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आखिरी मुग़ल और 1857 का स्वतंत्रता संग्राम- (भाग 2)

आखिरी मुग़ल और 1857 का स्वतंत्रता संग्राम- (भाग 2)

आखिरी मुग़ल और 1857 का स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम भाग पूर्व में प्रकाशित किया जा चुका है, यदि आपने उसे नहीं पढ़ा है. तो यहाँ क्लिक करके पहले उसे पढ़ें , उसके बाद यह भाग दो आपके लिए ज़्यादा बेहतर होगा.

अंग्रेज़ों कि कब्रें

वर्तमान भारत में विभाजनकारी माहौल और दूरियां बढ़ रही हैं। सम्पूर्ण भारत को 1857 वाले एकता के बंधन की जरूरत है। राजनीतिक विरोधाभास से परे, हम कैसे बहादुर शाह ज़फर के अवशेषों को वापस ला सकते हैं, और भारत के विभिन्न भागों में 1857 के चिरस्थायी मेमोरियलस बना सकते हैं, इसपे विचार होना चाहिये।
लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि विभिन्न, क्रूर ब्रिटिश अधिकारीयों की कब्रें अभी भी लखनऊ, कानपुर और दिल्ली में, पूरे महिमामण्डन के साथ, स्तिथ हैं। हम बिना इन कब्रों का कुछ किये, ज़फर के अवशेषों को भारत कैसे ला सकते हैं? आगे देखिये यह दोनो मुद्दे कैसे आपस में जुड़े हुए हैं।

लखनऊ का विशेष महत्व

इस सब में लखनऊ का विशेष महत्व है। 4 मुख्य ब्रिटिश अधिकारी इस शहर में दफनाये गए हैं। सर हेनरी लॉरेंस 1856 में अवध राज्य पर ब्रिटिश अधिकार के बाद पहले कमीशनर थे। इनकी और कुख्यात ब्रिगेडियर-जनरल नील की कब्र लखनऊ रेजीडेंसी एरिया के अन्दर स्थित है। आलमबाग में ‘सर’ हेनरी हेवलोक की कब्र है। ब्रेवेट-मेजर डब्ल्यूएसआर हाडसन को ला मार्टिनियर कॉलेज में दफनाया गया था।

हडसन के काले कारनामे

22 सितम्बर 1857 के दिन हडसन ने ही बहादुर शाह जफ़र के तीन निहत्थे बेटों को दिल्ली के खूनी दरवाजे के पास उनके सरेंडर करने के बाद भी, सरे-आम, गोली से उड़ा दिया था। डब्ल्यूएसआर हडसन का असली चरित्र उनकी खुद की लिखी किताब, “माय 12 ईयरस इन इंडिया” से उजागर होता है।
इस किताब में कई जगह हाडसन द्वारा स्थापित ‘हडसन हॉर्स’ नाम की घुड़सवार पल्टन के करतूत उजागर किये गये हैं। इस पलटन ने कैसे हारियाणा, दिल्ली, पश्चमी उत्तर प्रदेश और अवध मे गांव के गांव जला दिये, कितने निर्दोष भरतीय नागरिकों को मार दिया, कहीं ‘कालों को’ तो कहीं ‘पान्डे (पान्डे एक प्रत्यय है जो मंगल पान्डे के प्रथम ‘बागी’ बन जाने के बाद 1857 के राष्ट्रवादियों को चीन्हित करने के लिये ब्रिटिश सेना इस्तेमाल करती थी) को मारा, यह सब हाडसन ने खुद लिखा है। मतलब हडसन भारतियों के सामूहिक हत्या को एन्जॉय करता था।
हडसन अंग्रेजों द्वारा भी कम प्रतिष्ठा वाला समझा जाता था. कई किताबें, जैसे की “The Indian Rebellion of 1857 (Michael Edwardes, 1975)’, ‘A Leader of Light Horse (LJ Trotter, 1901)’, ‘History of the Indian Mutiny (TR Holmes, 1898)’ में हाडसन के खिलाफ अनेक बातें उल्लेखित है जिसमें हाडसन को भृष्ट अफसर बताया गया है जो फण्ड में हेरा-फेरी करता था।
फ़रवरी 1858 में इंग्लैंड के ब्रद्फोर्ड से सांसद थॉमस पेरनोट थोम्पसन ब्रिटिश हाउस ऑफ़ कॉमन्स में खड़े हुए और हाडसन को जफ़र के पुत्रों का हत्यारा करार दिया। पेरनोट ने कहा हाडसन ‘पागलपन’ का शिकार था।

‘सर’ हेनरी लॉरेंस

अनेको किताबें जैसे कि ‘Lives of Indian Officers (John William Kaye, 1899)’, ‘Dictionary of Indian Biography (Charles Edward Buckland, 1906)’ और लॉ रेन्स के खुद के लिखे पत्र (Lawrence’s own despatches published in ‘Freedom Struggle of Uttar Pradesh edited by SA Rizvi and ML Bhargava, 1957)’, लॉरेन्स को धार्मिक कट्टरपंथी के रूप में चित्रित करते हैं। जिन्होनें लखनऊ में 12 से 31 मई 1857 तक अनेक लोगो को मार डाला। और भारत में साम्प्रदायिकता की शुरुआत भी की।

‘सर’ हेनरी हेवलोक

हेवलोक ने धार्मिक कट्टरता को नस्लवाद के साथ मिला दिया। कई किताबें जैसे ‘A Biographical Sketch of Henry Havelock KCB (William Brock, 1858)’, ‘Way to Glory (John Pollock, 1963)’, ‘Memoirs of Sir Henry Havelock (John Clark Marshman, 1860)’, बताती हैं कि हेवलाक ने इलहाबाद से कानपुर और उन्नाव(उन्नाव वह स्थान जहां पर हेवलाक ने पासी गाँवों की महिलाओं और बच्चों को मारा) के रास्तें में किसानो और गरीब जनता की लाशें बिछा दीं।

हत्यारा नील

जैसा कि ‘The Indian Mutiny of 1857 (GB Malleson, 1899)’, ‘The Great Rebellion (Christopher Hibbert, 1978)’, में उल्लेखित है, इलहाबाद और फतेहपुर में नील काली चमड़ी वाले लोगों को मारना अपना ‘धार्मिक कर्तव्य’ समझता था।  नील ने इतने ज्यादा लोगों को मार दिया कि उनके अफसरों ने उनको लताड़ा कि ब्रिटिश सेना को अनाज की सप्लाई करने वाला भी नही मिल रहा है। कानपुर में नील के एक विशेष ऑर्डर के अनुसार, क्रन्तिकारी सिपाहियों को फांसी के पहले खून, हिन्दुओं को गो-मांस तथा मुसलमानो को सूअर का गोश्त चटवाया जाता था। कोड़ों से अलग मारा जाता था।

मौत और उसके बाद

लॉरेन्स, हेवलाक, नील को क्रमशः 4 जुलाई, 24 नवंबर और 24 सितम्बर को भरतीय क्रान्तिकारियों ने लखनऊ में मार गिराया। 11 मार्च, 1858 को हाडसन भी लखनऊ में बेगम कोठी की लड़ाई में भून डाला गया। लखनऊ और अवध की लड़ाइयों ने अन्ग्रेज़ों को इतना भयभीत किया कि 1858 और 1947 तक, पूरे विश्व में जहां तक ब्रिटिश साम्राज्य फैला था, लखनऊ रेसिडेन्सी एक मात्र ऐसी जगह थी, जहां ब्रिटिश यूनियन जैक रात को फहरता था!
भरतीय जनमानस, एवं लखनऊ की जनता भी, इस बात को नही भूली। 1942 भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान, भारतीय स्वतन्त्रता सेनानियों ने लखनऊ रेसिडेन्सी, आलमबाग, और ला मार्टनियर कॉलेज में विरोध प्रदर्शन किया।
1947 में आज़ादी के पर्व पर, स्वतन्त्रता सेनानियों ने रेसिडेन्सी को नष्ट करने के लिहाज से घेर लिया था।  भारत में सबसे पहले, लखनऊ में ब्रिटिश अफसरों की मूर्तियां हटायी गईं। पर क्रूर ब्रिटिश अफसरों के कारनामो को उनके कब्रों पर दर्ज करने की कवायद नहीं हुई।
यह भरतीय राष्ट्रीय भावनाओं का अपमान नही तो और क्या है की आज भी ला मार्टिनियर कालेज में ‘हाडसन हाउस’ नाम से लड़कों की टीम है। और भरतीय सेना की चौथी घुड़सवार रेजीमेन्ट, जो अपने को हाडसन हॉर्स का वंशज मानती है, हर साल हाडसन की कब्र पर सलामी ठोकती है?
ला मार्टनियर कालेज में पढ़ रहे बच्चे, कुख्यात हाडसन, जो उनके पुरखों का कातिल है, को अच्छा इन्सान समझते हैं! साम्रज्यों का दौर खत्म हो चुका है। इक्कीसवीं सदी भारत, चीन, ब्राज़ील जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं और राष्ट्रों का दौर है।
राष्ट्रीय एकता एवं अपनी पहचान के लिये ये सभी देश औप निवेशिक काल के बोझ को उतार फेंक रही हैं। राष्ट्र निर्माण को अगले चरण मे ले जाने के लिये, भारत के पास 1857 जैसी अदभुत, एतिहासिक मिसाल है। अगर हमने ब्रिटिश-विदेशी दासता के प्रतिकों को बदल कर अपनी, सच्ची कहानी नही लिखी, तो अगली पीढ़ी हमे कभी माफ नही करेगी।

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Amaresh Mishra

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