October 26, 2020
विचार स्तम्भ

ये किस दौर में चले आये हैं हम ?

ये किस दौर में चले आये हैं हम ?

समय बीत जाने के बाद कहा जाता है कि एक दौर था जब ऐसा होता था , एक दौर था जब भाई भाई के लिए जान कुर्बान कर देता था. एक दौर था जब दोस्त दोस्त के लिए जान दे देता था उसी तरह आज का दौर है जो आने वाले दौर में काले अक्षरों से लिखा जाएगा क्योंकि. इस दौर में हम भूल गए है कि हम इंसान है और इसकी वजह हम सब ही है कोई दूसरा नही.
आज एक लड़की अपने जीजा के साथ अपने आप को सहज महसूस नही करती है जब कि ये रिश्ता किसी दौर में भाई बहन का हुवा करता था. लेकिन आज हमारी गन्दी मानसिकता ने इसे कलंकित कर दिया है,आज कोई लड़की अपने चाचा के साथ अपने आप को सेफ़ नही रख पाती है. किसी दौर में चाचा भतीजी की रिश्ता बाप बेटी का रिश्ता हुवा करता था. आज एक महिला अपने किसी रिश्तेदार के साथ सेफ़ नही है, जबकि वो रिश्ते किसी दौर में सेफ़्टी का प्रमाण हुवा करते है. लेकिन इस दौर में वो सब रिश्ते सिर्फ एक हवसी दरिन्दे बन कर रह गए है, जिस देश मे महिलाओं को पूजा जाता था, आज उसी देश मे महिलाओ को कुचलने का काम आम बात हो गयी है.
कोई आदमी कभी जुएँ में अपनीं पत्नी को हार जाता है, तो कोई चंद पैसों के लिए अपने ही समाज की अपनी बेटी जैसी किसी गरीब की बेटी को बाज़ार में बेच देता है. जिसके ज़िम्मेदार हम सब है, आज किसी जब सरे बाजार किसी महिला की इज़्ज़त को तार तार कर दिया जाता है, तो उसे हम अपने मोबाइलों में वीडियो बनाते है. ताकि हम दोस्तो को दिखा कर हंस सके और उसका मजाक बना सकें लेकिन उसकी मदद को आगे नही आते है क्योंकि हमारी निगाह में वो सिर्फ एक खेलने की वस्तु बन कर रह गयी है. अब वो हमारी देवी नही रही अब वो हमारी मां नही रही.  अब कोई महिला हमारी मां नही बन सकती है, सिवाए हमारे मनोरंजन के अब वो तो सिर्फ हमारे लिए एक मनोरंजन का वस्तु है.
आज एक भाई अपने भाई का खून बहाने में कोई देरी नही करता है वो चाहे पैसे के लिए हो या किसी ज़र जायजाद के लिए हो खून बहाने में वक़्त नही लगाता है.
जबकि किसी दौर में एक भाई की मदद के लिए दूसरा भाई अपनी ज़िंदगी दांव पर लगा दिया करता था अपनी चाहतो को खत्म कर दिया करता था अपना सबकुछ छोड़ दिया करता था. जब राम को वनवास मिला तब लक्ष्मण ने अपनी मर्ज़ी से अपने भाई के साथ जंगल बसा लिया, जबकि वनवास तो सिर्फ राम को मिला था लक्ष्मण को नही आज उसी भारत में एक भाई अपने भाई को चंद पैसों के लिए कत्ल कर देता है जो सिर्फ इस दौर में होता है किसी और दौर में नही हुआ.
आज हम धर्म के नाम पर ख़ून बहाने के लिए उत्सुक रहते है जबकि हम धार्मिक है ही नही, मेरा कोई धर्म ही नही है और न ही हम किसी धर्म के है. हम तो सिर्फ किसी की बातों में आकर इंसानियत का खून कर देते है क्योंकि हमने ग्रन्थों को पढा ही नही है,और पढ़ भी लिया तो समझे ही नही है. रामायण संस्कृत में है और आज कितने स्कूल है जिनमे संस्कृत पढाई और समझाई जाती है और इस पर कितना ज़ोर दिया जाता है. ये किसी से छुपा नही है क़ुरान अरबी में है और आज कितने स्कूलो मे अरबी पढ़ाई जाती है. ये सारी दुनिया के सामने है जिन मदरसों में अरबी पढ़ाई जाती है. उनमें कुछ और नही पढ़ाया जाता है, मतलब अगर अरबी पढ़ने के चाह में मदरसे में नाम लिखा लिया तो समाज की औऱ बातो से दूर हो जाओगे फिर तुम्हें विज्ञान की जानकारी नही होगी, गणित की जानकरी नही होगी,इतिहास की जानकारी नही होगी, इस लिए एक तबका ऐसा भी है जो मदरसे से भागता है ताकि उसे समाज के साथ चलने में आसानी हो लेकिन उस रास्ते पे जाते ही वो धर्म से दूर हो जाता है जो उसे इंसानियत का सबक देता किसी भी रामायण गीता में क़ुरान बाइबिल में हमे ये नही मिलता है, कि अपने फायदे के लिए दूसरे का गला काट दो दूसरे का नुकसान कर दो दूसरे का घर जला दो. लेकिन ये सब आज हम करते है, क्योंकि हम धार्मिक नाम की बीमारी से ग्रस्त हो चुके है.
आज राजनीति का स्तर इतना नीचे गिर गया है कि उसके लिए इस कलयुग में भी कोई शब्द नही बना है जिससे उसको पुकारा जा सके राजनीति में एक छोटे से पद के लिए हम सारी हदो को पार कर जाते है कभी अपने भाई की बलि देते है कभी अपनी माँ को गाली देते है. तो कभी अपने बाप को बेघर कर देते है क्योंकिं किसी भी हाल में हमे राजनीति में बने रहना है देश के सरवोच्च आसन पर होने के बाद भी जब हमे ये लगता है कि मेरी कुर्सी के कोई कील ढीली हो रही है तो हम उसके खतिर इंसानियत की बलि दे देते है. जिससे हमारी कुर्सी मज़बूत हो जाये हम इलेक्शन जीतने के खातिर पैसा फेकते है उसके बाद भी बात न बनने पर दंगे करवा देते है. जिसमे इज़्ज़त लुटने से लेकर मासूम बच्चों का बेरहमी से कत्लेआम है.
जिसे हम नाम देते है . धार्मिक गुटों की लड़ाई… क्या सच मे ये धार्मिक गुटों की लड़ाई होती है किस धर्म मे लिखा है की किसी का घर जला दो जो दिन भर कठिन से कठिन परिश्रम करके रात को एक वक्त की रोटी खा पाते है सबसे ज़्यादा नुकसान इनका ही होता है क्योंकि अमीरों के घर घास फूस के नही बने होते है और उनके घरों में सुरक्षाकर्मी भी तैनात रहते है जो देखते ही गोली भी मार देते है .उन महिलाओ को सरे बाजार निर्वस्त्र कर दिया जाता है जो कई दिन पेट काट के अपने शरीर को ढकती हम उनको निर्वस्त्र करने में एक पल नही लगते है क्योंकि ये हमारे पास एक सुनहरे मौके की तरह है जो जिसमे हमारा नाम भी नही आएगा.
हद तो तब होती है जब हम मासूम बच्चों को काट देते है ज़िंदा जला देते है तो कभीं हवा में उछाल देते है लेकिन पूछो उस अपनी माँ से उस देवी से जो तुमको ज़रा से चोट लगने पर पागल हो जाया करती थी आज उसी मां के सामने तुम उसके बच्चे को किस तरह हैवानियत से मार रहे हो क्योंकि तुम्हारे सर पर नाश चढ़ा है तुम्हारी आंखों पर पट्टी बंधी है धर्म नामक एक ऐसे वहशी दरिन्दे की जो सबकुछ बर्बाद कर देना चाहता है जिसे आज की आम भाषा मे राजनीति भी कहा जाता है.

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Sayed Ahtisham Rizvi

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