मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सरकार के राजस्व संग्रह में लगातार कमी आ रही है। हर महीने होने वाला जीएसटी कर संग्रह अनुमान के अनुसार कम हो रहा है। सभी आर्थिक सूचकांक गिरावट और बेरोजगारी, भुखमरी, बैंकिंग घोटाले, बैंकों के एनपीए के आंकड़े वृध्दि की ओर हैं। राजस्व संग्रह में आई कमी के चलते केंद्र सरकार जल्द ही भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से वित्तीय मदद मांगने की तैयारी में है। यह पहली बार नहीं हो रहा है। पहले भी सरकार आरबीआई से पैसा मांग चुकी है। अपनी सरकारी कम्पनियां तो बेच ही रही है, सेबी SEBI से धन मांगने के फिराक में हैं। आर्थिक मंदी के चलते केंद्र सरकार जल्द यह कदम उठाने जा रही है। यह मदद सरकार आरबीआई से अंतरिम लाभांश के तौर पर लेगी।

आरबीआई ने हाल ही में सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपये का लाभांश देना स्वीकृत किया था। इसमें से 1.48 लाख करोड़ रुपये चालू वित्त वर्ष के लिए दिया गया था। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार आरबीआई को पिछले वित्तीय वर्ष में 1.23 लाख करोड़ रुपये की कमाई हुई थी। आरबीआई को ज्यादातर लाभ करेंसी की ट्रेडिंग और सरकारी बॉन्ड से होता है। इसका कुछ हिस्सा आरबीआई अपने परिचालन और आपात निधि के तौर पर रखती है। बाकी का लाभ सरकार के पास लाभांश के तौर पर चला जाता है।  इसलिए सरकार चाहती है कि आरबीआई उसकी लाभांश की मांग को समझे, क्योंकि इस वित्त वर्ष में आर्थिक सुस्ती के चलते विकास दर 11 साल के सबसे निचले स्तर (पांच फीसदी) रह सकती है। सरकार पर अभी भी 35 से 45 हजार करोड़ रुपये का बकाया है, जिसका उसे भुगतान करना है। ऐसे में आरबीआई से मिली वित्तीय मदद से सरकार को राहत मिल सकती है।

अगर आरबीआई केंद्र सरकार की मांग को मान लेती है, तो फिर यह लगातार तीसरा साल होगा, जब सरकार के पास अंतरिम लाभांश आएगा। हालांकि आरबीआई के कुछ अधिकारी सरकार को यह लाभांश देने का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि इससे कई मोर्चों पर केंद्रीय बैंक को दिक्कत आ सकती है। हालांकि आरबीआई के बोर्ड में सरकार की तरफ से काफी सदस्य होने के कारण ऐसी मंजूरी मिलने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।  सरकार के राजस्व में 19.6 लाख करोड़ की कमी सरकार को चालू वित्त वर्ष में करीब 19.6 लाख करोड़ रुपये राजस्व की कमी हुई है। आर्थिक सुस्ती के अलावा कॉर्पोरेट करों में कमी का असर देखने को मिला है। इससे राजस्व में करीब 34-37 फीसदी की कमी है, जिसको लाभांश मिलने के बाद 25 फीसदी तक लाया जा सकता है।

सरकार ने अपने विवादित पोलिटिकल एजेंडे के चलते अर्थव्यवस्था क्षेत्र में मिल रही चुनौतियों को लगभग नज़रअंदाज़ कर दिया है। यह सारी दिक्कतें 2016 में लिए गए नोटबंदी के फैसले के बाद शुरू हुई है। 11 साल में सबसे कम विकास दर कैसे 5 ट्रिलियन आर्थिकी की ओर हमें ले जाएगा यह केवल प्रधानमंत्री और उनके वित्तमंत्री समझ रहे हों तो समझें, पर कोई भी अर्थशास्त्री इस दिवास्वप्न को समझ नहीं पा रहा है। देश की आंतरिक कानून व्यवस्था दिनोदिन बिगड़ रही है। युवा, किसान, मजदूर, चाहे वे संगठित क्षेत्र के हों या असंगठित क्षेत्र के, सरकारी कर्मचारी सभी उद्वेलित और आक्रोशित है। रोजी रोटी शिक्षा स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे को छोड़ कर फ़र्ज़ी राष्ट्रवाद के मुद्दों के बहाने समाज मे दरार पैदा करने से बड़ा कोई देशविरोधी कृत्य और नहीं है। असफोस, इसमें सरकार और सत्तारूढ़ दल, दोनों ही मुब्तिला हैं। मैं इसी विपन्नता से आज़ादी के पक्ष में हूँ। आप की आप जानें।

आर्थिक मंदी के सरकारी स्वीकारोक्ति के इस दौर में यह खबर हैरान करने वाली है कि जब देश की सकल आय दर जीडीपी लगातार गिर रही है तो सत्तारूढ़ दल #भाजपा की सकल आय दर लगातार कैसे और क्यों बढ़ रही है । सरकार को टैक्स कम मिल रहा है, और भाजपा को चंदा अधिक मिल रहा है। क्यों और कैसे ? सरकार को चाहिए कि वह सभी राजनीतिक दलों की आय, एलेक्टोरेल बांड से मिली धनराशि आदि का विवरण सार्वजनिक हो इस हेतु कोई कानून बनाये और इन्हें सूचना के अधिकार के दायरे में ले आये। बिना इस कदम के भ्रष्टाचार के खिलाफ ज़ीरो टॉलरेंस की बात करना एक जुमला ही साबित होगा।

मैं इस अश्लील विषमता और दारुण विपन्नता के विरुद्ध हूँ। क्या आप इस विषमता और विपन्नता  से आज़ादी नहीं चाहते हैं ? मैं चाहता हूं। आप की आप जानें। आर्थिक मामलों के विद्वानों को भी यह रहस्य पता करना होगा कि विपन्नता के इस उथले सागर में समृद्धि का यह द्वीप कैसे उभर रहा है ?