कांग्रेस उत्तर प्रदेश में आखिरी बार जब सत्ता में आई थी उसको अब तक 34 साल बीत चुके हैं। यानी आज की 20- 25 और 30 साल की युवा पीढ़ी ने यूपी में कांग्रेस का शासन नहीं देखा है। जिन्होंने देखा है उनकी उम्र अब रिटायरमेंट की हो गयी है। बीते 34 सालों में कांग्रेस ने क्या पाया है या क्या खोया है इस बहस को अलग रख दीजिए। लेकिन कांग्रेस आज भी जो बात नहीं समझ पाई है वो ये है कि ज़मीन पर उतर कर राजनीति करने में और “दिल्ली” से राजनीति करने में फर्क होता है।

बीते 2014,2017 और 2019 के चुनावों में भी कांग्रेस का वही रवैया लगातार जारी है जिसने उसे धरातल पर पहुंचाया है। दिल्ली से आदेश दे देना के फलां शख्स लोकसभा का चुनाव लड़ेगा, और दिल्ली से गये किसी भी “प्रभारी” का अपने खास को टिकट दे देना या काट देना से लेकर संगठन में वही पुराने नाम ले आना से लेकर नाम जोड़ देना तक सब कुछ बस यूं ही चलता जा रहा है।

2019 के लोकसभा के चुनावों से पहले राहुल गांधी ने यूँ ही चौंकाते हुए बहन प्रियंका गांधी को यूपी का प्रभारी बना कर भेज दिया। तमाम लोगों ने बड़े बड़े दावे किए लेकिन आखिर में राहुल गांधी तक चुनाव हार गए। लेकिन फिर भी सबक नहीं लिया,अब खबर ये है कि कांग्रेस बड़े “मुस्लिम” नेता इमरान प्रतापगढ़ी को उपमुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाने वाली है। अब सवाल ये है कि क्या इमरान कांग्रेस के जख्मों पर मरहम लगा पाएंगें?

कौन हैं इमरान प्रतापगढ़ी जो रातोंरात “नेशनल लीडर” बन गए?

इमरान प्रतापगढ़ी की सबसे बड़ी पहचान उनके शायर होने से है एक ऐसा शायर जो स्टेज पर खड़ा होता है तो यूथ जज़्बातों में बह जाता है। जब ये नौजवान देशभक्ति की बातें करता है दूर दूर तक तालियों की आवाज़ गूंज उठती है। लेकिन अब इस “शायर” की एक और पहचान है। ये कांग्रेस के अल्पसंख्यक विभाग का राष्ट्रीय अध्यक्ष है।

लेकिन हमें बीता हुआ कल भी हमेशा याद रखना चाहिए। इमरान 2019 में कांग्रेस द्वारा मुरादाबाद लोकसभा से प्रतयाशी बनाये गए थे लेकिन परिणाम आये तो अब के कांग्रेस के अल्पसंख्यक राष्ट्रीय अध्यक्ष अपनी ज़मानत भी नहीं बचा पाए थे। लेकिन इन तमाम बातों और आंकड़ों को दरकिनार करते हुए कांग्रेस इन्हें उत्तर प्रदेश में अपना “उपमुख्यमंत्री” पद का दावेदार बनाने की कोशिश में है।

इसके पीछे कुछ वजह हैं आइये जानते हैं। पहली कांग्रेस को इस बात का इल्म है कि मुस्लिम वोटर उससे हद दर्जे का नाराज़ है और एक वक्त कांग्रेस का कोर वोट रहा मुस्लिम अगर फिर से उनकी तरफ लौट आता है कांग्रेस को संजीवनी प्राप्त होगी। इसके अलावा कांग्रेस इमरान को ये ज़िम्मेदारी इसलिए भी देना चाहती है क्योंकि इमरान की छवि साफ है और वो युवाओं के बीच काफी प्रसिद्ध चेहरा भी हैं।

इमरान प्रतापगढ़ी पर हेरिटेज टाइम्स के संपादक उमर अशरफ कहते हैं कि सबसे पहली बात के इमरान प्रतापगढ़ी जिस पार्टी से आते हैं, उसका उत्तर प्रदेश में क्या हैसियत है? उनकी पार्टी का सबसे बड़ा फ़ेस राहुल गांधी वहाँ अपनी सीट नही बचा पाते हैं। फिर खुद इमरान प्रतापगढ़ी क्या हैं? मुरादाबाद सीट से ज़मानत नही बचा पाए।

फ़िलहाल इमरान प्रतापगढ़ी ख़ुद कांग्रेस के जिस पद पर आए हैं, वहाँ वो किस तरह पहुँचे हैं इसकी समीक्षा होनी चाहिए। लोकतंत्र में आप किसी पर कुछ भी थोप नही सकते हैं। पहले आपने अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के चेयरमैन के तौर पर थोपा, और अब उपमुख्यमंत्री के तौर पर थोपना चाह रहे। वैसे ये तब होगा जब कांग्रेस ख़ुद के दम पर सरकार बनाए। फ़िलहाल तो दो दर्जन सीट जीतना भी मुश्किल है।”

क्या जड़ से जमें मुस्लिम कांग्रेसी इस फैसले को मान लेंगे?

कांग्रेस के बारे में वरिष्ठ पत्रकार जो उनका इतिहास भी लिख चुके हैं रशीद क़िदवई लिखते हैं कि “कांग्रेस में दो तरह के नेताओं की गिनती होती है पहले वो जो दरबारी नेता होते हैं जिन्हें अगर चुनाव लड़ने को बोल दिया जाए तो वो जीत नहीं पाएंगे लेकिन दिल्ली “दरबार” मे उनकी हाज़री हमेशा लगी रहती है। दूसरे वो नेता होते हैं जो ज़मीन पर मज़बूत होते हैं और अपनी ज़मीनी पकड़ रखते हैं”

इसके मुताबिक देखें तो इमरान प्रतापगढ़ी कांग्रेस में “दरबारी नेता” हैं जिनकी ज़मीन पकड़ नहीं है वो बस जनता को जमा करना और माहौल बनाना जानते हैं परिणाम भी कभी कभी आ जाते हैं लेकिन सिर्फ न के बराबर ही। लेकिन उन्हें लगातार राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से करीबी का फायदा मिल रहा है। फिर चाहे कोई भी नाराज़ हो।

ऐसा नही है कि कांग्रेस में और मुस्लिम नेता नही है। सलमान खुर्शीद हैं,इमरान मसूद हैं और नए नए पार्टी में नसीमुद्दीन सिद्दीकी हैं। अगर सिर्फ इमरान मसूद ही को ले लें तो वो एक ज़मीनी नेता की तरह सहारनपुर ज़िलें में स्थापित नेता हैं। 2014 के लोकसभा चुनावों में 4 लाख से ज़्यादा वोट उन्हें मिलें थे। 2019 में क़रीबन 2.50 लाख और 2017 में वो सिर्फ मामूली अंतर से विधानसभा चुनाव हारे थे।

लेकिन कांग्रेस अपने सारे “तोहफे” इमरान प्रतापगढ़ी को देना चाहती है क्योंकि उसे ज़मीनी नेताओं से बहुत ज़्यादा लगाव होता नही है। या फिर यूँ कहें कि उन्हें लगाव क्यों रखना चाहिए इसकी वजह उनके पास होती नही है। इसलिए इमरान प्रतापगढ़ी जैसे नाम रातोंरात “नेशनल” बन जाते हैं। जिस तरह बाकी नेताओं ने इमरान को “नेशनल प्रेज़िडेंट” कबूल कर लिया था तो उपमुख्यमंत्री पद की दावेदारी को भी ये लोग कबूल कर ही लेंगे।

कांग्रेस का ये दावा कितना मज़बूत हो सकता है इस पर राजनीतिक विश्लेषक तारिक़ चम्पारणी कहते हैं कि “इमरान प्रतापगढ़ी युवा चेहरा है और उनके भीतर भीड़ इकट्ठी करने की क्षमता है। मगर यह भीड़ उनकी राजनीतिक कुशलता के कारण नहीं बल्कि शायरी के कारण आती है। चूँकि काँग्रेस आज उत्तरप्रदेश में अपनी वज़ूद की लड़ाई लड़ रही है। वर्तमान स्थिति में 10 सीट लाना भी काँग्रेस के लिए बड़ी चुनौती है और इन सीटें भी तबतक नहीं आयेगी जबतक मुसलमानों का वोट नहीं मिल जाता है। ऐसे में काँग्रेस एक सेंसेशनल चेहरे की आवश्यकता महसूस कर रही है। काँग्रेस के पास इमरान प्रतापगढ़ी आख़िरी विकल्प है। लेकिन मेरी समझ से कुछ ज़्यादा फ़र्क़ पड़ने नहीं जा रहा है। क्योंकि मुसलमानों का एक बड़ा तबक़ा सपा की तरफ़ मन बना चुका है।

कांग्रेस मुस्लिम चेहरे को उपमुख्यमंत्री क्यों बना रही है?

दरअसल कांग्रेस अपने पुराने कोर वोटर्स ब्राह्मण ओबीसी और मुस्लिम को वापस अपनी तरफ लाना चाह रही है।इसके लिए वो एक मुस्लिम नाम तौर पर इमरान प्रतापगढ़ी, ओबीसी चेहरे के नाम प्रदेश अध्यक्ष लल्लू सिंह और ब्राह्मण चेहरे के तौर आराधना मिश्रा को प्रोजेक्ट कर सकती है।

ये दावा oneIndianews.com की तरफ से किया गया है।इस दावे में कितनी सच्चाई है ये तो खैर वक़्त आने पर पता चल ही जाएगा लेकिन फिलहाल इतना कहा जा सकता है कि प्रियंका गांधी का लगातार यूपी में एक्टिव होना बड़ी रणनीति का हिस्सा ज़रूर कहा जा सकता है। ये रणनीति क्या है कैसी है उसका पता लगने में वक़्त है।लेकिन फिलहाल मुस्लिमों को लुभाने के लिये उनके पास इमरान प्रतापगढ़ी ही हैं।

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Asad Shaikh