October 27, 2020

 
आज का छत्तीसगढ़ कभी धान का कटोरा कहलाता रहा है. अविभाजित मध्य प्रदेश से 1 नवम्बर 2000 में अलग होकर ये एक राज्य की शक्ल में आया, सत्रह बरस के इस युवा राज्य की जनसंख्या – 2011 की गणना के मुताबिक़ 2 करोड़ 55 लाख थी. जिसमें 1,28,32,895 पुरुष और 1,27,12,303 औरतों की जनसंख्या थी. यहाँ की साक्षरता दर 71 फ़ीसदी है. वैसे तो यह राज्य आदिवासी, दलित बहुमत आबादी का राज्य है. इसके सात ज़िले पूरी तरह आदिवासी बहुल हैं जिनमें बस्तर,दंतेवाड़ा,कांकेर,सरगुजा, कोरबा, जशपुर,कोरिया तथा बिलासपुर, दुर्ग, धमतरी, जांजगीर चाँपा, कवर्धा, महासमुंद, रायगढ़,राजनांदगांव, रायपुर, मिश्रित आबादी (आदिवासी वाले ज़िले हैं, जिसमें – दलित 2,418,722  (11.6) और आदिवासी 6,616,596 (31.8) हैं.
ये राज्य प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न है. 44 फ़ीसदी वन राजस्व देने वाला राज्य है. यहाँ की ज़मीन के नीचे 27 तरह के खनिज संसाधन मौजूद हैं. यहाँ की 80 फ़ीसदी आबादी खेती पे निर्भर है इसी धान की भरपूर पैदावार की वजह से इसे धान का कटोरा कहा जाता है. देश के 600 चांवल मीलों को यहाँ से आपूर्ति की जाती है. स्टील और बिजली राज्य के प्रमुख उद्योग हैं. देश का 15 फ़ीसदी स्टील छग में पैदा किया जाता है. देश के कुल वन क्षेत्र का 12 फ़ीसदी जंगल छत्तीसगढ़ में मौजूद है. इससे यहाँ की विशाल जैव विविधता का पता चलता है, यहाँ बोली जाने वाली भाषाएँ मुख्यतः हिंदी,छत्तीसगढ़ी , मराठी , कोरकू ,उड़िया, गोंडी, हल्बी इत्यादि हैं. छत्तीसगढ़ रेलवे, सड़क और हवाई मार्ग द्वारा देश से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है. यहाँ कई राष्ट्रीय और राज्य राजमार्ग हैं जो छत्तीसगढ़ को देश के दूसरे हिस्सों से जोड़ते हैं। छत्तीसगढ़ से गुजरने वाले प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्गों में .एन एच 6, एन एच 43, एनएच 78 के अलावा 11 राष्ट्रिय राजमार्ग हैं.
मगर अफ़सोस इसकी बड़ाईए ख़ूबसूरती को किसी की बुरी नज़र लग गयी और आज हालात ये है कि छत्तीसगढ़ किसान आत्महत्या के मामले में देश में 5 वें नंबर पे है. भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में माना है कि देश में हर बरस 12 हज़ार किसान आत्महत्या करते हैं. जिसमे अकेले 954 छत्तीसगढ़ में मरते हैं.
राज्य के आदिम जाति कल्याण विभाग में शिक्षकों के 57,866 पद ख़ाली पड़े है. जबकि राज्य में शिक्षित बेरोज़गारों की तादाद 19,53,556 है. कितनी अजीब बात है कि इस विभाग में सेटअप के मुताबिक़ शिक्षकों के 2,40,767 पद स्वीकृत हैं उसमें से क़रीब 24 फ़ीसद पद ख़ाली पड़े हुए हैं. बेरोज़गारों की तादाद को देखकर ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है कि छत्तीसगढ़ की क़रीब 13 फ़ीसद आबादी के पास कमाई का कोई जरिया नहीं है.
जबकि यहां 57866 शिक्षकों के पद अभी भी ख़ाली हैं.
’राज्य सरकार की अतिमहत्वकांक्षी स्वास्थ्य योजनाएँ डॉक्टरों की कमी की वजह से दमतोड़ रही हैं.
’पीएच सी और ज़िला सरकारी अस्पतालों मे मरीज़ो के परिजनों से इलाज के पैसे वसूल किए जा रहे हैं. अस्पताल से दवाएं मिलना अब भूले ख़्वाब सा लगता है.
’अपराधों के मामले मे राज्य का सितारा बुलंदी पर है. नेशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो की माने तो गुज़रे 10 बरसों में राज्य में औरतों के ख़िलाफ़ किये जाने वाले अपराधों में दो गुनी वृद्धि हुयी है, 2001 में राज्य में होने वाले अपराधों की संख्या 3989 थी जो 2013 में बढ़कर 7012 का आंकड़ा पार कर गई है.
’छत्तीसगढ़ आदिवासी, दलित बहुल राज्य है, मगर राज्य के मालिक जनसंख्या की ज़िंदगियाँ जहन्नुम बनाई जा रही है.
’जहां एक तरफ़ नक्सलवाद सफ़ाये के नाम पर बेगुनाह आदिवासियों की पुश्तें तबाह की जा रही हैं, वहीं वर्ण व्यवस्था आधारित अछूतों ;दलितों के साथ की जाने वाली बर्बर अमानवीय घटनाओं मे लगातार तेज़ी होते जा रही है. एनसीआरबी रिपोर्ट के मुताबिक़ पिछले बरस दलितों पर देश में 45003 अपराध किये गए और अकेले छत्तीसगढ़ में 10280 अपराध के मामले दर्ज किये गये इसके अलावा छत्तीसगढ़ दलित महिलाओं पर अत्याचार के मामले में भी सबसे ऊपर है. पिछले साल दलित महिलाओं से बलात्कार के कुल 2326 मामले देश भर  में दर्ज हुए जिसमें से अकेले छत्तीसगढ़ में 81 मामले दर्ज किये गए. इसके अलावा देश भर में 2015 में दलितों के ख़िलाफ़ आगज़नी के कुल 179 मामले दर्ज किये गए थे जो राष्ट्रीय दर के हिसाब से 0.1 है, लेकिन अकेले छत्तीसगढ़ में ये आंकड़ा 43 का है जो राष्ट्रीय दर से अधिक 0.3 है.
’नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में प्रति एक लाख दलित आबादी के ख़िलाफ़ अपराध की राष्ट्रीय दर 22.3 लेकिन छत्तीसगढ़ में ये आंकड़ा 31.4 है. जो राज्य की दूसरे नम्बर की बहुसंख्यक आबादी के साथ पुलिस प्रशासन और राज्य सरकर का संवेदनहीन अमानवीय चेहरा दिखला रहा है.
’औरतों के साथ की जाने वाली हिंसा के मामले मे छत्तीसगढ़ दूसरे कई राज्यों से आगे बढ़ चुका है. नेशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़ राज्य मे औसतन रोज़ाना 4 औरतें बलात्कार की शिकार बनाई जा रही हैं तो रोज़ाना 5 औरतों पे हमला किया जा रहा है. हालात ये हैं कि औरतों के साथ हिंसक अपराधों मे बिहार जैसा राज्य भी छत्तीसगढ़ से काफ़ी पीछे छुट गया है.
’ये कहना गलत न होगा कि छत्तीसगढ़ औरतों के लिए लगातार असुरक्षित होता जा रहा है. राजधानी रायपुर से सटे कुछ शहर तो पूरे देश मे औरतों के लिए असुरक्षित माने जाने वाले शहरों की लिस्ट मे शामिल है.
’ख़ासकर दुर्ग ज़िले मे शीलभंग और बलात्कार के मामलों मे पिछले 6 बरसों मे दोगुना बढ़ोत्तरी आँकी गयी है. मसलन हर चौथे दिन एक  औरत के साथ अनाचार किया जाता है. 2015 के आंकड़ों के मुताबिक़ देशभर मे होने वाले बलात्कार की लिस्ट मे छत्तीसगढ़ आठवें पायदान पे बिराजमान है.
’एक अध्ययन के मुताबिक़, 52 फ़ीसदी औरतें किसी न किसी तरह की हिंसा का शिकार होती हैं तो 38 फ़ीसदी औरतों के साथ कभी न कभी थप्पड़ मारने, घसीटे जाने, पिटाई किए जाने और जलाए जाने की घटनाएँ होती हैं. 34 फ़ीसद औरतें 15 से 19 की उम्र मे पति या किसी साथी की हिंसा की शिकार होती हैं (इंटरनेशनल सेंटर रिसर्च ऑन वुमेन के मुताबिक़)
77 फ़ीसदी औरतों के साथ 15 से 19 की उम्र मे ज़बरदस्ती यौन संबंध बनाने की कोशिश की जाती है.  41 फ़ीसद औरतें 15 से 19 की उम्र मे माँ या सौतेली माँ के हाथों शारीरिक यातनाएं झेलती हैं. 18 फ़ीसद औरतें 15 से 19 की उम्र मे सौतेले पिता के हाथों पीटी जाती हैं.
’छत्तीसगढ़ विधानसभा – जुलाई 2013  में एक प्रश्न के लिखित जवाब में बताया गया था कि वर्ष 2010 से 2013 के बीच राज्य में औरतों के गर्भाशय निकालने 1800 मामले सामने आए थे. (इनमें ज़्यादातर ग़रीब दलित आदिवासी महिलाएं थीं)
ग़ौरतलब बात है कि ग़रीबी रेखा से नीचे गए लोगों को अच्छी चिकित्सा सुविधा मुहैय्या करवाने के लिए 2007 की तात्कालीन केद्र सरकार ने स्वास्थ्य बीमा योजना की शुरुआत की थी जिसके तहत स्मार्ट कार्ड के ज़रिये एक साल में  मरीज़ की  30 हज़ार तक की चिकित्सा का ख़र्च की ज़िम्मेदारी सरकार वहन करेगी.
’2012 में 22 औरतों के गर्भाशय को गर्भाशय के ग्रीवा कैंसर का डर दिखाकर निकाल लिया गया. स्थानीय अख़बार में ख़बर छपने से निज़ी नर्सिंग होम के लालची डॉक्टरों की  हैवानियत का भंडाफोड़ हुआ. जिन्होंने भोलेभले ग्रामीणों को गर्भाशय के कैंसर का डर दिखाकर सरकार के श्स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत इनके ऑपरेशन कर दिए गए.
’पिछले 12 बरसों में ग़रीबों के लिए स्वास्थ्य सुविधा मुहैय्या कराने का सरकारी एजेंडा और उसे पूरे करने के टारगेट कितने वीभत्स हो सकते हैं, इसके ज़िंदा सुबूत  छत्तीसगढ़ में हर कहीं बिखरे पड़े हैं.
’नेत्र शिविरों में ऑपरेशन कराने वालों के आँखों की रौशनी का चले जाना, 35 से ज़्यादा मरीज़ हमेशा के लिए अंधे हो गए. आँख फोड़वा कांडके नाम से मशहूर इस कांड में ऑपरेशन के 5 दिनों के अंदर इन्फेक्शन फ़ैल जाने के कारण एक महिला मरीज़ की जान भी चली गई,ये मिसाल छत्तीसगढ़ में मौजूद है.
’एक ही दिन में एक डॉक्टर 50 से ज़्यादा लोगों की आँखों का ऑपरेशन कर सकता है ये मेगा रेकॉर्ड छत्तीसगढ़ में टूट चुका है. भले ही वो डॉक्टरी मानक के हिसाब में अमान्य हो, मगर दलित आदिवासी और ग़रीबों की ज़िंदगियाँ यहां के डॉक्टरों के लिए जानवरों से ज़्यादा अहमियत नहीं रखती.
’जनसँख्या क़ाबू में करने वाली योजना के तहत पैसों के लालची भेड़ियों ने सरकारी टारगेट पूरा करने के लिए भोलेभाले ष्रिमेटिव बैगा आदिवासी औरतों की नसबंदी करदी, वो भी मध्य प्रदेश में ले जाकर मामला तूल पकड़ दिल्ली पहुंचा और छत्तीसगढ़ भवन में संयुक्त महिला संगठनों ने  जब धरना  प्रदर्शन किया तब मामला रफा दफा करने के लिए कुछ छोटे डॉक्टरों को दांत फटकार लगाई गयी. मगर आजतक किसी भी अपराध में ज़ीम्मेदार बड़ा अधिकारी जेल नहीं पहुँचाया गया.
ये कहना गलत न होगा की आज छत्तीसगढ़ बतौर एक राज्य, एक  समाज  संक्रमणकाल से गुज़र रहा है. वैसे तो ये  राज्य बाहरी आक्रमण से महफूज़ रहा है. मगर बाहर से आये गैर छत्तीसगढ़िया, लालची और स्वार्थी तत्व, उद्योगपतियों के आगे दंडवत सरकारी मिशनरियों ने इस ख़ूबसूरत धरती को बदसूरत बना दिया है.
आदिवासी परंपरा से समृद्ध है छत्तीसगढ़ी समाज, इसके पास क़ुदरती ख़ज़ानों, संसाधनों की ऐसी ताक़त है जिसपर गर्व किया जा सकता है, मगर यही ख़ज़ाना यहाँ की मूल आबादी की जान को आफ़त बन चुका है. आदिवासी दलित बहुल आबादी वाला ये राज्य राष्ट्रिय व बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुनाफ़ाख़ोर दलालों के ख़तरनाक शिकंजे में जकड चुका है.
’गुज़रे 11 बरसों में छत्तीसगढ़ से 5000 से ज़्यादा लड़कियों की तस्करी करके दिल्ली और दुसरे शहरों में भेजा गया है. संख्या की लिखित जानकारी दिल्ली पुलिस के पास सुरक्षित है. इनमें से ज़्यादातर की उम्र उन्हें अग़वा करते वक़्त 18 बरस से कम थी.  शर्मनाक बात ये है की ये लड़कियां  छत्तीसगढ़ के सिर्फ 2  ज़िलों जशपुर
(आदिवासी जिला) और रायगढ़ (आदवासी बहुल जिला) की हैं.
ग़ौरतलब है कि इन बच्चियों  को काम दिलवाने के बहाने बहला.फुसला कर दिल्ली ले जाया जाता है. वहां उन्हें बंधक बनाकर रखा जाता है, वाजिब दाम मिलने पर घरेलु कामकाज या सेक्स रेकेटिंग के लिए बेच दिया जाता है. अमीर राज्य की ग़रीब जनता की बेटियों की तस्करी एक सामाजिक समस्या है और इसकी इकलौती वजह कंपनियों के लिए सरकारी मिशनरियों द्वारा ज़मीन की ज़बरदस्ती लूट, अपनी ही ज़मीनों से आदिवासियों की बेदख़ली और उससे उपजी ग़रीबी और बेरोज़गारी ही तो है.
क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि छत्तीसगढ़ सरकार दलित आदिवासियों की दुश्मन है !!

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Zulaikha jabeen

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