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खूबसूरती के उद्योग में झुलस रहें हैं हजारों बच्चे

खूबसूरती के उद्योग में झुलस रहें हैं हजारों बच्चे

आज अंतरराष्ट्रीय बाल मजदूरी निषेध दिवस की शुरआत करीब दो दशक पहले 2002 में हुई थी। इसकी शुरुआत दुनिया में बाल मजदूरी को रोकने के लिए हुई थी। लेकिन भारत में बाल मजदूरी के मामले आज भी कम नहीं हैं। कहा जाता है कि गरीबी और बाल मजदूरी समांतर चलती हैं। मतलब गरीबी के कारण ही बच्चों को बाल मजदूरी करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
नवभारत की एक खबर के मुताबिक वर्तमान में बाल मजदूरों की संख्या बढ़कर 16 करोड़ हो गई है। बीते दशक में यह आंकड़ा पहली बार बढ़ा है। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन और यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक बाल मजदूरी रोकने की दिशा में 20 साल में पहली बार रुक गई है। इसके विपरित 2000 से 2016 के बीच बाल मजदूरों की संख्या 9.4 करोड़ थी।

कोरोना ने बाल मजदूरी में किया 84 लाख का इजाफा

कोविड-19 की महामारी हर एक बेकार स्तिथि को और अधिक बदत्तर कर दिया है। जिस तरह बेरोजगारी, अर्थव्यवस्था और गरीबी की स्तिथि और गंभीर हो गई है, उसी तरह महामारी में शुरूआत से लेकर अब तक बाल श्रम में भी 84 लाख की बढ़ोतरी हुई है।

किसे बाल मजदूरी माना जाए किसे नहीं

बाल मजदूरी की जब भी बात चलती है तो कई बार यह सवाल भी सामने आता है कि किस काम को बाल मजदूरी कहा जाएगा और किसे नहीं? दरअसल, ऐसे सभी काम जिससे बच्चों का मानसिक और शारीरिक विकास प्रभावित हो साथ ही उनकी जान को खतरा हो, ऐसे सभी कामों को बाल मजदूरी माना जाता है। खनन उधोग में काम करना, बंधुआ मजदूरी करना और वेश्यावृति जैसे काम बाल मजदूरी में से एक हैं। जबकि ऐसे काम जिनसे बच्चों की पढ़ाई और उनका मानसिक और शारीरिक विकास प्रभावित नहीं होता, उन्हें बाल मजदूरी में नहीं गिना जाता। स्कूल के समय को छोड़कर घर के कामकाज और व्यवसाय में हाथ बटाने को बाल मजदूरी नहीं माना जाता।

सरकारी दावों की खुलती रही है पोल

देश की सरकार बच्चों के विकास और समृध्दि के लिए बड़े-बड़े दावें करती रही है। यहां तक कि हमारे प्रधानमंत्री खुद बाल मित्रों का जिक्र कितनी दफा कर चुके हैं लेकिन इन्हीं बाल मित्रों का भविष्य उनके उनकी नाक के नीचे तबाह हो जाता है और सरकार हाथ पर हाथ रख कर बैठी रहता है।

रिफाइनरी29 (Refinery29) नाम के एक यू-ट्यूब चैनल ने भारत के झारखंड में काम करने वाले बाल मजदूरों पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी। इस डॉक्यूमेंट्री के अनुसार इलैक्ट्रॉनिक से लेकर हमारे टूथपेस्ट में माइका (Mica) का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन बाीते सालों में दुनिया में मेकअप इंडस्ट्री के उत्पादों की डिमांड काफी बढ़ गई है और मेकअप के हर (हाईलाइटर, पाउडर, बेस लिपस्टिक व अन्य) एक उत्पाद में माइका इस्तेमाल किया जाता है। 2016 रॉयटर्स की एक रिपोर्ट सामने आई थी, जिसके अनुसार दुनिया में अधिकांश माइका की अपूर्ति भारत से होती है और माइका की खदानों में काम करने वाले बच्चे अपनी जान पर खेल कर अपने व अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम करते हैं।

झारखंड माइका उधोग की सच्चाई बयां करती हैं डॉक्यूमेंट्री

Refinery29 चैनल की यह डॉक्यूमेंट्री झारखंड माइका उधोग की हकीकत बयां करती है। डॉक्यूमेंट्री के अनुसार 33 मिलियन लोग गांव और अनियमित जगहों मे रहते हैं और इन्हीं लोगों से यह इंडस्ट्री चलती है। हालांकि 1980 में पर्यावरण कानूनों के कारण इन उधोगों पर कुछ प्रतिबंध लगा दिए गए। पर आज यह काम अवैध तरीके से काम कर रहा है।

बच्चे इन खदानों में काम करने को मजबूर हैं

इस डॉक्यूमेंट्री में कई बच्चे अपनी आपबीती बताते हैं । बच्चों की मासूमियत और मजबूरी उनके चेहरे पर साफ तौर पर देखी जा सकती है। माइन में 11 साल की काम करने वाली पूजा बताती सवालों के जवाब देते हु़ए कहती है कि ” मैं 8 साल की उम्र से यहां काम कर रही हूं। हम यहां रोज डिभरा चुनने आते हैं। बहुत टाइम लगता है। अगर चुनेंगे नहीं तो खायेंगे क्या? ” काम करते हुए जान के खतरे को लेकर पूजा आगे कहती है कि “डर लगता है अंदर जाने में माटी गिरा जाएगा तो दब जाएंगे”

इस बात पर अपना अनुभव साझा करके हुए पूजा कहती हैं- “यहां ऐसा हुआ भी है। एक बच्चा आया था डिभरा चुनने, दब के वहीं पर रह गया।” पूजा के माता-पिता कुछ ही दूरी पर ईंटे बनाने का काम करते हैं। पूजा के पिता का कहना है कि बारिश में यह ईंट बनाने का काम बंद हो जाता है तो उस समय केवल माइका की खदान ही उनका एकमात्र सहारा रह जाती है। पूजा के पिता कहते हैं- वैसे तो कोई जबर्दस्ती काम नहीं करवाता है। लेकिन जब कुछ करने के लिए है ही नहीं तो यह करना ही पड़ता है। दरअसल, झारखंड के लोग यहां संसाधनों के भरमार होने का अभिशाप आज तक झेल रहें हैं और सरकार की अनदेखी और व्यवसायिक शोषण ने स्तिथि को और गंभीर बना दिया है। डॉक्यूमेंट्री के हवाले से यह अनुमान लगा़या जाता है कि पूरे झारखंड में करीब 22,000 बच्चे इसी तरह माइन्स में काम करते हैं।

4 साल की उम्र से कर रहे हैं काम

कुछ और बच्चियां बताती हैं कि वो इन खदानों में 4-5 साल की उम्र से काम कर रहे हैं। अगर यह सभी यहां काम न करती तो क्या होता? इस सवाल पर अधिकतर बच्चियां कहती हैं कि “भूखे मर जाते।”

मौत के मुंह से बाहर निकली सूरमा कुमारी की कहानी
सूरमा कु़मारी और उसकी बहन लक्षमी आम बच्चों की तरह माइन्स में काम कर रही थी। अचानक माइन्स कोलेपस कर के गिर गई और लक्षमी और सूरमा उसी के नीचे दब गईं हालांकि सूरमा को किसी तरह बचा लिया गया, पर लक्ष्मी की मौके पर ही मौत हो गई। इस घटना का जिक्र करते हुए सूरमा कहती है कि जहां चोट लगी थी वहां अभी भी दर्द होता है। उनके माता-पिता कहते हैं कि हमने अपनी बेटी को खोया है। लेकिन हमारे पास माइन्स में काम करने से अलावा कोई विकल्प नहीं है। इसलिए हम सभी आज भी माइन्स में काम करते हैं।

स्थानीय नेताओं का मिलता है संरक्षण

आज से करीब एक महीने पहले सीएनए इनसाइडर (CNA Insider) नाम के एक चैनल की एक डॉक्यूमेंट्री में झारखंड के एक स्थानीय विधायक सुदिव्य कुमार बाल मजदूरी के सवाल पर जवाब देने की बजाए माइन्स में हो रही बाल मजदूरी पर ही सवाल उठा देते हैं। वो कहते हैं ऐसे लोग जो हमारे प्रोडक्ट और क्वालिटी का मुकाबला नहीं कर सकते, वो अपने स्वार्थ के और हमे मार्केट कंपीटिशन से बाहर करने लिए यह साबित करना चाहती हैं कि माइका खनन में बाल मजदूरी होती है।

सुदीव्य कुमार आगे कहते हैं – जो लोग बाल श्रम का हवाला दे रहे हैं मैं उनसे जानना चाहूंगा कि बाल श्रम की परिभाषा क्या होती है? क्या अगर गांव के आस पास कोई रोजगार न होने के कारण कोई महिला अपने बच्चे को माइन्स पर साथ ले जाती है और वो अपनी मां की कुछ मदद कर देता है तो क्या आप उसे बाल श्रम कहेंगे? अगर कोई नियोजित तरीके से बाल श्रम करवाता है तो उसे बाल श्रम माना जायेगा। लेकिन अगर की 14 साल का लड़का अपने ढिभरा चुनने में उसकी मदद कर दे और आप उसकी फोटो खींच कर इस व्यवसाय को कलंकित करना चाहें, तो ये अनुचित है।

यह तो सिर्फ झारखंड की तस्वीर ऐसे अनेक राज्य और अनेक शहर हैं जहां बच्चे माइन्स, खतरनाक फैक्ट्री और कैमिकल फैक्ट्रियों में काम करते हैं। इसका सीधा सा कारण ऐसे क्षेत्रों में शिक्षा का अभाव, गरीबी और रोजगार के विकल्पों की कमी है। अगर सरकार को अपने बाल मित्र और भारत का भविष्य बचना है, तो शहरों के साथ उसे दूर-दराज गांव के विकास को अपनी प्राथमिकता में शामिल करना होगा।

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Heena Sen