संजलि को जलाए जाने की खबर में मैं कुछ भी लिखने से बच रही थी. मुझे मामला थोड़ा संदेहास्पद लग रहा था. क्योंकि परिवार की तरफ से जाति-एंगल या छेड़खानी को लेकर कोई बयान नहीं आया था. इसलिए मैंने इस मामले पर पुलिस की जांच का इंतजार किया. जब संजलि के ताऊ के बेटे ने आत्महत्या की तो मुझे और शक हुआ. मुझे लगा मामला घरेलू है. हो सकता है कि घर के लोग भी शामिल हों.

इस चक्कर में मैंने 1972 के मथुरा गैंग रेप केस के बारे में दोबारा पढ़ा और उस पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी पढ़ा. किस तरह मां-बाप अपनी बच्ची और उसके प्रेमी को सबक सिखाने थाने ले गए. उस थाने में बैठे पुलिसकर्मियों ने ही बच्ची का ही बलात्कार कर दिया. सेशन कोर्ट से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंचा और अंत में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि मथुरा को यौन संबंध बनाने की आदत थी और उसने रेप के दौरान कोई विरोध नहीं किया था. इस प्रकार पंद्रह साल की लड़की के साथ कानून ने गुनाह कर दिया बिना किसी पछतावे के.

उस केस में शुरू से लेकर अंत तक रेप कल्चर फैला था:

  1. परिवार वाले बेटी के अफेयर का पता चलते ही उसे ‘खराब चरित्र’ की मान बैठे और सबक सिखाने के लिए पुलिस के पास ले गए.
  2. पुलिस वालों को एक लड़की मिली जो प्रेम करने की अपनी चॉइस इस्तेमाल कर रही थी. रेप कल्चर पुलिस महकमे में भी था. दो पुलिसवालों ने मां-बाप को थाने के बाहर बिठा थाने में ही बच्ची का रेप कर दिया.
  3. फिर सुप्रीम कोर्ट के जज ने भी उसी रेप कल्चर की सोच के तहत उन दोषियों को छोड़ दिया और सारा ठीकरा लड़की पर फोड़ दिया.

ऐसे मामलों में ये तीनों संस्थाएं ही ‘रेप कल्चर’ का पालन पोषण करती हैं. जिसकी शुरुआत ही ‘पारिवारिक’ संस्था करती है. वहीँ से शुरू होकर यह धार्मिक और राजनीतिक रूप भी ले लेता है. फिर इसे तरीके से इस्तेमाल किया जाता है.

तो कह सकते हैं कि इस रेप कल्चर की शुरुआत घर से होती है. मैंने इतनी किताबें पढ़ीं, रेप और जलाए जाने के केस भी पढ़े. मेरी समझ कहती है कि अगर रेप कल्चर खत्म करना है तो इसे सामाजिक बुराई मानकर इसके निदान खोजे जाएं.

जो संस्था सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार है, वही इसे खत्म करने का इलाज भी है. रेप के मामलों के आंकड़े भी बताते हैं कि ज़्यादातर रेप पारिवारिक या करीबी लोग ही करते हैं.

लेकिन जैसे ही संजलि केस जैसा कोई घृणित मामला आता है, हम जाति, कपड़े और रात-देर रात खोजने लगते हैं. ऐसा ही इस केस में भी हुआ. लोगों ने सच्चाई जाने बगैर संजलि के आरोपियों की पहचान ऊँची जाति के लोगों में खोज ली. तुरंत आंदोलन खड़ा करने की कोशिश कर दी. जातीय भेदभाव से लड़ रहे लोग तुरंत जुड़ भी गए लेकिन जैसे ही अब मामला खुलने लगा है, आंदोलन कमजोर पड़ने लगेगा.