ये थी पंडित नेहरू की आखिरी इच्छा

Share

आज भारत में हर खराब स्तिथि के लिए सिर्फ नेहरू को जिम्मेदार माना जाता है। पर आज जिस आधुनिक भारत में हम जी रहे हैं, उसके लिए हमे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का शुक्रगुजार होना चाहिए। जवाहर लाल नेहरू को आधुनिक भारत का जनक कहा जाता है। भारत जिस समय आजाद हुआ था, उस समय दूसरे विश्व युद्ध की वजह से भारत की आर्थिक, सामाजिक स्तिथि काफी खराब हो चुकी थी। जिससे देश का मूलभूत ढांचा बिल्कुल चरमरा गया था। ऐसे में प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए जवाहर लाल नेहरू ने जिस तरह देश की नीतियों को तैयार किया, उसी की बदौलत आज हम कई क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बन पाए हैं।

उनकी विदेश नीति के कारण पूरी दुनिया का मिला सहयोग

जब जवाहर लाल नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री बने थे, उन्होंने विदेश मंत्रालय अपने ही अंतर्गत रखा, यानी वो देश के पहले प्रधानमंत्री होने के साथ वह देश के पहले विदेश मंत्री भी थे। जब हमारा भारत आजाद हुआ, तो दुनिया दो धड़ों में बंट चुकी थी। भारत किसी एक गुट ने शामिल होकर सामने वाले गीत की शत्रुता मोल नहीं लेना चाहता था। अगर उस समय नेहरू किसी गुट में शामिल हो जाते तो दूसरे गुट से न तो मदद मिलती और ना ही कोई सहयोग। इसी के चलते नेहरू ने किसी भी शामिल न होकर एक तीसरा धड़ा बताया, जिसे आज दुनिया गुटनिरपेक्ष के नाम से जानती है।

नेहरू की अनोखी ख्वाहिश

आपको ये जानकर हैरानी होगी कि भारत के पहले प्रधानमंत्री ने अपनी विरासत में अपनी ऐसी अनोखी ख्वाहिश का जिक्र किया था, जो किसी फिल्म के भावुक कर देने वाली कहानी से कम नहीं था। दरअसल, नेहरू ने अपनी वसीयत में विस्तार से बताया कि वह चाहते थे उनकी मरने के बाद नेहरू की अस्थियों की राख को किसी नदी में विसर्जित न किया जाए बल्कि देश के कोने-कोने बिखेर दिया जाए।

वसीयत बनी चर्चा का केंद्र

जब महान व्यक्तिव के धनी जवाहरलाल नेहरू का निधन हो गय, तब उनकी वसीयत खोली गई और हर तरफ उनकी वसीयत चर्चा का विषय बन गई। हर व्यक्ति उनकी इस अनोखी इच्छा के बारे में बात कर रहा था। इस वसीयत में नेहरू ने विस्तार बताया कि उनकी अस्थियों को कहां और कैसे बहाया जाए। इस वसीयत में लिखा था- मेरी मौत के बाद में मेरी अस्थियों की राख से एक मुट्ठी हिस्से को प्रयाग के संगम में बहा देना। और साथ ही मेरे शरीर की राख पूरे हिंदुस्तान में दामन में हमेशा रहे और अंत में, मैं समुंद्र में जाकर मिल जाऊं।

इस तरह दुनिया  को कहा अलविदा

आजादी के बाद नेहरू को 1947 के बाद देश का पहला प्रधानमंत्री बनाया गया। इस बात में कोई दोराय नहीं थी कि नहेरू एक दूरदर्शी नेता थे। उन्हें इस बात का अंदाजा था कि अगर भारत की विकसित देशों की श्रेणी में खड़ा करने के लिए, देश की नींव की किस तरह तयार किया जाए? नेहरू अंत तक अपने इसी मिशन के तहत काम करते रहे। लेकिन 1964 में 27 मई की सुबह उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई और दोपहर 2 बजे नेहरू इस दुनिया को अलविदा कह गए।मौत के बाद भी देश की मिट्टी के हर कोने में जिंदा है नेहरू

नेहरू मरने के बाद भी देश के हर कोने की मिट्टी में आज भी जिंदा हैं। इसकी वजह उनकी राजनीतिक विरासत तो थी ही, साथ ही उनकी ये अनोखी इच्छा भी थी। उन्होंने ये बात साफ तौर पर कही थी कि मेरी मौत के बाद मेरी अस्थियों की राख को हवाई जहाज से खेतों में उड़ा देना, ताकि इस देश के हर किसान, हर मजदूर के साथ मैं इस देश के जर्रे-जर्रे में हमेशा के लिए समा जाऊं।

नेहरू की इसी अनोखी इच्छा से पता चलता है कि जवाहरलाल नेहरू अपने देश और अपने देश के हर नागरिक, किसान और मजदूर से कितना प्यार करते थे। उनके निधन के बाद उनकी वसीयत के अनुसार ही उनकी अस्थियों का अंतिम संस्कार किया गया और देश के कोने- कोने में अस्थियों की राख को ले जाकर बिखेर दिया गया। इस तरह आज भी देश के हर ज़र्रे में नेहरू आज भी जीवित हैं।

Exit mobile version