अदालतों द्वारा मुल्जिमों को बरी कर देना कोई अनोखी खबर नहीं है। आपराधिक मामलों में साज़याबी का प्रतिशत बहुत उत्साहजनक नहीं है। पर अनोखी बात यह है कि, समझौता एक्सप्रेस विस्फोट के मामले में असीमानन्द के मामले में एनआईए ने ऊपरी अदालत में अपील करने से मना कर दिया है । क्यों ? जबकि फैसला पढ़ने से साफ साफ यह दिख रहा है कि  सरकारी वकील ने उन महत्वपूर्ण सुबूतों को पेश नहीं किया जो मुक़दमे के फैसले में अहम हो सकते थे। उस फैसले और जज के स्ट्रिक्चर पर अलग से एक लेख होगा।

आपराधिक न्याय व्यवस्था में निचली अदालत के फैसले पर ऊपर की अदालत में अपील करने का एक वैधानिक प्राविधान है। पर सरकार का यह फैसला हैरान करने वाला है। लगता है कि एनआईए को जो दायित्व सौंपा गया था कि मुलजिम बचाओ उसे उसने अपनी तरफ से पूरा कर लिया है। अब अगर अपील होती है तो उसकी चाल खुल भी सकती है।

अगर सभी साक्ष्यों को प्रस्तुत और उसके परीक्षण तथा उस पर बहस के बाद मुलजिम बरी होते तो कोई बात नहीं है। पर जज ने फैसले में जो यह बात कही है कि महत्वपूर्ण सुबूत नहीं रखे गए यह अभियोजन और एनआईए की नीयत को ही संदिग्ध बना देते हैं। ऊपर से अपील न करने की सरकार की घोषणा ने तो सीधे मुलजिम छुड़ाने में मदद करने वाली एनआईए और अभियोजन को ही मुलजिम के कठघरे में खड़ा कर देती है।

यह एक्विटल अगर सही है तो फिर यह विस्फोट किया किसने था ? यह सवाल लोग पूछ रहे हैं। क्या कारण है कि महत्वपूर्ण और हाई प्रोफाइल मामलो में तफ्तीश जेसिका को किसी ने नहीं मारा की तर्ज़ पर अनसुलझी रह जाती है। यह तफ्तीश की कमी है, सुबूत नज़रअंदाज़ करने के कारण है या पहले से ही किसी निश्चित तयशुदा निष्कर्ष पर पहुंचने के कारण है ? यह पुलिस और एनआईए की विफलता तो है ही। पर सुबूत जानबूझकर अदालत तक नहीं पहुंचने देना यह नाकामी और प्रोफेशनल अक्षमता ही नहीं एक आपराधिक षडयंत्र है। यह अपराध है, अपराधी को बचाने का।

इसी असीमानन्द पर मक्का विस्फोट मामले में भी मुक़दमा चला था। वह उस मामले में भी मुल्जिम था। मक्का मस्जिद विस्फोट मामले में असीमानन्द ने अपना अपराध 164 सीआरपीसी के अंगर्गत स्वीकार भी कर लिया था। पर उस मामले में भी यह बरी हो गया। इस मामले में एक और हैरान करने वाली बात हुयी कि जिम जज साहब की अदालत में यह मुक़दमा चल रहा था उन्होंने इस मामले में मुल्जिमों को बरी करने के बाद ही त्यागपत्र दे दिया । अभियुक्त को बरी करना  फिर त्यागपत्र दे देना संशय को जन्म देता है। हालांकि चार दिन बाद जज साहब ने फिर से काम शुरू कर दिया। वे क्या कारण थे कि जज साहब ने त्यागपत्र दिया और फिर वे काम पर आ गये।

अदालतों से अभियुक्तों का बरी हो जाना एक गंभीर चूक समझी जाती है। इसकी जांच भी होती है और उन कारणों की पड़ताल कर के जिम्मेदारी भी तय की जाती है कि किसकी गलती से यह चूक हुयी है। फिर उसे दंडित तो किया ही जाता है, और एक मज़बूत अपील तैयार करके बड़ी अदालत में दोषमुक्ति के फैसले को चुनौती दी जाती है। पर यहाँ तो सरकार ने बेशर्मी से ही अपील करने से मना कर दिया। एक पुलिस अफसर होने के नाते मेरे लिये यह सचमुच ही हैरान करने वाला निर्णय है।

पिछले पांच सालों में आपराधिक न्याय व्यवस्था का एक और अनोखा ट्रेंड देखने को मिल रहा है। वह है उन मामलों में सरकार द्वारा अपील न करना जिनमे भाजपा और संघ के महत्वपूर्ण लोग मुलजिम है। अमित शाह के भी एक मामले में सरकार ने अपील करने से मना कर दिया और अब एनआईए का यह एक और ताज़ा मामला है। जज लोया का मामला तो अभी बॉम्बे हाईकोर्ट में चल ही रहा है। आपराधिक क्षवि के लोगों को लगभग सभी दल टिकट देते रहते हैं, पर अदालत में मुल्जिमों को बरी होने पर सरकार द्वारा अपील न करने की यह एक नयी परम्परा चल पड़ी है।

© विजय शंकर सिंह