मंटो से किसी ने पूछा: “क्या हाल है आपके मुल्क़ का ?”
कहने लगा – बिलकुल वैसा ही जैसा जेल मे होने वाली जुमा की नमाज़ का होता है
अज़ान फ्राडिया देता है, इमामत क़ातिल कराता है और नमाज़ी सब के सब चोर होते हैं…

उर्दू साहित्य के बेबाक और अपनी ही तरह के अनोखे लेखक, सआदत हसन मंटो की आज (18 जनवरी को ) पुण्यतिथि है। 18 जनवरी के ही  दिन 1955 में लाहौर में उनका देहांत हो गया था। मंटो का यह उद्धरण धर्म आधारित राज्य यानी थियोक्रैटिक स्टेट की असल तस्वीर दिखाता है। जब भी कोई राज्य, धर्म पर आधारित, एक थियोक्रैटिक स्टेट होने लगेगा तो वहां, उसी धर्म की आत्मा, उद्देश्य और मूल का लोप हो जाएगा, जिसके उन्माद और नाम पर वह राज्य बना है। और शेष रह जायेगा केवल उन्माद, अहंकार, मिथ्या श्रेष्ठतावाद, पाखंड, कर्मकांड पर आधारित धार्मिक और आर्थिक शोषण, और बढ़ने लगेगी, जनता की विपन्नता, दरिद्रता, कूप मंडूकता, ज़िद, कठघरों में बंटा हुआ  समाज।
मंटो के अफसाने पढिये। वे 1947 के उन बेहद कठिन और पागलपन भरे दिनों के दस्तावेज हैं जब नेहरू दिल्ली में नियति से साक्षात्कार और जिन्ना कराची में एक ऐसे पाकिस्तान की उम्मीद कर रहे थे, जहां सभी धर्मों के लोग एक साथ रह कर आराम से अपनी ज़िंदगी बिता सकें और मुल्क की तरक्की में अपना योगदान दें। जिन्ना, पता नहीं कैसा पाकिस्तान चाहते थे। शायद एक बेवकूफी भरी ज़िद में वे खुद भी मतिभ्रम के शिकार हो गए थे। वे बिल्कुल भी मजहबी व्यक्ति नहीं थे, पर एक अलग इस्लामी मुल्क बने, यह उनकी ज़िद थी। एक अदद टाइपराइटर और एक स्टेनोग्राफर के बल पर जिन्ना ने पाकिस्तान पाया है। यह कथन मेरा नहीं, एमए जिन्ना का खुद का कहा वाक्य है। धर्म आधारित राज्य का अंत कैसा होता है यह पाकिस्तान की केस स्टडी से समझा जा सकता है, जबकि वह पचीस साल में टूट गया। यह द्विराष्ट्रवाद का अंत था।
मंटो एक विवादास्पद लेखक थे। उन पर अश्लील लेखन का भी आरोप लगा।  शराबखोरी की लत तो थी ही, और फक्कड़पना भी। वे फिल्मों के लिये भी लिखते थे। मूलतः वे कथाकार थे। बंटवारे पर लिखी उनकी एक कहानी टोबा टेक सिंह बेहद प्रसिद्ध है। कहानी का सार, इस प्रकार है।
1947 में विभाजन के समय भारत और पाकिस्तान की सरकारों ने एक दुसरे के हिन्दू-सिख और मुस्लिम पागलों की अदला-बदली करने पर समझौता किया। लाहौर के पागलख़ाने में बिशन सिंह नाम का एक सिख पागल था जो टोबा टेक सिंह नामक गांव का निवासी था। उसे पुलिस के दस्ते के साथ भारत रवाना कर दिया गया, लेकिन जब उसे पता चला कि टोबा टेक सिंह भारत में न जाकर बंटवारे में पाकिस्तान की तरफ़ पड़ गया है तो उसने जाने से इनकार कर दिया। कहानी के अंत में बिशन सिंह दोनों देशों के बीच की सरहद में कंटीली तारों के बीच लेटा, मरा या मरता हुआ दर्शाया गया। कहानी का अंतिम वाक्य है,
” इधर ख़ारदार (कंटीली) तारों के पीछे हिन्दोस्तान था। उधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान। दरम्यान में ज़मीन के उस टुकड़े पर जिस का कोई नाम नहीं था, टोबा टेक सिंह पड़ा था।”
मंटो को उस समय ज़रूर पढा जाना चाहिए, जब देश को जानबूझकर, अपने अधूरे और मिथ्या एजेंडे की पूर्ति के लिये कुछ लोगों का गिरोह, रिवर्स गेयर में ले जाने की कोशिश कर रहा है । यह प्रतिगामी ताकतें, फिर से उसी साम्प्रदायिक उन्माद के अंधे दशक, जो 1937 से 1947 के बीच देश ने बड़ी त्रासदी से भोगा है, में देश को ले जाना चाहती हैं।
इतिहास बहुत सी चीजें छुपा देता है। वह घटनाक्रम, और घटनाओं के शुष्क विवरण के अतिरिक्त उनकी अलग अलग अकादमिक व्याख्या तो दे देता है पर इतिहासकार, समाज का मन नहीं पढ़ पाता है। वह पुरातत्व से अभिलेखागारों तक तमाम दस्तावेजों की पड़ताल, उनकी ऐतिहासिकता की जांच के बीच समाज और लोगों पर क्या बीत रही है यह वह अक्सर पकड़ नहीं पाता है। लेकिन लेखक अपनी संवेदनशीलता और कल्पना प्रवीणता के कारण समाज के अंदर खदबदाते हुये मनोभावों को भांप लेता है औऱ फिर समाज का वह अक्स हमें देखने को मिलता है, जो इतिहास के बहु खण्डीय पुस्तकों में नहीं मिलता है। बंटवारे की पृष्ठभूमि पर लिखी गयी मंटो की कुछ कहानियां ऐसी ही हैं।
मंटो को बहुत लंबी उम्र नहीं मिली। पर जो भी मिली और जो साहित्य उन्होंने लिखा वह उर्दू साहित्य में उन्हें श्रेष्ठतम कथाकारों की पंक्ति में रखने के लिये पर्याप्त है। मंटो की पुण्यतिथि पर उनका विनम्र स्मरण।

© विजय शंकर सिंह