अब यह साफ हो चुका है कि अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी पत्रकारिता के लिए नहीं, अपना स्टूडियो बनाने वाले इंटीरियर डिजाइनर के पैसे नहीं देने और उसके आत्महत्या कर लेने के मामले में हुई है। यह भी साफ हो चुका है कि केंद्र सरकार के जो मंत्री अर्नब के साथ मुंबई पुलिस की कथित ज्यादती का रोना रो रहे हैं वे पत्रकारिता के कई मामलों में चुप रहे हैं और ऐसे नेताओं में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी हैं जिनका अपना रिकार्ड पत्रकारिता के मामले में बहुत बुरा है?

सवाल उठता है कि देश में जब अपराध के मामले में पत्रकार गिरफ्तार होते रहे हैं तो इस एक मामले में केंद्रीय मंत्रियों को इतनी तकलीफ क्यों हुई कि अमूमन रीट्वीट करने वाले केंद्रीय मंत्री मौलिक ट्वीट भी करने लगे। अभी मैं ट्वीट की मौलिकता और योग्यता पर नहीं जाउंगा लेकिन यह सवाल जरूर उठाउंगा कि क्या केंद्र सरकार इसे किसी खतरे या चुनौती के रूप में देखती है? अगर आप पुराने मामले जानते हैं, स्थितियों को समझते हैं तो सब कुछ बिल्कुल साफ है।

अर्नब की गिरफ्तारी दरअसल केंद्र की सत्ता को चुनौती है। बिल्कुल सीधी और एकदम साफ। मैं नहीं जानता कि अभी तक अर्नब जिस किस्म की पत्रकारिता कर रहा था उसके लिए उससे कहा गया था कि नहीं और किन शर्तों पर कर रहा था या बिना शर्त मालिक के आदेश पर भौंकने वाली पत्रकारिता कर रहा था। पर निश्चत रूप से वह पालतू कुत्ते की तरह आदेश पाकर भौंकता लग रहा था। कार्रवाई तो कोई भी कर सकता था पर हिम्मत दिखाई है महाराष्ट्र की शिवसेना और कांग्रेस की सरकार ने। कहने की जरूरत नहीं है कि हर तरह की राजनीति में दोनों पार्टियां मिलकर भाजपा से आगे हैं।

कार्रवाई के बाद जिस ढंग से लोग बचाव में उतरे हैं वह दरअसल अर्नब का नहीं, भाजपा की राजनीति का बचाव है और यह साफ होता लग रहा है कि भाजपा जैसी राजनीति शिवसेना कर सकती है, कर रही है और भाजपा से ज्यादा अच्छे से या खुल्लम खुल्ला कर सकती है। और यही भाजपा समर्थकों की चिन्ता का मुख्य कारण है। इस गिरफ्तारी से यह साफ हो गया है कि अर्नब को बचाया गया था। उसके खिलाफ मामला बहुत साफ है। निराधार नहीं है और परिस्थितिजन्य साक्ष्य पहली नजर में उसे दोषी बताते हैं और निर्दोष होने का सबूत अगर होता तो बहुत आसान था कि भुगतान की रसीद दिखा दी जाती या यही साबित कर दिया जाता कि आत्महत्या करने वाले से काम कराया ही नहीं गया। दोनों संभव है पर ऐसा नहीं किए जाने से आरोप में दम लगता है।

अब सवाल है कि जांच बंद क्यों हो गई थी? और बंद हो गई थी तो अर्नब किसके दम पर सुशांत सिंह राजपूत के मामले में पुलिस को दिशा निर्देश दे रहा था? क्या कोई अपराधी पुलिस से इस तरह पंगा लेगा? आमतौर पर नहीं लेकिन पंगा लिया गया है तो कारण यही हो सकता है कि उसे क्लोजर रिपोर्ट पर भरोसा हो, अदालत से राहत मिलने की उम्मीद हो या फिर यही भरोसा हो कि भाजपा की सरकार गिर जाएगी। जो स्थितियां और जैसी राजनीति चल रही है उसमें कोई भी संभावना हो सकती है।

ऐसे में सत्य सामने आए इसके लिए जरूरी है कि इस बात की भी जांच हो कि अर्नब का मामला बंद कैसे हो गया। क्या जांच हुई और क्या मामला है। निश्चित रूप से इससे महाराष्ट्र पुलिस और सरकार की कार्यप्रणाली उजागर होगी और यह जरूरी है। संभव है कि इससे यह निकले कि महाराष्ट्र सरकार अर्नब को लक्ष्य बनाकर काम कर रही है पर अर्नब का मामला क्या है वह भी तो साफ हो। यह इसलिए भी जरूरी है कि देश की राजनीति को हिलाकर और पटरी से उतारकर रख देने वाला जज लोया का मामला भी महाराष्ट्र पुलिस से जुड़ा है।

एक तरफ अर्नब का मामला बिना जांच बंद कर दिया गया लगता है और दूसरी तरफ भारी मांग तथा शंकाओं और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के बावजूद जज लोया की मौत की जांच नहीं हुई। उसे रुकवाने के लिए भारी व्यवस्था की गई। ताकत लगाई गई पैसे खर्च किए गए आदि आदि। महाराष्ट्र की भाजपा सरकार ने अगर जांच नहीं होने दी या करवाई तो शिव सेना की सरकार जज लोया की मौत की जांच करवा सकती है और घबराहट इससे भी है। जज लोया की मौत के मामले में संदिग्ध पहलुओं की कमी नहीं है। उसका वर्णन एक पूरी किताब में ही हो सकता है।

जहां तक इंटीरियर डिजाइनर के पैसे नहीं देने और आत्महत्या कर लेने का मामला है – भाजपा की सरकारों में यह कोई नया नहीं है। सरकार विरोधियों के खिलाफ तो ईडी, सीबीआई सब लगा दी जाती है पर सरकार समर्थकों को हर तरह से संरक्षण मिलता है। वह चाहे बलात्कारी हो तेल मालिश कराने वाला पूर्व गृहमंत्री। ऐसे में पत्रकारिता के नाम पर किसी के पैसे हड़प जाने वाले के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई यह मुद्दा ही नहीं है जबकि मुख्य मुद्दा यही था। बोफर्स में भ्रष्टाचार हुआ बाकी मनमोहन सिंह की सरकार भ्रष्ट थी पर कुछ मिला नहीं, साबित नहीं हुआ। भाजपा राज में सब दिख रहा है, वीडियो है पर सब ठीक है।

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Sanjaya Kumar Singh