राजनीती और धर्म का तो जेसे अब चोलीदामन का सा साथ हो गया है, और हो भी क्यूँ न हो मुद्दों की हकीकत को गायब करने के लिए धर्म राजनीति को ग्लूकोस जो देता है,और इसी इसी धर्म की राजनीति “कट्टर” हो जाती है और सारा खेल निपट जाता है | इससे और आगे बढ़े और इस चीज़ में “मुस्लिम वोट” और डाल दें तो बस कहानी क्या ही होगी |
राजनीति में धर्म और धर्म में राजनीति,फिर राजनीति में धर्म और धर्म में राजनीति बस यही घोल मिला कर पिला दिया गया है | भारत के मुसलमानों की बड़ी तादाद इसी के चक्कर फंसी हुइ है |अब जब मुस्लिम समाज के सामने राजनीति की बात होती है तो उसे उसमे “सच्चा पक्का मुसलमान” नेता चाहिए होता है | जो नफिल गुज़ार,सजदे का निशान माथे पर लिए और सर पर टोपी रखें हो वरना ये समाज उसे अपना नेता नही मानेंगा और इसी तरह जब बात धर्म की होती है उसमें राजनीति होती है | जहाँ पर भरपूर फिरका,ज़ात और ऊंच नीच आ जाती है ,और वो भी उस धर्म में जिसकी बुनियाद टू दा पॉइंट बात पर रखी गयी है अल्लाह,सुन्नत और क़ुरान के मैन पॉइंट्स पर लागू इस्लाम की अवधारणा में बिना वजह की और गैर जरूरी बात होती है,क्यों? कब से? कैसे? ये अलग विषय सही मगर इतना तय है कि इन दो चीजों के मिल जाने से दिक्कत बहुत हुई है |
असल में बात ये है कि इस समुदाय को “लॉलीपॉप” दिया जाता है,पहले तो प्रत्याशी के नाम पर जहाँ “अपना प्रत्याशी” वाली बात को रंग दिया जाता है | इससे आगे चल कर हुलिये पर बात आ जाती है ,जहाँ मुस्लिम होने पर “अरें ये तो मुसलमान है तुम्हारा भला करेगा” कह दिया जाता है,और अगर प्रत्याशी मुस्लिम नही है तो उसे टोपी,कुरता पहना कर इलाके के मुस्लिम लोगों को उसके स्टेज पर चढ़ाकर उस प्रत्याशी को “सेक्युलर” बनाया जाता है, मानो ये चुनाव न चल रहा हो सेक्युलर बनाने की फैक्ट्री हो,और फिर चुनाव में वोट लेने से लेकर जीतने तक का ये ड्रामा चलता है,और इस बीच में शिक्षा,स्वास्थ्य,सफाई,योजनाये और छात्रवृति से लेकर तमाम अहम चीजों का कही ज़िक्र नही आयेगा | बस एक मिथ सा बन जायेगा की सेक्युलर को वोट दो,या उसे वोट दो जो बीजेपी को हराओ के नाम पर वोट दो | लेकिन इसमें मुस्लिमों का क्या भला हुआ? मुस्लिमों को क्या हासिल हुआ? मुस्लिमों की दिक्कत खत्म हुई? नही हुई बिलकुल नही हुई क्योंकि ये समस्या है ही ऐसी जिसमे मुस्लिम समाज खुद फंस जाता है, और ऐसा होने के पीछे वजह है मुस्लिम समाज का अशिक्षित होना और इसी वजह से मुस्लिम समाज एक भारी “भीड़” की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है | इससे ज्यादा गौर करने की बात ये है की ये लगातार हर एक चुनाव में चल रहा है |
मुस्लिम समाज के उन बुद्धजीवी और सोशल मीडिया से लेकर अपनी गलियों में क्रांति लाने वाले और हाहाकर मचाने वाले लोगों को इस बात की समझ खुद भी लानी चाहिए,और आस पास के तमाम लोगों के देनी चाहिए की वोट धर्म के नाम और मुस्लिम के नाम पर नही बल्कि अपनी ज़रूरत के नाम पर दिया जाना चाहिए,क्योंकि विधायक और सांसद कोई भी हो हर प्रतिनिधि से अपना काम कराना उसका संवैधानिक हक़ है और ये बताना और जानना मुस्लिम समुदाय का हक़ है और इसकी ज़िम्मेदारी कम से कम उन लोगों की है जो मुस्लिम समुदाय के बुद्धजीवी और शिक्षित लोग है,और इसके अलावा सिर्फ बीजेपी को हराने के नाम पर वोट देने वाले और सेक्युलर से लेकर बीजेपी को हराने के कांसेप्ट से हटकर अपना वोट देना चाहिए,तब जाकर कुछ बेहतर और ज़रूरी चीज़े मुस्लिम समाज के सामने आ सकती है,वरना राजनीति में धर्म और धर्म में राजनीति आती जायगी और इसका सबसे ज्यादा नुकसान मुस्लिमों को होता जायगा और ये समाज,ये समुदाय ये कौम बहुत पीछे चली जायेगी,और जा भी रही है ,लेकिन बिना लोड लिए,बिना शोर मचाएं बेहतर और ज़रूरी प्रत्याशी को ही अपने इलाके के लिए चुनना ज़रूरी है और यही संवेधानिक काम भी है.

असद शैख़
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Asad Shaikh

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