विचार स्तम्भ

आखिर संघ परिवार में चल क्या रहा है ?

आखिर संघ परिवार में चल क्या रहा है ?

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के कथनों का क्या मतलब है, यह मुझे नहीं मालूम। बहुत लोगों को मालूम नहीं होगा। खुद संघियों को भी नहीं मालूम होगा कि भागवत की बातों का मतलब क्या है? क्या वह सरकार से नाराजगी जाहिर कर रहे हैं? क्या वह कांग्रेस पर डोरे डाल रहे हैं? क्या मुसलमानों को रिझाने की कोशिश कर रहे हैं? संघ बदल रहा है, इसके संकेत दे रहे हैं।
क्या सत्ता परिर्वतन की सूरत में अपने बचाव की भूमिका बना रहे हैं? सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या संघ ने उन लोगों से महाभारत करने का मन बना लिया है, जो देश की लंका लगाने पर आमादा हैं? उनकी बातों के कई मतलब निकाले जा सकते हैं।
लेकिन एक बात तय है कि हस्तिनापुर की हवाएं कुछ इशारा कर रही हैं। महाभारत होने से इंकार नहीं किया जा सकता। महाभारत एक ही परिवार के बीच हुआ था। इसलिए यह नहीं समझना चाहिए कि महाभारत दूसरों के साथ होगा। अब यह तय करना बाकी है कि कौन कौरव होगा और कौन पांडव? बिसात तो बिछ चुकी है। पासे भी फेंके जाएंगे। मोहन भागवत धृतराष्ट्र की भूमिका नहीं निभाना चाहता। उसे मालूम होगा कि हवा का रुख क्या है?
दुनिया का सबसे बड़ा संगठन है संघ। जमीन पर क्या चल रहा है, यह उससे बेहतर कौन जान सकता है। आज ही एक बहुत बड़े भक्त से बात हो रही थी। निराश लग रहा था। मन दुखी था उसका। कह रहा था, अब उम्मीद बाकी नहीं रही। तीन तलाक से हमें क्या लेना-देना है। यह मुसलमानों का आंतरिक मामला है। पता नहीं सरकार हमें क्या संदेश देना चाहती है। मैंने उसकी दुखती नस पर थोड़ा सख्त हाथ कर दिया और बोला, तीन तलाक रुक जाएंगे तो नौकरियां ही नौकरियां मिलेंगे युवाओं को। भड़क गया, हाथ झटक कर बोला, घंटा मिल जाएंगी।
ऐसे भक्तों की तादाद तेजी से बढ़ती जा रही है। संघ के पास भी ऐसे भक्तों की कमी नहीं होगी। दलित छिटक गया। दलितों को वापस लाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया। इससे सवर्ण नोटा-नोटा डकरा रहा है। दलितों के साथ सवर्णों के एक वर्ग का भी मुंह फूल गया है। संघ अंधा और बहरा नहीं है कि वह उसे कुछ सुनाई-दिखाई नहीं दे रहा होगा। महाभारत होना अवश्यंभावी लग रहा है। संघ देश की लंका लगते हुए नहीं देख सकता। कोई भी नहीं देख सकता।
आर्थिक मोर्चे पर सरकार की घनघोर नाकामी, पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें, रसातल में जाता रुपया किसी को भी महाभारत करने पर मजबूर कर सकता है। अगर परिवार के कुछ चंद लोग परिवार को सड़क पर लाने का काम करेंगे, तो बाकी सदस्य उनसे मोर्चा तो लेंगे ही। हालात बेहद दिलचस्प मोड़ पर हैं। जो आगे होगा, शायद भारत के इतिहास में कभी नहीं हुआ होगा।

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Saleem Akhtar Siddiqui