कल दिल्ली जाते हुए सोशल मीडिया से विवेक तिवारी की हत्या का समाचार मिला। ज्यादा जानकारी लेने के लिए एक अखबार की वेबसाइट पर गया तो वहां जाकर दिमाग सुन्न हो गया। खबर का कमेंट बॉक्स उन लोगों से भरा था, जो हत्या को सही ठहरा रहे थे। सोचने लगा कि ये कौन लोग हैं, जो एक निर्दोष की हत्या को सही बता रहे हैं? क्या कोई इंसान इतना नीच हो सकता है कि वह हत्या पर भी खुश हो और हत्यारों का महिमामंडन करे? हां, ऐसा हमने देखा है, ऐसा भी होता है।

अखलाक से लेकर रकबर के मामले तक में देखा है, जब हत्याओं को सही ठहराया गया। हत्यारों को महिमामंडन किया गया। लेकिन विवेक तिवारी न तो अखलाक था, न पहलू खान और न अकबर। वह जुनैद भी नहीं था। वह विवेक तिवारी था। उच्च मध्यम वर्ग से ताल्लुक रखने वाला शख्स। उसे मार दिया तो लोग उसे भी सही ठहराने लगे। इसका मतलब यह है कि लोगों की आत्मा और जमीर मर चुका है। वे मुर्दार लोग हैं। पत्थरदिल और बेहिस लोग।

दिल्ली पहुंचा और काम निबटाने के बाद एक दोस्त को फोन लगाया कि कहां हो? उसने कहा, प्रेस क्लब में हूं। वही आ जाएं। प्रेस क्लब पहुंचा। वहां अलीगढ़ में ‘लाइव एनकाउंटर’ में मारे गए नौशाद और मुस्तकीम के परिवार वाले आए हुए थे। परिवार ने रो-रोकर सब कुछ बताया। रिकॉर्ड करने के लिए मोबाइल फोन चालू किया, लेकिन फिर बंद कर दिया। सैकड़ों लोग रिकॉर्ड कर रहे हैं। कहीं न कहीं सुनने-देखने को मिल ही जाएगा। मिल भी रहा है सोशल मीडिया पर। ये तो पूरी उम्मीद थी कि मीडिया तो शायद ही कहानी दिखाए। मीडिया ने निराश भी नहीं किया।

नौशाद और मुस्तकीम की माँओं की चीत्कार अगर किसी को सुनाई नहीं दे रही है, तो फिर विवेक तिवारी भी मारा जाएगा। कल्पना तिवारी की चीत्कार पूरा देश सुन रहा है। क्या कल्पना तिवारी की चीत्कार में नौशाद और मुस्तकीम की मांओं की चीत्कार भी शामिल हो सकती है। शायद नहीं। हम अलग-अलग चीत्कार सुनते हैं। कल्पना तिवारी की अलग, नौशाद और मुस्तकीम के परिवार की अलग। यही वजह है कि विवेक तिवारी भी मारा जाता है, नौशाद और मुस्तकीम भी।

सत्ता जानती है कि हम ने लोगों को धर्मों और जातियों में इतना बांट दिया है कि सब अलग-अलग चीत्कार करेंगे। सत्ता नहीं चाहती कि सभी चीत्कारें एक स्वर हो जाएं। जिस दिन हो जाएंगी सत्ता हिल जाएगी।

नौशाद और मुस्तकीम के परिवारों पर कितना पुलिसिया कहर ढाया गया है, वह सुन लेंगे तो उन ब्रिटिशों को भी शर्म आ जाएगी, जिन्होंने हम पर 200 साल तक जुल्म किया। नौशाद और मुस्तकीम के शवों को ऐसे ही एक गड्ढा खोदकर दबा दिया गया।

परिवार ने मीडिया के सामने आरोप लगाया कि उन्हें दोनों की सूरत भी आखिरी बार नहीं देखने दी गई। घर से दोनों का पैन कार्ड, बैंक पास बुक, आधार कार्ड और यहां तक कि परिवार के पास जो थोड़े बहुत पैसे थे, वे भी छीन लिए गए। जब कुछ एक्टिविस्टों ने उनकी मदद करनी चाही तो पहले तो उन्हें बजरंग दल के गुंडों से पिटवाने की कोशिश की गई। बाद में उन पर नौशाद और मुस्तकीम की मां का अपहरण करने का केस दर्ज कर दिया गया।

मीडिया के सामने उमर खालिद ने किसी एक्टिंग जज से अलीगढ़ एनकाउंटर की जांच की मांग की है। अव्वल तो मांग पूरी नहीं होगी। अगर हो भी गई तो क्या किसी जांच आयोग की रिपोर्ट पर कभी कोई एक्शन लिया गया है आज तक? खासतौर से उन पर, जब पीड़ित अल्पसंख्यक समुदाय से ताल्लुक रखते हों?

चंद दिन बाद सब कुछ सामान्य हो जाएगा। लोग नौशाद और मुस्तकीम की हत्या को भूल जाएंगे। कल्पना तिवारी अच्छा खासा मुआवजा और नौकरी लेकर चुप हो जाएंगी। फिर कभी ऐसे ही कोई मारा जाएग तो फिर इन हत्याओं की याद आएगी। जैसे सन 2000 में मेरठ में मारी गई स्मिता भादुड़ी की हत्या को याद किया जा रहा है। मुझे देहरादून में हुई रणवीर की हत्या याद आ गई। कई एक्टिविस्ट भूली बिसरे हो जाएंगे।