भाजपा अर्नब गोस्वामी के साथ आज खुल कर आ गयी है। गृहमंत्री सहित कई मंत्री खुल कर अर्नब के पक्ष में बयान दे रहे है। अर्नब और भाजपा में जो वैचारिक एकता है, उसे देखते हुए भाजपा के इस रवैये पर किसी को आश्चर्य नही होना चाहिए। अर्नब की पत्रकारिता सरकार और सत्तारूढ़ दल की पक्षधर होती है। यह कोई आपत्तिजनक बात नही है। पक्ष चुनने का अधिकार अर्नब को भी उतना ही है जितना मुझे या किसी अन्य को। अर्नब ने उनके लिये इतनी चीख पुकार मचाई और एजेंडे तय किये हैं तो, उनका भी यह फ़र्ज़ बनता है कि वे अर्नब के पक्ष में खड़े हों। और वे खड़े हैं भी ।

लेकिन आश्चर्य यह है कि नैतिकता और चारित्रिक शुचिता को अपने एजेंडे में सबसे ऊपर रखने वाले भाजपा के मित्र आखिर किस मजबूरी में, कठुआ रेप कांड से लेकर, शंभु रैगर, आसाराम, हाथरस गैंगरेप, बलिया के हालिया हत्याकांड सहित अन्य बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमे वे अभियुक्तों के साथ, पूरी गर्मजोशी से खुल कर उनके समर्थन में आ जाते हैं ? राष्ट्रवादी होने और हिंदुत्व की ध्वजा फहराने के लिये यह ज़रूरी तो नहीं कि जघन्य अपराधों के अभियुक्तों के साथ उनके समर्थन में बेशर्मी से एकजुटता दिखाई जाय ? आज अगर वे, पत्रकारिता की आड़ में, अन्वय नायक का पैसा दबाने वाले अर्नब के पक्ष में खड़े हैं तो आश्चर्य किस बात का है ? यह उनका चाल, चरित्र और चेहरा है और यही पार्टी विद अ डिफरेंस का दर्शन !

भाजपा अगर अर्नब के पक्ष में लामबंद है तो यह राह चुनने का उसका अपना निर्णय है, इस पर मुझे कोई टिप्पणी नहीं करनी है। लेकिन इस सारे शोर शराबे में वह असल मुद्दा गुम है जो अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी का मूल काऱण है। यह मुद्दा है, अन्वय नायक जो एक इंटीरियर डिजाइनर थे, को उनके बकाया पैसे मिले या नही। अन्वय नाइक ने अर्नब के स्टूडियो की इंटिरियर डिजाइनिंग की थी और उनका अच्छा खासा पैसा बकाया था और अब भी है। अगर अर्नब ने सभी बकाया पैसे का भुगतान उक्त अर्चिटेक्ट को कर दिया है और इसके सुबूत अर्नब के पास हैं, तब तो सुसाइड नोट पर सन्देह उपजता है और अर्नब के गिरफ्तारी की कोई ज़रूरत फिलहाल नहीं थी। लेकिन अभी पूरा पैसा अर्नब ने नहीं दिया है तब, सुसाइड नोट का महत्व बढ़ जाता है और आत्महत्या का मोटिव स्पष्ट हो जाता है।

अब यह सवाल उठता है कि, पैसा दिलाने का अधिकार पुलिस को कानून की किस धारा में है ? इसका उत्तर है पुलिस के पास क़ानूनन ऐसी शक्तियां बहुत ही कम हैं कि वह किसी का डूबा हुआ पैसा वसूल या निकलवा सके । लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि अक्सर थानों में ऐसी शिकायतें आती रहती हैं कि किसी ने काम करा कर पैसा दबा लिया या किसी ने काम करा कर एक ढेला भी नही दिया। आज जब मैं सेवानिवृत्त हो चुका हूं, तब भी अक्सर जान पहचान वालो के इस आशय के फोन आते हैं और इसकी सिफारिश में यह जानते हुए भी कि, पुलिस के पास विकल्प बहुत ही कम है, मैं अक्सर थानों में फोन कर देता हूँ। कभी किसी के डूबे धन का कुछ अंश मिल जाता है तो कभी पूरा धन ही डूब जाता है।

पैसे दबा लेने और ले कर मुकर जाने की शिकायते सिविल प्रकृति की मानी जाती हैं और यह दो व्यक्तियों के बीच की आपसी समझ या कॉन्ट्रैक्ट या लेनदारी देनदारी मानी जाती है, जिंसमे हस्तक्षेप करने की पुलिस के पास कोई वैधानिक शक्ति नही होती है, इसलिए पुलिस ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करने से बचती है। पर जब कहीं से सिफारिश आती है या दबाव पड़ता है तो दोनो पक्षो को बुला कर उन्हें समझा बुझा या हड़का कर मामले को सुलझाने की कोशिश की जाती है। कभी कभी मामले सुलझ जाते हैं तो कभी कभी मामले बिना तय हुए ही रह जाते हैं। कानून में धारा 406 आइपीसी, अमानत में खयानत का एक प्राविधान ज़रूर है, पर वह बेहद कमजोर है। अतः इस मामले में समझौता कराने की सारी प्रक्रिया कानूनन कम, बल्कि व्यवहारतः ही हल की जाती है।

अब इस मामले में, पत्रकारिता के तमाम नैतिक मूल्यों और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बहस तो हो रही है पर इस पर कोई बात नहीं कर रहा है कि अन्वय नाइक के बिल का भुगतान हुआ था या नहीं ? आत्महत्या का मोटिव ही यह है कि अन्वय नाइक को तमाम तकादे के बाद भी पैसा नहीं मिला, और जिसकी इतनी बड़ी रकम डूब रही होगी वह या तो रक़म हड़पने वाले की जान ले लेगा या अपनी जान दे देगा। यहां उसने अपनी जान दे दी और जो सुसाइड नोट उसने छोड़ा, उसमे अर्नब पर देनदारी की बात लिखी है। अब यह अर्नब के ऊपर है कि वह यह साबित करें कि उनपर देनदारी का इल्जाम गलत है और वे उक्त आर्किटेक्ट का पूरा भुगतान कर चुके हैं।

अब यह कहा जा रहा है कि 2018 में पुलिस ने इस केस में फाइनल रिपोर्ट लगा दी थी। हो सकता है तब सुबूत न मिले हों या सुबूतों को ढूंढा ही नहीं गया हो, या सुबूतों की अनदेखी कर दी गयी हो, या हर हालत में अर्नब गोस्वामी के पक्ष में ही इस मुकदमे को खत्म करने का कोई दबाव रहा हो। महत्वपूर्ण लोगो से जुडे मामलो मे, समय, परिस्थितियों और उनके संपर्को के अनुसार, मामले को निपटाने का दबाव पुलिस पर पड़ता रहता है और यह असामान्य भी नही है।

अर्नब एक महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं ही, इसमे तो कोई सन्देह नही है। आज उनकी गिरफ्तारी को लेकर गृहमंत्री से लेकर अन्य मंत्रियों सहित तमाम भाजपा के नेता लामबंद हो गए हैं, तो क्या कल जब महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार थी तो, सरकार का दबाव, पुलिस पर, अर्नब के पक्ष में, मुकदमा निपटाने और फाइनल रिपोर्ट लगाने के लिये नहीं पड़ा होगा ? जो देवेंद्र फडणवीस आज अर्नब के पक्ष में खड़े हैं, धड़ाधड़ ट्वीट कर रहे हैं, क्या जब वे मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने इस मामले में रुचि नहीं ली होगी ? इसे समझना कोई रॉकेट विज्ञान नही है।

अब यह सवाल उठ रहा है कि फाइनल रिपोर्ट की स्वीकृति के बाद सीआइडी को दुबारा तफतीश करने का अधिकार नही है। इस पर अर्नब के वकील का कहना है कि अनुमति नही ली गयी जब कि सरकारी वकील का कहना है कि सारी कार्यवाही विधिनुकूल की गयी है। यह मुकदमा हाईकोर्ट में गया है, जिसकी सुनवायी कल दोपहर के बाद होगी। क्या होता है यह तो कल ही बताया जा सकेगा। लेकिन एक बात मैं महसूस कर रहा हूँ अन्वय नाइक जिनकी एक बडी रक़म फंसी है और जो उनकी मृत्यु का कारण बनी, के हिसाब किताब को साफ करने की कोई बात नहीं हो रही है और बहस पत्रकारिता के मूल्यों पर हो रही है जिसके मापदंड सबके अलग अलग हैं।

( विजय शंकर सिंह )

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Vijay Shanker Singh