राहुल और प्रियंका गांधी के आज के आंदोलन से जो माहौल बना है, वह फिर यह इंगित करता है कि अत्याचार के विरुद्ध या सकारात्मक परिवर्तन के लिए एलीट/आभिजात्य को आगे आना होता है। इस शब्द का अर्थ धनिक या अच्छे कुल या शिक्षित होने से मात्र से नहीं है, आभिजात्य का अर्थ है, जो समझ, साहस और संसाधन में अग्रणी हो। वह किसी भी पेशे या क्षेत्र से हो सकता है। विश्व के किसी भी स्वतंत्रता आंदोलन, राजनीतिक, सामाजिक या सांस्कृतिक आंदोलन को देखें, नेतृत्व आभिजात्य को करना होता है।

आज इन दोनों ने एक बड़ी पहल की है, भले वह सांकेतिक हो। लेकिन यह सांस्कृतिक भी है, विरोध में खड़े होने की संस्कृति। उचित को उचित और अनुचित को अनुचित कहने की संस्कृति, किसी के दुःख में साझा करने की संस्कृति, किसी के साथ खड़े होने की संस्कृति। इन भाई-बहन और इनके साथी कार्यकर्ताओं ने आज शक्ति के मद में चूर प्रवृत्तियों को भयभीत कर दिया है। इसलिए यह घटना राजनीतिक से अधिक सांस्कृतिक है, यह भावात्मक है, काव्यात्मक है, इसे लक्षित किया जाना चाहिए, इसकी अनुभूति होनी चाहिए। यह कुछ कठिन अवश्य है।एलेन फिंकिलकरौ ने कहा है कि जब संस्कृति से घृणा ही संस्कृति बन जाए, तो मस्तिष्क का जीवन अपना सारा अर्थ खो देता है, हमें इस स्थिति से बचना होगा। हमें यह भी सोचना होगा कि हमारे एलीट, हमारे आभिजात्य क्या कर रहे हैं, कहाँ हैं? हम यह ग़लती करते हैं कि राजनीतिक दुर्घटनाओं का ठीकरा जन सामान्य पर थोपने लगते हैं।

राजनीतिक आभिजात्य का जो है, सो तो है, पर सांस्कृतिक और सामाजिक आभिजात्य से भी प्रश्न होने चाहिए, संतोषजनक उत्तर न मिले, तो उनका प्रतिकार और प्रतिवाद भी होना चाहिए। हम गांधी की फिर जयंती मनायेंगे, लेकिन उनकी सबसे महत्वपूर्ण सीख- बहिष्कार- को कब अंगीकार करेंगे?

 

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Prakash k Ray

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