October 27, 2020

तमाम तरह की चर्चाओं के बीच हम ये भूल जाते हैं, कि इक्कीसवी सदी के इस भारत में महिलाओं पर अत्याचार में कोई कमी नहीं आई है. आज महिला उत्पीडन के दिल दहला देने वाले मामलों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है. बीच में निर्भय काण्ड के समय ऐसा महसूस हुआ था, जैसे देश अब महिला अत्याचारों के विरूद्ध मुखर हो रहा है. पर सरकारों के नाकाफी कदमों की वजह से बलात्कार और छेडछाड जैसी घटनाओं में देरी से होने वाली सुनवाई के कारण अभी भी स्थिति जस की तस है. कभी बलात्कार के आरोपी जुवेनाईल एक्ट की वजह से बच निकलते हैं, तो कभी डर और बदनामी के डर से बलात्कार और अन्य घरेलु हिंसाओं से जूझने वाली महिलायें आगे नहीं आतीं.
जब बात चलती है, राज्यवार महिला अत्याचार से जुड़े मामलों की तो चौंकाने वाले नतीजे सामने आते हैं. देश में मध्यप्रदेश एक ऐसा राज्य है, जहाँ सर्वाधिक बलात्कार होते हैं. मध्यप्रदेश इस लिस्ट में कई सालों से टॉप में बना हुआ है. पर अफ़सोस इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने अभी तक इस बात को मुद्दा नहीं बनाया. जब देश में निर्भय काण्ड की गूँज थी, और सोशलमीडिया से लेकर इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया तक, संसद से लेकर सड़क तक महिला अत्याचारों पर चर्चा की जा रही थी, उस समय भी मध्यप्रदेश महिला अत्यचारों में देश में अव्वल राज्य था. आज भी मध्यप्रदेश इस सूची में अव्वल है.
ये विषय इसलिए भी चिंतनीय है, क्योंकि मध्यप्रदेश देश का एक ऐसा राज्य है जिसकी सीमायें राजस्थान,गुजरात, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और उत्तरप्रदेश जैसे बड़े राज्यों से लगी हुई हैं. उत्तर को दक्षिण से जोड़ने वाले अधिकतर रेल और सड़क मार्ग मध्यप्रदेश से गुजरते हैं. मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, जो खुद को प्रदेश की जनता का मामा कहते हैं, उनके राज्य में महिलाएं सबसे ज़्यादा असुरक्षित हैं. पर एक आवाज़ नहीं उठती, इसकी कई वजह हो सकती हैं. पर क्या आप जानते हैं, मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्य में महिला उत्पीडन के असमान छूते आंकडें देश के लिए कई लिहाज़ से खतरनाक हैं. दहेज़ हत्या हो, या फिर बलात्कार की घटना, या फिर महिलाओं के साथ होने वाले अन्य प्रकार के अत्याचार, जब देश का दिल ही खराब हो जायेगा तो पूरे देश की रगों में कैसा खून बहेगा.राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट पर गौर फरमाएं तो महिलाओं के लिए मध्यप्रदेश सबसे अधिक असुरक्षित राज्य है.
दरअसल महिलाओं के उत्पीड़नकर्ताओं के मन में सजा का भय ही नहीं है यही वजह है कि बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामलों में वृद्धि हो रही है. बलात्कार के मामलों में सजा की दर बेहद कम है. आंकड़ें बताते हैं कि 2006 में यौन उत्पीड़न मामले में सजा की दर 51.8 फीसदी, 2007 में 49.9, 2008 में 50.5 और 2009 में 49.2 फीसद रही. इन आंकडों से साफ है, कि बलात्कार के अधिकतर मामले में अपराधी सजा से बच जा रहे हैं. यानी महिलाओं पर होने वाले समग्र अत्याचारों में सजा केवल 30 फीसदी गुनाहगारों को ही मिल रही है. ऐसे में अगर बलात्कारियों और यौन उत्पीड़नकर्ताओं का हौसला बुलंद होता है तो यह अस्वाभाविक नहीं है.
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि भारत में प्रतिदिन लगभग 50 बलात्कार के मामले थानों में पंजीकृत होते हैं। इस प्रकार भारत भर में प्रत्येक घंटे दो महिलाएं बलात्कारियों के हाथों अपनी अस्मत गवां देती हैं, इन मामलों में मध्यप्रदेश 1,262 मामले के साथ देश में अव्वल ,तो  उत्तर प्रदेश (1,088) मामलों के साथ दुसरे तो वहीँ महाराष्ट्र जजैसा शिक्षित राज्य (818) मामलों के साथ तीअसरे नम्बर पर रहा ज्ञात हो ये आंकड़े 2016  में जारी किये गए राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े हैं. अब देखना ये है, कि महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा, बलात्कार और दहेज़ उत्पीडन जैसे मामलों में मध्यप्रदेश और पूरे देश में क्या क़दम उठाये जाते हैं, देश की मोमबत्ती लेकर निकलने वाली जनता में अब वो जूनून नहीं दिख रहा है, जो बलत्कार जैसी घटनाओं के विरुद्ध सड़क पर आयें. ये देश का दुर्भाग्य है.

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