विभिन्न राजनीतिक दलों में कार्यरत कार्यकर्ताओं को बहुजन दलों से जुड़े कार्यकर्ता बहुत ही हेय दृष्टि से देखते है. उनके प्रति भयानक हिकारत का भाव दिखलाई पड़ता है,ये लोग अपने ही समुदाय में उपेक्षित और अत्यधिक गरियाये हुये नजर आते है.

इनके लिए विशेषणात्मक सम्बोधन भी सुनाई पड़ते है,ये विशेषण लिखे और बोले भी जाते है,ऐसा बोलना क्रांतिकारी होने का परिचायक भी होता है,इसलिए बार बार चीख चीख कर ऐसा बोलना ,लिखना किया जाता है.

आपने भी जरूर ये शब्द सुने होंगे ,हालांकि अब जो लोग इनका उपयोग उपभोग कर रहे है,यह इनकी मौलिक समझ से निकले हुए नहीं है,कुछ तो किताबी ज्ञान है और कुछ दृश्य श्रव्य माध्यमों की मेहरबानी है कि कुछ वाक्य रट लिए ,जिन्हें तोते की तरह रटते रहते हैं.

इन बहुप्रचलित शब्दों को मैं यहां लिखता हूँ – चमचे, पालतू तीतर, भड़वे,दलाल,गद्दार,तलवे चाटू, गुलाम आदि इत्यादि. ये उपमाएं हैं जो हम अपने समाज के राजनीतिक कार्यकर्ता के लिये इस्तेमाल करना गर्व की बात समझते है.

क्या यह शब्दावली उचित है,आप कहेंगे कि क्यों नहीं? यह तो बाबा साहब या मान्यवर ने अपनी फलां फलां किताब में इस्तेमाल की थी,फिर हम क्यों न करें? हम तो करेंगे ही, लगभग यही तोता रटन्त जवाब दिया जाता है.

यह अजीब विडम्बना ही है कि हम लोकतंत्र की बात खूब करते है, संविधान की दुहाई भी देते है, पर उस पर चलते नहीं है,शायद हमारा भरोसा भी नहीं है लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर, शायद हम कबीलाई सोच के साथ आगे बढ़ना चाहते है, पर डेमोक्रेसी की बात करते हुए.

यह दोगलापन है, यह हमारे अलोकतांत्रिक होने का संकेत है,यह बताता है कि हमारे डेमोक्रेटाईजेशन का प्रोसेस पूरा नहीं हुआ है, वरना हम अपने राजनीतिक वर्कर को इस भांति नहीं गरियाते, विभिन्न दल संविधान के दायरे में बनते है, संवैधानिक लिमिटेशन में रहकर ही वे चुनाव भी लड़ते है और सत्ता संभालते है, उनकी विचारधारा से सहमत या असहमत हुआ जा सकते है, पर सियासी कार्यकर्ताओं को भड़वे,दलाल,पालतू तीतर ,चमचे कहकर गाली देते रहना कहाँ तक उचित है.

गाली देना हमारे असभ्य और अलोकतांत्रिक होने की निशानी तो है ही,साथ ही हमारी राजनीतिक नासमझी को भी दर्शाती है. हमें अपने लोकतांत्रिकरण की प्रक्रिया को तेज करना होगा, संवैधानिक व्यवस्था में कईं दल होंगे, कईं विचारधाराएं भी होगी,उनमें कार्यकर्ता भी होंगे, एक ही परिवार या समुदाय से भी लोग लेफ्ट,राईट, सेंटर सब तरफ होंगे,इसका मतलब यह नहीं है कि जो हमारी पार्टी में नहीं है,वो सभी गद्दार ,भड़वे ,चमचे और पालतू तीतर है.

लोकतंत्र के मूल मर्म को समझना जरूरी है, आखिर लोकतंत्र है क्या? एक कॉमनसेंस ही तो? अगर हमारी सहज समझ ही गड़बड़ है, अनडेमोक्रेटिक है तो हम संविधान के पहरुए नही हो सकते है. चूंकि भारत में अभी तक केवल राजनीतिक लोकतंत्र आया है, आर्थिक, सामाजिक व व्यक्तिगत जीवन का लोकतांत्रिकरण बाकी है, इसलिए इस प्रकार का गाली गलौज किया जाना बड़ा क्रांतिकारी काम मान लिया जाता है.

हमें अपनी भाषा और भावों पर ध्यान देना होगा कि कहीं हम संविधान व लोकतंत्र को खत्म करने की दिशा में तो अग्रसर नहीं है. सोचियेगा जरूर ,कड़वी दवाई है,पर लेनी पड़ेगी.

-भंवर मेघवंशी
( संपादक – शून्यकाल )
नोट – यह लेख लेखक की फ़ेसबुक वाल से लिया गया है