इतिहास के पन्नो से

जब 1913 के आर्थिक संकट में भी नहीं डिगा था PNB

जब 1913 के आर्थिक संकट में भी नहीं डिगा था PNB

पंजाब नेशनल बैंक के भ्रष्ट अधिकारियों की वजह से हुए 11 हजार करोड़ से भी ज्यादा के घोटाले ने आम आदमी के विश्वास को तोड़ा है.इस बैंक का इतिहास काफी पुराना है. पंजाब नेशनल बैंक की स्थापना 19 मई 1894 को हुई थी.पंजाब नेशनल बैंक में सबसे पहला Account खोलने वाले व्यक्ति महान स्वतंत्रता सेनानी, लाला लाजपत राय थे. स्वाधीनता आंदोलन से उपजे इस बैंक में हुए घोटाले ने देश का स्वतंत्रता संग्राम लड़ने वाले क्रांतिकारियों की आत्मा को भी दुख पहुंचाया है.

स्वदेशी आंदोलन से पड़ी बैंक की नींव

बैंक का इतिहास जानकर हर किसी को फ़क्र होगा. 123 साल पुराने इस बैंक की स्थापना से जुड़ी कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है.1857 के स्वाधीनता संग्राम को 35 बरस हो चुके थे.स्वदेशी आंदोलन से जुड़े लोगों ने इस बैंक की नींव तब ही डाल दी थी, जब महात्मा गांधी जंग-ए-आजादी में नहीं कूदे थे.इस बैंक की स्थापना 1894 में हुई. सरदार दयाल सिंह मजीठिया, लाला हरकिशन लाल, लाला लाल चंद और लाला ढोलन दास इसके संस्थापक सदस्य थे.
इन लोगों ने पहले ही ये भांप लिया था कि अगर देश को आजादी के बाद तरक्की करनी है, तो उसे खुद के वित्तीय संसाधन खड़े करने होंगे.उस समय कई ब्रिटिश बैंक भारत में पैर पसार रहे थे, ये बैंक भारतीयों का पैसा जमा करके गाढ़ी कमाई कर रहे थे.भारतीयों के पास इस बैंक को खड़ा करने के अलावा कोई विकल्प नही था.
इसी सोच के साथ 123 साल पहले इस बैंक की नींव रखी गई थी. इन चारों के अलावा भारतीय स्वतंत्रता से जुड़े लाला लाजपत राय भी इस बैंक के साथ लंबे वक्त तक जुड़े रहे.वो ऐसे पहले शख्स थे, जिसने लाहौर के अनारकली इलाके में आर्य समाज मंदिर के पास खुले बैंक की पहली ब्रांच में कार्यालय में पहला खाता खोला. लाला लाजपत राय ने जहां बैंक में अपना खाता खोला तो वहीं बतौर मैनेजर उनके छोटे भाई ने बैंक की कमान संभाली.

देश के इन प्रधानमंत्रियों का भी था खाता

देश के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री और महात्मा गांधी ने भी इस बैंक में खाता खोला था. इसके अलावा जलियांवाला बाग कमेटी से जुड़े सदस्यों ने भी इस बैंक पर भरोसा जताया. धीरे-धीरे इसमें खाता खोलने वालों की संख्या और नाम भी बढ़ते गए.

लाहौर से हुई थी शुरुआत

12 अप्रैल 1895 को बैसाखी से ठीक एक दिन पहले बैंक को कारोबार के लिए खोल दिया गया. पहली बैठक में ही बैंक के मूल तत्वों को साफ कर दिया गया था. 14 शेयरधारकों और 7 निदेशकों ने बैंक के शेयरों का बहुत कम हिस्सा लिया. लाला लाजपत राय, दयाल सिंह मजीठिया, लाला हरकिशन लाल, लाला लालचंद, प्रभु दयाल और लाला ढोलना दास बैंक के शुरुआती दिनों में इसके मैनेजमेंट के साथ सक्रिय तौर पर जुड़े हुए थे.

देश का पहला स्वदेशी बैंक था PNB

पंजाब नेशनल बैंक सच्चे मायनों में पहला राष्ट्रीय और स्वदेशी बैंक था. हालांकि उससे पहले अवध कमर्शियल बैंक 1881 में खुल चुका था.मगर कुछ दशकों बाद 1958 में ये बंद हो गया.इस बीच पंजाब नेशनल बैंक धीरे-धीरे एक शहर से दूसरे शहर पहुंचता गया. पीएनबी की पहली ब्रांच 12 अप्रैल 1895 को लाहौर में खुली. अगले पांच सालों के भीतर ये सिंध और नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस तक पहुंच गया. इस बैंक के जरिए ही पंजाब में खुशहाली आई. जल्द ही ये बैंक देश के बाहर बर्मा पहुंच गया.
वर्ष 1913 में आर्थिक संकट की वजह से देश के 78 बैंक बर्बाद हो गए लेकिन पंजाब नेशनल बैंक का बाल भी बांका नहीं हुआ. उस वक्त पंजाब के Financial Commissioner रहे J H Maynard ने कहा था कि ‘पंजाब नेशनल बैंक इसलिए बर्बाद होने से बच गया क्योंकि इसका प्रबंधन बहुत अच्छा है.’ इसके बाद भारत के लोगों के मन में पंजाब नेशनल बैंक ने अपनी धाक जमा ली थी.

1943 में लाला योध राज ने संभाली कमान

1943 में लाला योध राज ने बैंक की कमान संभाली. इस वक्त देश उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था. बड़ी संख्या में पंजाबी द्वितीय विश्व युद्ध में लड़ रहे थे. यहां देश में आजादी की लड़ाई मुश्किल दौर में थी. आजादी की लड़ाई से जुड़े ज्यादातर कांग्रेसी जेल में बंद थे.विश्व युद्ध खत्म होने के बाद भारत अंग्रेजों की गुलामी से आजाद होने वाला था. मगर जाते-जाते अंग्रेजों ने देश का बंटवारा कर दिया.इसका पंजाब पर सबसे ज्यादा असर पड़ता.क्योंकि बंटवारे के बाद पंजाब का बड़ा हिस्सा भारत-पाकिस्तान के बीच बंटता.
ये बंटवारा पंजाबियों और इस प्रांत में रहने वाले हिंदुओं पर गहरा असर डालता. क्योंकि इस प्रांत की अर्थव्यवस्था की कमान इन्हीं के हाथों में थी. पंजाब नेशनल बैंक में ज्यादा खाते पंजाबियों और हिंदुओं के थे.ऐसे में इनकी पूंजी की बदौलत ही बैंक भी फला-फूला.
बंटवारे को देखते हुए उस वक्त पंजाब नेशनल बैंक की कमान संभालने वाले लाला योध राज ने बैंक का मुख्यालय पश्चिम पंजाब, जो पाकिस्तान के हिस्से में जाने वाला था. उसे आजादी से दो महीने पहले जून 1947 में दिल्ली के अंडर हिल रोड पर शिफ्ट कर दिया. जैसा शक था, बंटवारे के बाद बैंक का मुख्यालय,जोकि लाहौर में था, वो पाकिस्तान के हिस्से में चला गया.ऐसे में लाला योध राज ने मौके की नजाकत को भांपते हुए पहले ही पंजाब नेशनल बैंक की ज्यादा पूंजी भारत में भेज दी थी.

बंटवारे के बाद पाकिस्तान में बंद हुई 92 ब्रांच

बंटवारे के कुछ हफ्तों के भीतर ही पश्चिमी पाकिस्तान में पंजाब नेशनल बैंक की 92 शाखाएं बंद हो गईं. जोकि अविभाजित भारत में बैंक की कुल शाखाओं का 33 फ़ीसदी हिस्सा थी.बैंक की चालीस फ़ीसदी पूंजी बर्बाद हो गई. मगर इसके बाद भी बैंक कर्मचारियों और अफसरों ने देश को दोबारा खड़ा करने में दिन रात एक कर दिया.लाला योध राज ने भी ग्राहकों को विश्वास दिलाया कि उनका एक रुपया जाया नहीं जाएगा इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बंटवारे के बाद पाकिस्तान के हिस्से वाले पश्चिमी पंजाब से भारत आए एक-एक ग्राहक को बैंक ने उनका पैसा लौटाया.
इसके बाद धीरे-धीरे पंजाब नेशनल बैंक ने देश में अपनी जड़ें जमानी शुरू कर दी.धीरे-धीरे इस बैंक पर से पंजाबियों का नियंत्रण खत्म होने लगा और 1953 में ये बैंक पंजाबियों के हाथ से चला गया. लाल योध राज के हाथ से श्रियंस प्रसाद जैन के हाथ में पंजाब नेशनल बैंक के हाथों में कमान चली गई.
आज आज़ादी के सत्तर साल बाद यही बैंक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है.और देश के लोगों की गाढ़ी कमाई को नीरव मोदी जैसे बेईमान लोगों पर लुटाकर विदेशों में भेज रहा है.इस महाघोटाले से न सिर्फ इस बैंक की ऐतिहासिक विरासत पर दाग लगा,बल्कि इस बैंक को खड़ा करने में जिन पंजाबियों ने अपनी गाढ़ी कमाई लगाई उन्हें भी चोट पहुंचीं.

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Durgesh Dehriya

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