णानंद की मूर्ति स्थापना के विरोध में उसे गंगाजल से धोकर शुद्ध करने का नाटक किया था। इस कृत्य की बड़ी आलोचना भी हुयी थी। विश्वविद्यालय प्रशासन ने उन छात्रों के खिलाफ संभवतः कोई कार्यवाही भी की थी।

अब इससे जुड़ी जब मैंने यह खबर पढ़ी कि छात्र संघ के चुनाव में विद्यार्थी परिषद एबीवीपी सभी स्थानों पर चुनाव हार गयी तो इस विश्वविद्यालय से जुड़ी यह सब बातें याद आयी जिन्हें मैं आप सबसे साझा कर रहा हूँ। क्या विद्यार्थी परिषद का सभी सीटे हारना किसी परिवर्तन का कोई संकेत है ? इसका उत्तर तो बनारस के मित्र ही दे सकेंगे। बीएचयू में संस्कृत के असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर नियुक्त फिरोज़ खान के अपना पदभार ग्रहण न करने के विरोध के पीछे जो संगठन मुख्य रूप से सक्रिय था, वह एबीवीपी ही था। इस आलोक में भी इस चुनाव परिणाम को देखा जाना चाहिए।

© विजय शंकर सिंह